भोपाल. मध्यप्रदेश में सरकारी निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार का एक और मामला सामने आया है. सिंगरौली जिले में म्यार नदी पर पुल और पहुंच मार्ग के निर्माण में आर्थिक अनियमितताओं का खुलासा हुआ है. आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) रीवा ने जांच के बाद लोक निर्माण विभाग के सेतु निर्माण से जुड़े दो तत्कालीन अधिकारियों और रीवा के एक ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. आरोप है कि महज 7 लाख 37 हजार रुपये के अंतिम देयक को कूटरचित दस्तावेजों के जरिए बढ़ाकर 40 लाख 91 हजार 300 रुपये कर दिया गया और इस आधार पर भुगतान भी प्राप्त कर लिया गया. जांच में सरकारी माप पुस्तिका गायब करने और अन्य अभिलेखों में काट-छांट करने की बात भी सामने आई है. प्रारंभिक जांच के अनुसार, इस पूरी कवायद का उद्देश्य निर्माण कार्य में हुई देरी और अन्य कमियों के कारण लगने वाली पेनाल्टी से बचना तथा शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाना था.
चाचर-कुल्हनिया मार्ग पर पुल निर्माण से जुड़ा है मामला
यह पूरा मामला सिंगरौली जिले के चाचर से कुल्हनिया मार्ग पर म्यार नदी में पुल और उसके पहुंच मार्ग के निर्माण से संबंधित है. इस निर्माण कार्य का ठेका रीवा की फर्म मेसर्स विजय कुमार मिश्रा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड को 5 फरवरी 2016 को दिया गया था. परियोजना की स्वीकृत लागत 574.32 लाख रुपये निर्धारित की गई थी. अनुबंध के अनुसार ठेकेदार को निर्माण कार्य 18 महीने के भीतर पूरा करना था.
हालांकि, निर्धारित समयसीमा में काम पूरा नहीं हो सका. निर्माण कार्य पूरा करने में लगभग चार महीने की अतिरिक्त देरी हुई और ठेकेदार ने 1 अगस्त 2018 को काम पूर्ण किया. जांच एजेंसी के अनुसार, निर्धारित समय से देरी और निर्माण संबंधी कमियों के कारण ठेकेदार पर पेनाल्टी लगाए जाने की स्थिति बन रही थी. इसी अवधि के भुगतान और दस्तावेजों की जांच के दौरान कथित वित्तीय अनियमितताओं के संकेत मिले.
7.37 लाख का अंतिम बिल बन गया 40.91 लाख रुपये
जांच में सामने आया कि तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) सुशील कुमार मिश्रा ने जनवरी 2019 में भुगतान के लिए 7 लाख 37 हजार 861 रुपये का अंतिम देयक प्रस्तुत किया था. इसके बाद ऑडिटर ने निर्माण कार्य में देरी, आवश्यक टेस्ट रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराने और अन्य तकनीकी कमियों को ध्यान में रखते हुए 16 लाख 78 हजार 437 रुपये की पेनाल्टी निर्धारित की.
आरोप है कि इस पेनाल्टी से बचने के लिए बिल और सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर की गई. जांच एजेंसी के मुताबिक, बाद में 1 नवंबर 2018 की पिछली तारीख दर्शाते हुए 40 लाख 91 हजार 300 रुपये का नया कूटरचित बिल तैयार किया गया. इस तरह 7 लाख 37 हजार 861 रुपये के मूल अंतिम देयक को बढ़ाकर 40 लाख रुपये से अधिक कर दिया गया.
ईओडब्ल्यू की जांच में इस बदलाव को सामान्य लेखा संबंधी गलती नहीं, बल्कि कथित साजिश के तहत की गई वित्तीय अनियमितता माना गया है. एजेंसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से पेनाल्टी की राशि शून्य करने और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया.
पेनाल्टी से बचने के लिए गायब की गई सरकारी माप पुस्तिका
इस मामले में सबसे गंभीर तथ्य सरकारी निर्माण कार्य से संबंधित माप पुस्तिकाओं में कथित हेरफेर का सामने आना है. किसी भी सरकारी निर्माण परियोजना में माप पुस्तिका (Measurement Book) महत्वपूर्ण दस्तावेज होती है. इसमें निर्माण कार्य की वास्तविक मात्रा, किए गए काम का विवरण और भुगतान के लिए आवश्यक तकनीकी जानकारी दर्ज रहती है.
ईओडब्ल्यू की जांच के अनुसार, माप पुस्तिका क्रमांक 605 को कार्यालय से गायब कर दिया गया. इसके अलावा माप पुस्तिका क्रमांक 606 और 734 में काट-छांट तथा ओवरराइटिंग किए जाने के तथ्य भी सामने आए हैं.
