अंतरिक्ष में सैटेलाइट पर चला Google का AI मॉडल, धरती पर भेजा पहला जवाब, 2027 में दो उपग्रहों को जोड़ने की तैयारी

अंतरिक्ष में सैटेलाइट पर चला Google का AI मॉडल, धरती पर भेजा पहला जवाब, 2027 में दो उपग्रहों को जोड़ने की तैयारी

प्रेषित समय :23:36:16 PM / Sat, Oct 31st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में अब एक नई तकनीकी दौड़ अंतरिक्ष तक पहुंच गई है. गूगल ने अपने प्रोजेक्ट सनकैचर के तहत एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है. कंपनी ने पृथ्वी की कक्षा में मौजूद सैटेलाइट पर अपना Gemma 4 AI मॉडल सफलतापूर्वक चलाया और उससे तैयार पहला पूरा जवाब धरती पर प्राप्त किया. इस प्रयोग के साथ यह संभावना मजबूत हुई है कि भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की कंप्यूटिंग क्षमता केवल पृथ्वी पर बने विशाल डेटा सेंटरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अंतरिक्ष में भी AI मॉडल चलाए जा सकेंगे.

गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस उपलब्धि की जानकारी देते हुए इसे प्रोजेक्ट सनकैचर का 'हैलो वर्ल्ड' क्षण बताया. उन्होंने कहा कि टीम ने अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट को कमांड भेजी, उसका टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट (TPU) शुरू किया, AI मॉडल को प्रॉम्प्ट दिया और फिर उसका पूरा जवाब धरती पर प्राप्त किया. इस प्रयोग में मॉडल से अंतरिक्ष पर एक छोटी कविता लिखने को कहा गया था. सैटेलाइट ने जवाब तैयार किया और उसे पृथ्वी पर भेज दिया.

सैटेलाइट पर पहली बार AI मॉडल का सफल परीक्षण

गूगल के अनुसार, इस प्रयोग में Gemma 4 ओपन AI मॉडल का इस्तेमाल किया गया. इसे सैटेलाइट में लगे TPU हार्डवेयर पर चलाया गया. TPU गूगल की ओर से विकसित विशेष प्रकार की चिप है, जिसे मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े कार्यों को तेजी से पूरा करने के लिए तैयार किया गया है.

परीक्षण के दौरान ग्राउंड स्टेशन के संपर्क में आने पर सैटेलाइट को एक प्रॉम्प्ट भेजा गया. इसमें AI मॉडल से अंतरिक्ष पर हाइकु यानी छोटी कविता लिखने के लिए कहा गया. सैटेलाइट ने अपने भीतर उपलब्ध कंप्यूटिंग क्षमता का इस्तेमाल करते हुए जवाब तैयार किया. इसके बाद यह जवाब धरती पर प्राप्त हुआ. यह प्रक्रिया तब पूरी हुई जब सैटेलाइट नॉर्वे के स्वालबार्ड क्षेत्र के ऊपर से गुजर रहा था.

कंपनी ने इसके बाद अंतरिक्ष विषय पर लिमरिक यानी छोटी हास्यपूर्ण कविताएं तैयार करने और सैटेलाइट के तकनीकी सिस्टम की स्थिति बताने जैसे अन्य प्रॉम्प्ट भी आजमाए. इन परीक्षणों से यह जांचने में मदद मिली कि अंतरिक्ष में मौजूद हार्डवेयर पर AI मॉडल अलग-अलग निर्देशों को किस तरह प्रोसेस कर सकता है.

1 अक्टूबर को लॉन्च हुआ था प्रोटोटाइप सैटेलाइट

गूगल ने इस परियोजना के तहत अपना प्रोटोटाइप सैटेलाइट 1 अक्टूबर को लॉन्च किया था. इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या अंतरिक्ष में बड़े स्तर पर मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंप्यूटिंग व्यवस्था विकसित की जा सकती है. सैटेलाइट के कक्षा में पहुंचने के बाद कंपनी की टीम ने शुरुआती तकनीकी जांच की. इसमें सैटेलाइट के होस्ट सिस्टम और TPU ट्रे को चालू करना तथा शुरुआती मशीन लर्निंग परीक्षण शामिल थे.

