जबलपुर. मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने मान्यता नवीनीकरण का आवेदन खारिज होने के बावजूद विद्यार्थियों को दाखिला देने वाले एक स्कूल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है. अदालत ने स्कूल की याचिका खारिज करते हुए कहा कि संस्था को पहले से पता था कि उसकी मान्यता का नवीनीकरण नहीं हुआ है और निर्धारित कमियों के बावजूद उसने विद्यार्थियों को प्रवेश दिया तथा उनसे फीस भी वसूल की. यह संस्थान की गंभीर लापरवाही है. न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने स्कूल प्रबंधन को निर्देश दिया कि विद्यार्थियों से वसूली गई पूरी फीस 30 दिनों के भीतर वापस की जाए. हालांकि, अदालत ने विद्यार्थियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए शिक्षा विभाग के अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि प्रभावित बच्चों का दाखिला किसी अन्य स्कूल में कराया जाए और उनकी परीक्षा के आवेदन समय पर भरे जा सकें. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संस्था की गलती का खामियाजा विद्यार्थियों को नहीं भुगतना चाहिए.
मान्यता नवीनीकरण का आवेदन हुआ था निरस्त
मामले में संबंधित स्कूल का संचालन बंस पई शिक्षा एवं स्वास्थ्य समिति नामक सोसायटी द्वारा किया जा रहा था. इस सोसायटी का पंजीयन मध्यप्रदेश सोसायटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1973 के तहत 8 अक्टूबर 2007 को कराया गया था. संस्था ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए स्कूल की मान्यता के नवीनीकरण का ऑनलाइन आवेदन 15 दिसंबर 2025 को लोक शिक्षण संचालनालय के संयुक्त संचालक के समक्ष प्रस्तुत किया था.
हालांकि, संबंधित प्राधिकारी ने निर्धारित पात्रता और आवश्यक मानकों को पूरा नहीं किए जाने के आधार पर आवेदन निरस्त कर दिया. इसके बाद स्कूल प्रबंधन ने 6 मार्च 2026 को संयुक्त संचालक के समक्ष अपील दायर की, लेकिन वहां से भी उसे राहत नहीं मिली. इसके बाद संस्था ने दूसरी अपील का रास्ता अपनाया, लेकिन वहां भी उसकी मांग स्वीकार नहीं की गई.
लगातार आवेदन और अपील खारिज होने के बाद स्कूल प्रबंधन ने मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर कर राहत मांगी. संस्था ने मान्यता नवीनीकरण से जुड़े आदेश को चुनौती देते हुए अपने पक्ष में हस्तक्षेप करने की मांग की थी.
मान्यता नहीं होने के बावजूद विद्यार्थियों को दिए दाखिले
सुनवाई के दौरान स्कूल प्रबंधन की ओर से दलील दी गई कि मान्यता नवीनीकरण का आवेदन खारिज होने के कारण वहां पहले से प्रवेश ले चुके विद्यार्थियों का भविष्य संकट में पड़ गया है. संस्था ने अदालत को बताया कि इस स्थिति का सबसे ज्यादा नुकसान उन बच्चों को होगा, जिन्होंने स्कूल में दाखिला लिया है और अपनी पढ़ाई जारी रख रहे हैं.
स्कूल की ओर से यह भी कहा गया कि संस्था ने संबंधित शैक्षणिक सत्र के लिए संबद्धता शुल्क जमा कर दिया था और वह लागू नियमों एवं शर्तों का पालन करने के लिए तैयार है. याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में हाई कोर्ट के वर्ष 2022 के WP 21557 मामले का भी हवाला दिया, जिसमें अदालत ने अंतरिम राहत प्रदान की थी.
स्कूल प्रबंधन का तर्क था कि मान्यता नवीनीकरण से जुड़े विवाद के कारण विद्यार्थियों की शैक्षणिक स्थिति प्रभावित हो सकती है. इसलिए संस्था को राहत दी जानी चाहिए, ताकि बच्चों की पढ़ाई और भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.
हाई कोर्ट ने पूछा मान्यता नहीं थी तो दाखिला क्यों दिया
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने स्कूल प्रबंधन के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया. अदालत ने पूछा कि जब संस्था को पहले से जानकारी थी कि उसकी मान्यता का नवीनीकरण नहीं हुआ है, तो उसने विद्यार्थियों को दाखिला कैसे दे दिया?
अदालत ने जानना चाहा कि मान्यता संबंधी स्थिति स्पष्ट नहीं होने के बावजूद स्कूल ने किस आधार पर विद्यार्थियों को प्रवेश दिया और उनसे फीस क्यों वसूली. याचिकाकर्ता की ओर से इस सवाल का संतोषजनक स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया जा सका.
पीठ ने संस्था के इस आचरण को गंभीर लापरवाही माना. अदालत ने कहा कि स्कूल को अपनी मान्यता से जुड़ी कमियों और नवीनीकरण नहीं होने की जानकारी थी. इसके बावजूद उसने बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को दाखिला दिया और उनसे फीस भी प्राप्त की, जबकि वह ऐसा करने के लिए पात्र नहीं था.