जांच एजेंसी का मानना है कि महत्वपूर्ण अभिलेखों को गायब करने और अन्य दस्तावेजों में बदलाव करने के पीछे भुगतान से संबंधित वास्तविक स्थिति छिपाने का उद्देश्य था. इन दस्तावेजों की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनके आधार पर निर्माण की वास्तविक प्रगति, काम की मात्रा और ठेकेदार को किए जाने वाले भुगतान का सत्यापन किया जाता है.
दो तत्कालीन अधिकारियों और ठेकेदार पर साजिश का आरोप
ईओडब्ल्यू की जांच में तत्कालीन एसडीओ सुशील कुमार मिश्रा के साथ लोक निर्माण विभाग के सेतु निर्माण उप संभाग सीधी में पदस्थ तत्कालीन उपयंत्री चंद्रशेखर तिवारी की भूमिका भी सामने आई है. एजेंसी के अनुसार, दोनों अधिकारियों ने ठेकेदार के साथ मिलकर कथित तौर पर दस्तावेजों में हेरफेर की साजिश रची.
जांच में रीवा की ठेकेदार फर्म मेसर्स विजय कुमार मिश्रा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई. आरोप है कि निर्माण कार्य में देरी और अन्य कमियों के कारण लगने वाली आर्थिक पेनाल्टी से बचने के लिए भुगतान संबंधी दस्तावेजों को बदला गया.
ईओडब्ल्यू ने उपलब्ध दस्तावेजों और जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर संबंधित अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. अब मामले में आपराधिक जांच के माध्यम से दस्तावेजों की वास्तविकता, भुगतान की प्रक्रिया और प्रत्येक संबंधित व्यक्ति की भूमिका की पड़ताल की जाएगी.
सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने की थी तैयारी
ईओडब्ल्यू के अनुसार, कथित फर्जीवाड़े का उद्देश्य केवल बिल की राशि बढ़ाना नहीं था, बल्कि निर्माण कार्य में हुई देरी और तकनीकी कमियों के कारण निर्धारित पेनाल्टी से बचना भी था. ऑडिट में 16 लाख 78 हजार 437 रुपये की पेनाल्टी तय की गई थी. इसके बाद दस्तावेजों में बदलाव कर बड़ी राशि का बिल तैयार किए जाने का आरोप है.
यदि सरकारी निर्माण कार्यों में वास्तविक माप और भुगतान से संबंधित अभिलेखों में इस तरह हेरफेर होती है, तो इससे सरकारी धन के उपयोग की पारदर्शिता प्रभावित होती है. निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और लागत का आकलन भी गलत हो सकता है. इस मामले में माप पुस्तिकाओं का गायब होना और अन्य अभिलेखों में बदलाव जांच का महत्वपूर्ण आधार बना है.
निर्माण कार्य की गुणवत्ता और भुगतान प्रक्रिया भी जांच के दायरे में
म्यार नदी पर पुल निर्माण का मामला अब केवल एक बिल में कथित गड़बड़ी तक सीमित नहीं रह गया है. जांच एजेंसी के सामने यह भी महत्वपूर्ण है कि निर्माण कार्य निर्धारित समय में क्यों पूरा नहीं हुआ, तकनीकी कमियों के संबंध में ऑडिटर ने क्या आपत्तियां दर्ज की थीं और भुगतान की प्रक्रिया में किन स्तरों पर दस्तावेजों का सत्यापन किया गया.
इसके अलावा यह भी जांच का विषय होगा कि 40 लाख 91 हजार 300 रुपये का कथित कूटरचित बिल किस प्रक्रिया से तैयार हुआ और भुगतान की स्वीकृति किन अभिलेखों के आधार पर दी गई. माप पुस्तिका क्रमांक 605 के गायब होने तथा 606 और 734 में काट-छांट के पीछे किसकी भूमिका थी, इसका खुलासा भी आगे की जांच में महत्वपूर्ण होगा.
एफआईआर के बाद ईओडब्ल्यू की जांच तेज
आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ रीवा ने प्रारंभिक जांच के आधार पर संबंधित तत्कालीन अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है. अब जांच में सरकारी दस्तावेजों, बिलों, भुगतान अभिलेखों और निर्माण कार्य से जुड़े तकनीकी रिकॉर्ड का परीक्षण किया जाएगा.
सिंगरौली के म्यार नदी पुल निर्माण से जुड़ा यह मामला सरकारी परियोजनाओं में निगरानी और वित्तीय पारदर्शिता की जरूरत को भी सामने लाता है. विशेष रूप से माप पुस्तिकाओं जैसे महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों की सुरक्षा और भुगतान से पहले तकनीकी जांच की व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए हैं.
फिलहाल एफआईआर में लगाए गए आरोप जांच के अधीन हैं और संबंधित आरोपियों की दोषसिद्धि अदालत में साबित होना बाकी है. आने वाले समय में ईओडब्ल्यू की जांच से यह स्पष्ट होगा कि कथित रूप से बढ़ाए गए बिल के पीछे किस स्तर पर मिलीभगत थी और सरकारी खजाने को वास्तविक रूप से कितना नुकसान हुआ.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