इन परीक्षणों के जरिए यह सुनिश्चित किया गया कि अंतरिक्ष में मौजूद उपकरण सामान्य रूप से काम कर रहे हैं और AI मॉडल चलाने के लिए आवश्यक तकनीकी व्यवस्था उपलब्ध है. शुरुआती जांच पूरी होने के बाद टीम ने वास्तविक प्रॉम्प्ट भेजकर मॉडल से जवाब प्राप्त करने का प्रयोग किया. गूगल के लिए यह उपलब्धि इस बात का शुरुआती प्रमाण है कि अंतरिक्ष में भी AI कंप्यूटिंग की प्रक्रिया संभव हो सकती है.

हालांकि, एक बार सफलतापूर्वक जवाब प्राप्त होना इस तकनीक के बड़े पैमाने पर व्यावसायिक इस्तेमाल की गारंटी नहीं है. इसके लिए सैटेलाइट के हार्डवेयर, ऊर्जा व्यवस्था, डेटा संचार और अंतरिक्ष के कठिन वातावरण में लंबे समय तक काम करने की क्षमता की विस्तृत जांच जरूरी होगी.

अंतरिक्ष में AI कंप्यूटिंग की जरूरत क्यों महसूस हुई

दुनिया में AI मॉडल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. चैटबॉट, मशीन लर्निंग, इमेज जनरेशन, वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक ऑटोमेशन जैसे क्षेत्रों में लगातार अधिक कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत पड़ रही है. इसके लिए धरती पर बड़े डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं. इन केंद्रों को चलाने के लिए बिजली, शीतलन व्यवस्था, जमीन और अन्य संसाधनों की आवश्यकता होती है.

गूगल का प्रोजेक्ट सनकैचर इसी चुनौती के संभावित विकल्पों की खोज कर रहा है. कंपनी यह अध्ययन कर रही है कि क्या भविष्य में अंतरिक्ष में सैटेलाइट के समूह बनाकर AI कंप्यूटिंग का काम किया जा सकता है. यदि ऐसी व्यवस्था विकसित होती है तो सैटेलाइट के बीच डेटा और कंप्यूटिंग कार्यों का आदान-प्रदान संभव हो सकेगा. इससे अंतरिक्ष में ही कुछ AI कार्यों को पूरा करने की क्षमता विकसित हो सकती है.

हालांकि, अंतरिक्ष में कंप्यूटिंग व्यवस्था स्थापित करना आसान नहीं है. वहां तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव, हानिकारक विकिरण, सीमित ऊर्जा और धरती से संचार में लगने वाला समय जैसी चुनौतियां मौजूद हैं. इसके अलावा सैटेलाइट को लंबे समय तक विश्वसनीय तरीके से काम करने योग्य बनाना भी जरूरी होगा.

धरती से आठ गुना तक सौर ऊर्जा मिलने की संभावना

प्रोजेक्ट सनकैचर के पीछे एक प्रमुख विचार अंतरिक्ष में उपलब्ध सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करना है. गूगल का कहना है कि पृथ्वी की निचली कक्षा यानी लो अर्थ ऑर्बिट में मौजूद सैटेलाइट को लगभग लगातार सूर्य की रोशनी उपलब्ध हो सकती है. कंपनी के अनुमान के अनुसार, ऐसी स्थिति में सैटेलाइट धरती पर उपलब्ध परिस्थितियों की तुलना में आठ गुना तक अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं.

धरती पर मौसम, बादल, रात और दिन के बदलाव के कारण सौर ऊर्जा उत्पादन में उतार-चढ़ाव आता है. इसके विपरीत अंतरिक्ष में सूर्य की रोशनी की उपलब्धता कुछ कक्षाओं और परिचालन स्थितियों में अधिक नियमित हो सकती है. यदि सैटेलाइट इस ऊर्जा का प्रभावी इस्तेमाल कर सकें तो AI कंप्यूटिंग के लिए बिजली उपलब्ध कराने की एक नई व्यवस्था विकसित हो सकती है.

लेकिन अधिक सौर ऊर्जा उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं होगा. प्राप्त ऊर्जा को संग्रहित करना, कंप्यूटिंग उपकरणों तक पहुंचाना और उनके तापमान को नियंत्रित रखना भी बड़ी तकनीकी चुनौती होगी. इसलिए इस परियोजना में ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ हार्डवेयर की कार्यक्षमता और विश्वसनीयता पर भी ध्यान दिया जा रहा है.

