जबलपुर. सरकारी विभागों में न्यायालय के आदेशों का पालन केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका असर संबंधित कर्मचारी की कार्यस्थिति और प्रशासनिक व्यवस्था में भी दिखाई देना चाहिए. जबलपुर के स्वास्थ्य विभाग में जिला कम्युनिटी मोबिलाइजर प्रवीण सोनी से जुड़ा मामला इसी सवाल को सामने ला रहा है. हाईकोर्ट से अंतरिम राहत मिलने के करीब दो साल बाद अब विभाग ने उन्हें जिला स्तरीय जिम्मेदारियां सौंपी हैं. खास बात यह है कि उन्हें ऐसे काम की जिम्मेदारी दी गई है, जिसका सीधा संबंध शहरी आशा कार्यकर्ताओं की समस्याओं, भुगतान और आम नागरिकों की शिकायतों के निराकरण से है.
आशा कार्यकर्ताओं की समस्याओं के बीच नई जिम्मेदारी
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. नवीन कोठारी ने 23 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश में प्रवीण सोनी को शहरी आशा कार्यकर्ताओं से संबंधित जिला स्तरीय कार्य सौंपे हैं. इसके साथ ही शहरी क्षेत्र में सीएम हेल्पलाइन से जुड़े प्रकरणों के निराकरण की जिम्मेदारी भी दी गई है.
यह जिम्मेदारी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं. गर्भवती महिलाओं की देखभाल, टीकाकरण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और विभिन्न सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने में उनकी भूमिका रहती है. ऐसे में उनके भुगतान में देरी, प्रशासनिक समस्याओं और शिकायतों का समय पर समाधान होना जरूरी है.
विभागीय आदेश में आशा कार्यकर्ताओं के भुगतान संबंधी समस्याओं और शिकायतों को जिम्मेदारी सौंपने का आधार बताया गया है. अब देखना होगा कि नई व्यवस्था से इन समस्याओं के समाधान में कितनी तेजी आती है.
सेवा समाप्ति से शुरू हुआ था कानूनी विवाद
प्रवीण सोनी की विभागीय स्थिति का मामला वर्ष 2020 से न्यायिक प्रक्रिया में है. उपलब्ध विवरण के अनुसार, 22 जनवरी 2020 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं. इस कार्रवाई को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. न्यायालय ने संबंधित याचिका में सेवा समाप्ति का आदेश निरस्त कर दिया था.
इसके बाद भी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ. प्रकरण में याचिकाकर्ता को दोबारा न्यायालय की शरण लेनी पड़ी. प्रवीण सोनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य सहित अन्य मामले में 29 अगस्त 2024 को न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने अंतरिम आदेश जारी किया था. इसमें अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ता को सेवा में बनाए रखने का निर्देश दिया गया था.
न्यायिक संरक्षण और विभागीय कार्रवाई के बीच अंतराल
इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू केवल सेवा में बनाए रखने का आदेश नहीं, बल्कि उसके बाद विभागीय स्तर पर कार्यदायित्वों की स्थिति भी है. न्यायालय से अंतरिम संरक्षण मिलने और अक्टूबर 2026 में नई जिम्मेदारी सौंपे जाने के बीच लगभग दो वर्ष का अंतराल रहा.
इस अवधि में विभागीय स्तर पर क्या कार्रवाई हुई, संबंधित कर्मचारी को कौन-कौन से कार्य दिए गए और निर्धारित जिम्मेदारियां सौंपने में इतना समय क्यों लगा, ये सवाल प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं.
हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं होता कि इस पूरी अवधि में सोनी को कोई कार्य नहीं दिया गया था अथवा वे किन प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे. इसलिए इस संबंध में विभाग का पक्ष और पूर्व आदेशों के अनुपालन का विवरण भी महत्वपूर्ण होगा.
अब कामकाज से साबित होगी नई व्यवस्था की उपयोगिता
23 अक्टूबर के आदेश के बाद अब प्रवीण सोनी के पास शहरी आशा कार्यकर्ताओं से जुड़े मामलों और सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों के निराकरण की जिम्मेदारी है. इससे एक ओर विभागीय कार्यप्रणाली में उनकी भूमिका स्पष्ट हुई है, वहीं दूसरी ओर आशा कार्यकर्ताओं की लंबित समस्याओं के समाधान की अपेक्षा भी बढ़ी है.
अब इस व्यवस्था की वास्तविक सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि आशा कार्यकर्ताओं के भुगतान संबंधी मामलों का कितनी जल्दी निराकरण होता है और नागरिकों की शिकायतों पर कितनी प्रभावी कार्रवाई की जाती है.
यह प्रकरण एक व्यापक प्रशासनिक सवाल भी छोड़ता है कि न्यायालय से राहत मिलने के बाद संबंधित आदेशों का समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए विभागों में कौन-सी व्यवस्था होनी चाहिए. क्योंकि न्यायिक आदेश का उद्देश्य केवल विवाद का समाधान करना नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर उसके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना भी है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

