हत्या के समय पर पाचन प्रक्रिया का तर्क सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज, 25 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में 7 दोषियों को राहत नहीं

हत्या के समय पर पाचन प्रक्रिया का तर्क सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज, 25 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में 7 दोषियों को राहत नहीं

प्रेषित समय :19:05:25 PM / Wed, Nov 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. हत्या के मामलों में घटना के समय को लेकर मेडिकल साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के बीच अंतर होने पर किसे अधिक महत्व दिया जाना चाहिए, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब रिकॉर्ड पर विश्वसनीय चश्मदीद गवाह मौजूद हों और वे घटना के समय के बारे में स्पष्ट बयान दे रहे हों, तब केवल पाचन प्रक्रिया (डाइजेस्टिव प्रोसेस) के आधार पर लगाए गए अनुमानों से उनकी गवाही को गलत साबित नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि भोजन के पाचन के आधार पर मृत्यु का समय निर्धारित करने के अनुमान अनिश्चित हो सकते हैं और इनके आधार पर भरोसेमंद प्रत्यक्षदर्शियों के मौखिक साक्ष्य को खारिज करना उचित नहीं है.

जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने वर्ष 2001 में कर्नाटक में दो सगे भाइयों की हत्या के मामले में सात दोषियों की अपील खारिज करते हुए उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखी. अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें सेशन कोर्ट द्वारा आरोपियों को बरी करने के आदेश को पलट दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मृतकों की पत्नियां होने के कारण महिला गवाहों की विश्वसनीयता पर स्वतः संदेह नहीं किया जा सकता. यदि उनकी गवाही स्वाभाविक, भरोसेमंद और अन्य साक्ष्यों से समर्थित है, तो उसे पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए.

2001 में रात के समय कुल्हाड़ी से की गई थी दो भाइयों की हत्या

यह मामला 8 और 9 सितंबर 2001 की दरमियानी रात कर्नाटक में हुई दो भाइयों की हत्या से जुड़ा है. अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने रात के समय दोनों भाइयों पर कुल्हाड़ी से हमला किया था, जिससे उनकी मौत हो गई. इस पूरी वारदात को मृतकों की पत्नियों ने अपनी आंखों से देखा था. उन्होंने अदालत में घटना के संबंध में प्रत्यक्षदर्शी के रूप में बयान दिए और बताया कि दोनों हत्याएं रात करीब एक बजे के आसपास हुई थीं.

मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट से दोनों भाइयों की मौत हिंसक हमले के कारण होने की पुष्टि हुई थी. इसके अलावा आरोपियों के बयानों के आधार पर वारदात में इस्तेमाल की गई कुल्हाड़ी भी बरामद की गई थी. इस प्रकार अभियोजन पक्ष के पास प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही के साथ-साथ मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी मौजूद थे.

सेशन कोर्ट ने पाचन प्रक्रिया के अनुमान को बनाया था आधार

मामले की सुनवाई के दौरान सेशन कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की प्रत्यक्षदर्शी गवाही पर संदेह जताते हुए आरोपियों को बरी कर दिया था. अदालत ने मेडिकल साक्ष्य और गवाहों के बयानों के बीच अंतर को अपने फैसले का महत्वपूर्ण आधार बनाया.

पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने बताया था कि दोनों मृतकों की मृत्यु के समय में लगभग चार घंटे का अंतर था. दूसरी ओर, प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया था कि दोनों भाइयों की हत्या रात करीब एक बजे हुई. उन्होंने यह भी कहा था कि रात लगभग दस बजे भोजन तैयार हुआ था और उसके बाद परिवार के सदस्यों ने खाना खाया था.

सेशन कोर्ट ने भोजन के पाचन की प्रक्रिया के आधार पर मृत्यु के समय को लेकर अनुमान लगाया और इसी आधार पर प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर संदेह किया. अदालत ने मेडिकल साक्ष्य और मौखिक गवाही के बीच अंतर को अभियोजन पक्ष के मामले के विरुद्ध माना. इसी के आधार पर आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया.

हाईकोर्ट ने पलटा बरी करने का फैसला

सेशन कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए मामला कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा. हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए आरोपियों को बरी करने का आदेश पलट दिया और उनकी दोषसिद्धि बहाल कर दी.

