Udta Teer Review: आयुष्मान खुराना की जासूसी और कॉमेडी में नहीं लगा निशाना, 2 स्टार की हकदार रही फिल्म

Udta Teer Review: आयुष्मान खुराना की जासूसी और कॉमेडी में नहीं लगा निशाना, 2 स्टार की हकदार रही फिल्म

प्रेषित समय :18:02:08 PM / Fri, Oct 23rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘उड़ता तीर’ जासूसी, कॉमेडी और देशभक्ति को एक साथ पर्दे पर उतारने की कोशिश करती है. फिल्म का कॉन्सेप्ट दिलचस्प है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, बिखरे हुए निर्देशन और पुराने फिल्मी फॉर्मूलों के कारण यह दर्शकों को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर पाती. 23 अक्टूबर 2026 को रिलीज हुई इस फिल्म को 2/5 स्टार दिए गए हैं.

फिल्म का एक संवाद है, ‘देशभक्ति तो याद है, पर देश नहीं.’ यह लाइन कहानी के अनोखे विचार को सामने रखती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या याददाश्त खोने वाला एक पाकिस्तानी जासूस अचानक भारत का वफादार अफसर बनकर दर्शकों का मनोरंजन कर पाता है? निर्देशक आकाश कौशिक इस विचार के सहारे जासूसी, हास्य और राजनीतिक व्यंग्य का तड़का लगाने की कोशिश करते हैं, मगर फिल्म कई मोर्चों पर कमजोर साबित होती है.

क्या है ‘उड़ता तीर’ की कहानी?

फिल्म में आयुष्मान खुराना ने बिलाल अहमद का किरदार निभाया है, जो पाकिस्तान का एजेंट है और एक मिशन के तहत भारत आता है. इसी दौरान एक दुर्घटना में उसकी याददाश्त चली जाती है और वह खुद को भारतीय अफसर विक्रांत समझने लगता है.

उसकी पत्नी यामिनी (सारा अली खान) उसे बताती है कि उसके माता-पिता को पाकिस्तानी आतंकियों ने मार दिया था. यह सुनकर बिलाल के भीतर देशभक्ति जाग उठती है और वह अपने ही लोगों के खिलाफ खड़ा हो जाता है.

दूसरी ओर, पाकिस्तान में बैठे उसके बॉस नियाजी (राम कपूर) और अजहर मकसूद (मुकुल देव) अपने ही एजेंट के बदले हुए रवैये से परेशान हो जाते हैं. वहीं, भारतीय अधिकारी बुरमान (राहुल बोस) बिलाल के काम से खुश है, लेकिन उसे उसकी असली पहचान का अंदाजा नहीं है. इसी पहचान के भ्रम और जासूसी के उलझे हुए खेल के इर्द-गिर्द फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है.

दिलचस्प कहानी, लेकिन कमजोर पटकथा

‘उड़ता तीर’ का सबसे मजबूत पक्ष इसका मूल विचार है. एक जासूस का याददाश्त खोने के बाद अपने ही मिशन के खिलाफ खड़े हो जाना कॉमेडी और व्यंग्य के लिए अच्छा आधार बन सकता था. फिल्म में कुछ संवाद और चुनिंदा दृश्य हंसाते भी हैं. मुकुल देव की कॉमिक टाइमिंग खास तौर पर ध्यान खींचती है.

हालांकि, कमजोर स्क्रीनप्ले इस विचार की संभावनाओं को सीमित कर देता है. कई दृश्य कागज पर मजेदार लग सकते हैं, लेकिन पर्दे पर वैसा प्रभाव पैदा नहीं कर पाते. कहानी में हास्य, रोमांच और भावनाओं का संतुलन बिगड़ने से फिल्म का असर लगातार कमजोर होता जाता है.

न थ्रिलर का रोमांच, न कॉमेडी का पूरा मजा

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसका जॉनर है. इसे स्पाई-कॉमेडी और राजनीतिक व्यंग्य के रूप में पेश करने की कोशिश की गई है, लेकिन गंभीर जासूसी घटनाओं और हल्के हास्य के बीच तालमेल नहीं बन पाता.

15 अगस्त, राम मंदिर, ऑपरेशन सिंदूर और क्रॉस-फायरिंग जैसे संवेदनशील संदर्भों का इस्तेमाल कहानी में किया गया है. मगर ये प्रसंग कथानक को मजबूत करने के बजाय कई जगह भावनात्मक असर पैदा करने या तनाव बढ़ाने के साधन भर लगते हैं.

फिल्म कभी गंभीर थ्रिलर बनने की कोशिश करती है, तो कभी कॉमेडी और राजनीतिक व्यंग्य की ओर मुड़ जाती है. इन अलग-अलग रंगों को एक साथ पिरोने के लिए जिस कसावट की जरूरत थी, वह यहां नजर नहीं आती. नतीजा यह होता है कि दर्शक कई दृश्यों में यह तय नहीं कर पाता कि उसे रोमांच महसूस करना है या हंसना है.

