जबलपुर. बिजली की हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइनों के आसपास नियमों को ताक पर रखकर किए गए निर्माण अब संबंधित लोगों के लिए बड़ी मुसीबत बनते जा रहे हैं. मध्यप्रदेश में विद्युत सुरक्षा के लिए निर्धारित प्रतिबंधित कॉरिडोर में नियम विरुद्ध निर्माण के मामलों पर सख्ती की तैयारी शुरू हो गई है. मध्य प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी (एमपी ट्रांसको) ने प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे निर्माणों को लेकर अब तक 3610 से अधिक नोटिस जारी किए हैं. जबलपुर हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद इस मामले ने और गंभीर रूप ले लिया है. अब प्रदेशभर में प्रतिबंधित क्षेत्र के निर्माणों की पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने की तैयारी की जा रही है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रांसमिशन लाइनों के आसपास होने वाले अवैध निर्माण केवल सरकारी नियमों का उल्लंघन नहीं हैं, बल्कि लोगों की जान और सार्वजनिक बिजली व्यवस्था के लिए भी गंभीर खतरा बन सकते हैं. निर्धारित सुरक्षा दूरी का पालन नहीं होने से विद्युत दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है. इसके साथ ही बिजली लाइनों के रखरखाव, मरम्मत और निर्बाध विद्युत आपूर्ति में भी बाधाएं पैदा हो सकती हैं.
प्रदेश में 3610 से अधिक निर्माण कर्ताओं को नोटिस
एमपी ट्रांसको ने ट्रांसमिशन लाइनों के राइट ऑफ वे (आरओडब्ल्यू) यानी निर्धारित सुरक्षा क्षेत्र में नियम विरुद्ध निर्माण के मामलों को गंभीरता से लिया है. कंपनी की ओर से प्रदेश के अलग-अलग स्थानों पर ऐसे निर्माणों के संबंध में 3610 से अधिक नोटिस जारी किए जा चुके हैं. इन नोटिसों के माध्यम से संबंधित निर्माणकर्ताओं को विद्युत लाइनों के आसपास निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करने के लिए आगाह किया गया है.
दरअसल, बिजली की उच्च क्षमता वाली ट्रांसमिशन लाइनें शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों तक विद्युत आपूर्ति पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं. इन लाइनों के आसपास पर्याप्त खाली जगह रखना आवश्यक होता है, ताकि विद्युत प्रवाह के दौरान सुरक्षा बनी रहे और जरूरत पड़ने पर तकनीकी कर्मचारी आसानी से रखरखाव का काम कर सकें. इसके बावजूद शहरी विस्तार और तेजी से बढ़ते निर्माण कार्यों के कारण कई स्थानों पर निर्धारित सुरक्षा क्षेत्र में भवन और अन्य संरचनाएं खड़ी हो गई हैं.
भोपाल में तीन प्रमुख 132 केवी लाइनों के आसपास 853 नोटिस
राजधानी भोपाल में भी प्रतिबंधित कॉरिडोर के भीतर हुए निर्माणों को लेकर कार्रवाई तेज की जा रही है. यहां तीन प्रमुख 132 केवी ट्रांसमिशन लाइनों के राइट ऑफ वे क्षेत्र में नियम विरुद्ध निर्माण के संबंध में अब तक 853 नोटिस जारी किए जा चुके हैं.
एमपी ट्रांसको भोपाल के अधीक्षण अभियंता सुधीर नेमा के अनुसार, भोपाल-गोविंदपुरा से बैरागढ़ टैप-लालघाटी, भोपाल-आईटी पार्क और भोपाल-अमरावती खुर्द 132 केवी ट्रांसमिशन लाइनों के आसपास विभिन्न क्षेत्रों में निर्माण सामने आए हैं. इन क्षेत्रों में बढ़ते शहरी विस्तार के कारण विद्युत सुरक्षा मानकों का पालन कराना चुनौतीपूर्ण हो रहा है.
गोविंदपुरा औद्योगिक क्षेत्र, करोंद, नारियलखेड़ा, देवकीनंदन नगर, बैरागढ़, आनंद नगर, जैन कॉलोनी, कलियासोत और रतनपुर सहित आसपास के इलाकों में ऐसे निर्माणों को लेकर संबंधित लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं. कंपनी का उद्देश्य निर्धारित सुरक्षा क्षेत्र को अतिक्रमण और अनधिकृत निर्माण से मुक्त रखना है, जिससे भविष्य में किसी गंभीर दुर्घटना की आशंका को कम किया जा सके.
132 केवी लाइन से 27 और 220 केवी से 35 मीटर की दूरी जरूरी
ट्रांसमिशन लाइनों के आसपास निर्माण के लिए निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य है. एमपी ट्रांसको के अनुसार, 132 केवी ट्रांसमिशन लाइन के दोनों ओर 27 मीटर और 220 केवी ट्रांसमिशन लाइन के दोनों ओर 35 मीटर का सुरक्षा कॉरिडोर निर्धारित है.
इस क्षेत्र का उद्देश्य केवल निर्माण कार्यों को सीमित करना नहीं है, बल्कि बिजली लाइनों के सुरक्षित संचालन और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है. उच्च वोल्टेज वाली विद्युत लाइनों के आसपास निर्धारित दूरी का पालन नहीं होने पर दुर्घटना का खतरा पैदा हो सकता है. विशेष रूप से भवनों की ऊंचाई बढ़ाने, छतों पर निर्माण करने या अन्य संरचनाएं खड़ी करने से विद्युत लाइनों के साथ खतरनाक स्थिति बन सकती है.