अब रेडिएशन और तापमान की कठिन परीक्षा

पहला सफल AI जवाब मिलने के बाद परियोजना का अगला चरण और अधिक महत्वपूर्ण होने जा रहा है. गूगल अब अंतरिक्ष में मौजूद TPU चिपों की तापमान और विकिरण के प्रभाव के बीच कार्य करने की क्षमता का परीक्षण करेगा. पृथ्वी के वातावरण से बाहर सैटेलाइट को ऐसे विकिरण का सामना करना पड़ता है, जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के कामकाज को प्रभावित कर सकता है.

इसी तरह अंतरिक्ष में तापमान की परिस्थितियां भी धरती से काफी अलग होती हैं. उपकरणों को कभी अत्यधिक गर्मी तो कभी बहुत कम तापमान का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में यह जांचना जरूरी है कि TPU चिप लगातार काम करते हुए कितनी स्थिरता बनाए रखती हैं और क्या वे लंबे समय तक AI से जुड़े जटिल कार्य कर सकती हैं.

इन परीक्षणों के नतीजे तय करेंगे कि अंतरिक्ष में AI कंप्यूटिंग को बड़े स्तर पर विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ना व्यावहारिक होगा या नहीं. हार्डवेयर की विश्वसनीयता के साथ संचार और ऊर्जा प्रबंधन की क्षमता भी परखी जाएगी.

2027 में दो सैटेलाइट जोड़ने की तैयारी

गूगल ने परियोजना के अगले बड़े लक्ष्य के रूप में 2027 में दो आपस में जुड़े सैटेलाइट का परीक्षण करने की योजना बनाई है. इसका उद्देश्य यह देखना होगा कि क्या अलग-अलग सैटेलाइट एक नेटवर्क की तरह काम कर सकते हैं और उनके बीच कंप्यूटिंग कार्यों का बंटवारा संभव है.

यदि यह प्रयोग सफल होता है तो भविष्य में सैटेलाइट का बड़ा समूह तैयार करने की दिशा खुल सकती है. ऐसी व्यवस्था में एक सैटेलाइट पर उपलब्ध कंप्यूटिंग संसाधनों का इस्तेमाल दूसरे सैटेलाइट के साथ मिलकर किया जा सकेगा. इससे अंतरिक्ष में AI कंप्यूटिंग की क्षमता बढ़ाने का रास्ता बन सकता है.

हालांकि, दो सैटेलाइट को जोड़ना और हजारों सैटेलाइट का भरोसेमंद नेटवर्क बनाना अलग-अलग स्तर की चुनौतियां हैं. इसके लिए संचार, ऊर्जा, हार्डवेयर की सुरक्षा और नेटवर्क प्रबंधन से जुड़ी तकनीक विकसित करनी होगी.

AI की दुनिया में नई प्रतिस्पर्धा का संकेत

गूगल का यह प्रयोग भविष्य की कंप्यूटिंग व्यवस्था को लेकर एक नई संभावना सामने रखता है. अभी तक AI के विकास की चर्चा मुख्य रूप से धरती पर बने डेटा सेंटर, शक्तिशाली चिप और ऊर्जा की उपलब्धता के इर्द-गिर्द होती रही है. लेकिन प्रोजेक्ट सनकैचर यह सवाल उठा रहा है कि क्या भविष्य में अंतरिक्ष भी AI के लिए एक महत्वपूर्ण कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म बन सकता है.

फिलहाल यह परियोजना शुरुआती शोध और तकनीकी परीक्षण के चरण में है. सैटेलाइट पर AI मॉडल चलाकर जवाब प्राप्त करना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसे अंतरिक्ष में बड़े डेटा सेंटर स्थापित होने की शुरुआत मानना अभी जल्दबाजी होगी. असली परीक्षा तब होगी, जब उपकरण लंबे समय तक विकिरण और तापमान की कठिन परिस्थितियों में काम करेंगे तथा एक से अधिक सैटेलाइट मिलकर कंप्यूटिंग कार्य पूरा करेंगे.

यदि गूगल इन चुनौतियों को पार कर लेता है तो आने वाले वर्षों में AI की कंप्यूटिंग क्षमता को लेकर दुनिया को एक नया विकल्प मिल सकता है. फिलहाल 2027 में दो सैटेलाइट को जोड़ने का प्रस्ताव इस दिशा में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव होगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-