जासूसी के नाम पर लॉजिक की कमी

फिल्म में खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली को काफी हल्के अंदाज में दिखाया गया है. हाई-सिक्योरिटी क्षेत्रों में संदिग्ध किरदारों की आसान आवाजाही, एजेंटों की सूची का लैपटॉप में मिल जाना और पेन ड्राइव के जरिए संवेदनशील जानकारी की चोरी जैसे घटनाक्रम कहानी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं.

कॉमेडी फिल्मों में अविश्वसनीय घटनाएं स्वीकार की जा सकती हैं, बशर्ते वे दर्शकों को हंसाएं या कहानी में रोमांच बढ़ाएं. ‘उड़ता तीर’ में कई घटनाएं इन दोनों कसौटियों पर खरी नहीं उतरतीं.

पाकिस्तानी एजेंटों को भारत में पहचान छिपाने के लिए हिंदू रीति-रिवाजों, पूजा-पाठ और मूर्तियां रखने की ट्रेनिंग देने वाला एंगल भी काफी फिल्मी लगता है. वहीं, नायक का अपनी पहचान भूल जाना और फिर अचानक सब कुछ याद कर लेना बॉलीवुड के पुराने फॉर्मूलों की याद दिलाता है.

संवादों में भी नहीं दिखी धार

फिल्म के संवादों से हास्य और व्यंग्य पैदा करने की कोशिश की गई है, लेकिन कई जगह अति-नाटकीयता और देशभक्ति के नारों की अधिकता असर कम कर देती है. ‘मुल्क से बढ़कर कुछ नहीं’ जैसे संवादों के साथ अगर कहानी में गहराई और परिस्थितियों में विश्वसनीयता होती, तो उनका प्रभाव अधिक हो सकता था.

लेखक आकाश कौशिक के पास जासूसी की दुनिया और राजनीतिक व्यंग्य को नए अंदाज में पेश करने का अवसर था. मगर कमजोर लेखन के कारण कई मोड़ बनावटी लगते हैं और फिल्म की व्यंग्यात्मक धार भी प्रभावी नहीं बन पाती.

आयुष्मान खुराना समेत कलाकारों का प्रदर्शन कैसा है?

आयुष्मान खुराना ने बिलाल और विक्रांत की दोहरी पहचान वाले किरदार को निभाया है. उनसे इस भूमिका में कुछ नया और चौंकाने वाला देखने की उम्मीद थी, लेकिन दोनों पहचानों के बीच का अंतर उतना मनोरंजक नहीं बन पाता. कई दृश्यों में उनका अभिनय जाना-पहचाना लगता है.

सारा अली खान के किरदार यामिनी को भी कहानी में ज्यादा प्रभावशाली ढंग से विकसित नहीं किया गया है. इस वजह से उनके हिस्से याद रह जाने वाले पल कम आते हैं.

मुकुल देव अजहर मकसूद के रूप में फिल्म में अपनी छाप छोड़ते हैं. उनके अभिनय में खलनायकी और कॉमेडी का मेल कुछ दृश्यों को मनोरंजक बनाता है. आयुष्मान के साथ उनके दृश्य फिल्म के बेहतर पलों में शामिल हैं. मुकुल देव के निधन के बाद पर्दे पर उनकी मौजूदगी दर्शकों के लिए भावनात्मक रूप से भी खास महसूस हो सकती है.

राम कपूर और गुलशन ग्रोवर जैसे अनुभवी कलाकारों को अपेक्षाकृत पुराने ढर्रे वाले पाकिस्तानी अधिकारियों के किरदार मिले हैं. उनकी योजनाएं और आपसी खींचतान कई बार कहानी को गंभीर स्पाई थ्रिलर के बजाय पैरोडी जैसा बना देती हैं.

राहुल बोस, सुप्रिया पिलगांवकर, बृजेंद्र काला, रघुबीर यादव, सुहैल नैय्यर और संदीप आनंद भी फिल्म का हिस्सा हैं. कुछ कलाकार अपने किरदारों में ठीक लगते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा के कारण उनकी प्रतिभा का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता.

देखें या नहीं?

‘उड़ता तीर’ की सबसे बड़ी ताकत इसका दिलचस्प कॉन्सेप्ट है, जबकि सबसे बड़ी कमजोरी उस विचार को प्रभावी कहानी में बदलने का तरीका है. फिल्म के शुरुआती हिस्से में कुछ दृश्य मनोरंजन करते हैं, लेकिन आगे बढ़ने के साथ कहानी का प्रवाह कमजोर पड़ता जाता है.

अगर आप हल्की-फुल्की कॉमेडी देखने के मूड में हैं और कहानी की कमियों को नजरअंदाज कर सकते हैं, तो फिल्म को एक बार आजमा सकते हैं. लेकिन अगर आप दमदार जासूसी थ्रिलर, मजबूत पटकथा और धारदार राजनीतिक व्यंग्य की उम्मीद कर रहे हैं, तो निराशा हाथ लग सकती है.

रेटिंग: 2/5 स्टार

फैसला: अच्छा आइडिया, कुछ मनोरंजक पल और मुकुल देव की कॉमिक टाइमिंग फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन और बिखरे निर्देशन के चलते आयुष्मान खुराना का ‘उड़ता तीर’ निशाने पर नहीं लग पाता.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-