कंपनी ने नागरिकों से अपील की है कि ट्रांसमिशन लाइनों के आसपास किसी भी प्रकार का निर्माण करने से पहले निर्धारित सुरक्षा मानकों और संबंधित नियमों की जानकारी अवश्य लें. बिना आवश्यक अनुमति और सुरक्षा मानकों की जांच के निर्माण करना भविष्य में गंभीर परेशानी का कारण बन सकता है.
जबलपुर हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद बढ़ी कार्रवाई की गंभीरता
प्रतिबंधित कॉरिडोर में निर्माण का मामला न्यायिक स्तर पर भी पहुंच चुका है. जबलपुर में ट्रांसमिशन लाइनों के प्रतिबंधित क्षेत्र में निर्माण की अनुमति दिए जाने से संबंधित मामले में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण रुख अपनाया है.
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ऊर्जा एवं नगरीय विकास विभाग के अपर मुख्य सचिवों सहित 10 अधिकारियों से जवाब मांगा है. न्यायालय के इस कदम के बाद प्रतिबंधित कॉरिडोर में निर्माण की अनुमति, संबंधित विभागों की जिम्मेदारी और विद्युत सुरक्षा नियमों के पालन का मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है.
मामले में यह सवाल भी अहम है कि जब ट्रांसमिशन लाइनों के आसपास सुरक्षा के लिए स्पष्ट मानक निर्धारित हैं, तो फिर प्रतिबंधित क्षेत्रों में निर्माण कैसे होते रहे. निर्माण की अनुमति देने वाली एजेंसियों और सुरक्षा मानकों की निगरानी करने वाले विभागों की भूमिका को लेकर भी जवाबदेही का प्रश्न उठ रहा है.
निर्माण की अनुमति और विभागीय निगरानी पर उठे सवाल
शहरी क्षेत्रों में आबादी बढ़ने के साथ आवासीय कॉलोनियों, व्यावसायिक परिसरों और औद्योगिक इकाइयों का विस्तार तेजी से हुआ है. कई स्थानों पर विकास कार्यों के दौरान बिजली की बड़ी ट्रांसमिशन लाइनों के आसपास भी निर्माण गतिविधियां बढ़ी हैं. ऐसे में नगर नियोजन, स्थानीय प्रशासन और बिजली विभाग के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत महसूस की जा रही है.
यदि निर्माण की अनुमति देने से पहले संबंधित क्षेत्र की विद्युत संरचनाओं और निर्धारित सुरक्षा दूरी की जांच नहीं की जाती है, तो बाद में ऐसी इमारतों को लेकर विवाद और कार्रवाई की स्थिति बन सकती है. यही वजह है कि प्रतिबंधित कॉरिडोर में निर्माण रोकने के लिए शुरुआती स्तर पर ही निगरानी और अनुमति प्रक्रिया को प्रभावी बनाने की आवश्यकता है.
प्रशासन के सहयोग से जागरूकता अभियान चलाएगी कंपनी
एमपी ट्रांसको केवल नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि स्थानीय प्रशासन के सहयोग से जागरूकता अभियान चलाने की भी तैयारी कर रही है. इस अभियान के माध्यम से नागरिकों, निर्माणकर्ताओं और संबंधित एजेंसियों को ट्रांसमिशन लाइनों के आसपास लागू विद्युत सुरक्षा मानकों की जानकारी दी जाएगी.
कंपनी का मानना है कि लोगों को प्रतिबंधित कॉरिडोर और उससे जुड़े खतरों की जानकारी होना जरूरी है. कई बार निर्माणकर्ता निर्धारित सुरक्षा दूरी की जानकारी के अभाव में भी ऐसे निर्माण कर लेते हैं, जो बाद में उनके लिए परेशानी का कारण बनते हैं. जागरूकता अभियान के जरिए इस तरह की स्थितियों को रोकने का प्रयास किया जाएगा.
जानलेवा हादसों के साथ बिजली आपूर्ति पर भी पड़ सकता है असर
प्रतिबंधित कॉरिडोर में अनधिकृत निर्माण का सबसे गंभीर पहलू विद्युत दुर्घटनाओं का खतरा है. हाईटेंशन लाइनों के आसपास असुरक्षित निर्माण, ऊंची संरचनाएं और अन्य गतिविधियां लोगों की जान के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं. इसके अलावा ट्रांसमिशन लाइनों में तकनीकी खराबी आने पर मरम्मत कार्य करना भी मुश्किल हो सकता है.
इससे बिजली आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है. इसलिए यह मामला केवल कुछ निर्माणों को हटाने या नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश की विद्युत सुरक्षा और बिजली व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने से भी जुड़ा हुआ है.
अब जबलपुर हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद प्रदेशभर में प्रतिबंधित कॉरिडोर के निर्माणों पर कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं. 3610 से अधिक नोटिस जारी होना इस समस्या के व्यापक स्वरूप को सामने लाता है. आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नोटिस के बाद संबंधित निर्माणकर्ताओं पर क्या कार्रवाई होती है और प्रतिबंधित क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए प्रशासन तथा बिजली विभाग किस तरह की ठोस व्यवस्था लागू करते हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