संस्था की लापरवाही पर कोर्ट ने अपनाया सख्त रुख
न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता संस्था सभी कमियों और मान्यता नवीनीकरण नहीं होने की जानकारी के बावजूद लापरवाही से काम कर रही थी. ऐसी स्थिति में अदालत याचिका स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है.
पीठ ने कहा कि स्कूल विद्यार्थियों को प्रवेश देने की स्थिति में नहीं था, इसके बावजूद उसने बड़ी संख्या में बच्चों को दाखिला दिया और उनसे फीस वसूली. संस्था को ऐसा करने का अधिकार नहीं था.
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिका में दूसरी अपीलीय अथॉरिटी द्वारा अपील खारिज किए जाने के संबंध में पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई. इस पहलू को भी सुनवाई के दौरान ध्यान में रखा गया.
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी शैक्षणिक संस्था की जिम्मेदारी केवल विद्यार्थियों से फीस लेकर उन्हें प्रवेश देना नहीं है, बल्कि उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि वह निर्धारित नियमों और मान्यता संबंधी शर्तों के अनुरूप ही शैक्षणिक गतिविधियां संचालित करे.
30 दिन में विद्यार्थियों की पूरी फीस लौटाने का आदेश
स्कूल प्रबंधन के आचरण को देखते हुए हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. इसके साथ ही संस्था को विद्यार्थियों से वसूली गई फीस 30 दिनों के भीतर वापस करने का स्पष्ट निर्देश दिया.
अदालत का यह आदेश उन विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्होंने स्कूल की मान्यता की स्थिति के बीच दाखिला लेकर फीस जमा की थी. अब संस्था को निर्धारित समयसीमा में फीस लौटानी होगी.
पीठ ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि मान्यता नवीनीकरण में स्कूल की विफलता और प्रबंधन की लापरवाही के कारण विद्यार्थियों का शैक्षणिक नुकसान नहीं होना चाहिए. बच्चों के भविष्य को सुरक्षित रखना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है.
दूसरे स्कूल में दाखिला और परीक्षा फार्म भरवाने की जिम्मेदारी शिक्षा विभाग की
हाई कोर्ट ने मामले में केवल स्कूल को फीस लौटाने का आदेश देकर अपनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं की, बल्कि प्रभावित विद्यार्थियों के भविष्य की सुरक्षा के लिए लोक शिक्षण संचालनालय के वरिष्ठ अधिकारियों को भी निर्देश जारी किए.
अदालत ने भोपाल स्थित लोक शिक्षण संचालनालय के आयुक्त और नर्मदापुरम संभाग के संयुक्त संचालक को निर्देश दिया कि वे तत्काल आवश्यक कदम उठाएं, ताकि संबंधित स्कूल में पढ़ रहे विद्यार्थियों की शिक्षा प्रभावित न हो.
पीठ ने कहा कि विद्यार्थियों का किसी अन्य स्कूल में दाखिला सुनिश्चित किया जाए. इसके साथ ही उनके परीक्षा आवेदन फार्म भी निर्धारित समय पर भरवाए जाएं, ताकि मान्यता विवाद के कारण उनकी परीक्षा में शामिल होने की पात्रता या शैक्षणिक प्रगति प्रभावित न हो.
अदालत ने इस जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाने पर जोर दिया. उसका स्पष्ट संदेश था कि स्कूल प्रबंधन की गलती का दंड विद्यार्थियों को नहीं मिलना चाहिए. जिन बच्चों ने संस्था पर भरोसा करके प्रवेश लिया है, उनके शैक्षणिक हितों की रक्षा करना आवश्यक है.
स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभाग दोनों की जवाबदेही महत्वपूर्ण
इस फैसले में हाई कोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों की जवाबदेही के साथ विद्यार्थियों के हितों को भी प्रमुखता दी है. अदालत के रुख से स्पष्ट है कि मान्यता नवीनीकरण नहीं होने की जानकारी के बावजूद दाखिले देना स्वीकार्य नहीं है. स्कूल प्रबंधन को नियमों के अनुरूप ही प्रवेश प्रक्रिया संचालित करनी चाहिए.
वहीं, प्रभावित विद्यार्थियों को दूसरे स्कूलों में प्रवेश दिलाने और परीक्षा संबंधी औपचारिकताएं पूरी कराने का निर्देश शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी को भी रेखांकित करता है.
इस मामले में याचिकाकर्ता स्कूल की ओर से अधिवक्ता योगेश लोखंडे ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता गजेंद्र पराशर उपस्थित हुए. हाई कोर्ट ने स्कूल की याचिका खारिज करते हुए फीस वापसी और विद्यार्थियों के भविष्य की सुरक्षा से जुड़े निर्देश जारी किए.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