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सवाल उठाया कि यदि दोनों भाइयों की हत्या एक ही स्थान के आसपास हुई थी, तो दोनों घटनाओं के बीच चार घंटे का अंतर कैसे संभव माना जा सकता है? अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण परिस्थिति पर समुचित विचार नहीं किया. हाईकोर्ट के अनुसार, अभियोजन पक्ष के प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और घटनाक्रम की परिस्थितियां सेशन कोर्ट के निष्कर्षों से मेल नहीं खाती थीं.

इसके बाद दोषियों ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. उनकी ओर से मेडिकल साक्ष्य और भोजन के पाचन की प्रक्रिया को आधार बनाकर अभियोजन पक्ष की कहानी पर संदेह जताया गया.

विश्वसनीय चश्मदीद गवाही के सामने पाचन प्रक्रिया का अनुमान पर्याप्त नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के निष्कर्षों का समर्थन किया. जस्टिस केवी विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि अपीलकर्ताओं के वकील ने पाचन प्रक्रिया के अनिश्चित आधार पर अभियोजन पक्ष की कहानी को संदिग्ध बनाने की कोशिश की, लेकिन तथ्यों के आधार पर यह दलील स्वीकार करने योग्य नहीं है.

पीठ ने स्पष्ट किया कि जब रिकॉर्ड पर ऐसे विश्वसनीय चश्मदीद गवाह मौजूद हों, जो घटना के समय के बारे में स्पष्ट रूप से बता रहे हों, तब केवल पाचन प्रक्रिया के अनुमान के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. अदालत ने कहा कि किसी भी स्थिति में केवल ऐसे अनुमानों के आधार पर प्रत्यक्षदर्शियों की मौखिक गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता.

अदालत के मुताबिक, इस मामले में गवाहों ने स्पष्ट रूप से बताया था कि वारदात 8 सितंबर 2001 और 9 सितंबर 2001 की दरमियानी रात करीब एक बजे हुई थी. रिकॉर्ड के अनुसार, रात लगभग दस बजे भोजन तैयार किया गया और उसके बाद खाना खाया गया था. दोनों हत्याएं एक के बाद एक कम समय के अंतराल में हुई थीं. इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने डॉक्टर के एक सवाल के जवाब में दिए गए अनुमान को अत्यधिक महत्व देते हुए प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पर संदेह किया. सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को उचित नहीं माना.

मृतकों की पत्नियां होने से गवाहों की गवाही कमजोर नहीं हो जाती

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में प्रत्यक्षदर्शियों के रिश्तेदार होने के पहलू पर भी महत्वपूर्ण बात कही. अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी गवाह का मृतक का रिश्तेदार होना अपने आप में उसकी गवाही को अविश्वसनीय बनाने का आधार नहीं है. हत्या जैसी घटना में परिवार के सदस्य स्वाभाविक रूप से घटनास्थल पर मौजूद हो सकते हैं और यदि उन्होंने घटना देखी है तो उनकी गवाही का मूल्यांकन अन्य गवाहों की तरह उसकी विश्वसनीयता के आधार पर किया जाना चाहिए.

इस मामले में मृतकों की पत्नियों ने वारदात को अपनी आंखों से देखने की बात कही थी. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गवाही को केवल रिश्तेदारी के आधार पर खारिज करने के दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया. अदालत के फैसले का मूल संदेश यह है कि गवाह की विश्वसनीयता का निर्धारण उसके बयान की सच्चाई, स्वाभाविकता और उपलब्ध साक्ष्यों से उसके मेल के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल मृतक के साथ उसके पारिवारिक संबंध के आधार पर.

इन्क्वेस्ट रिपोर्ट में नाम नहीं होने से भी गवाही खारिज नहीं होगी

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के एक अन्य तर्क को भी खारिज किया. सेशन कोर्ट ने इस बात को महत्व दिया था कि मृतकों के इन्क्वेस्ट पंचनामा (मृत्यु जांच रिपोर्ट) में चश्मदीद गवाहों के नाम दर्ज नहीं थे. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता.

पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 174 का उल्लेख किया, जिसका वर्तमान समकक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 194 है. अदालत ने बताया कि इन्क्वेस्ट रिपोर्ट तैयार करने का मुख्य उद्देश्य मृत्यु के स्पष्ट कारण और परिस्थितियों का पता लगाना है, विशेषकर यह देखना कि मृत्यु अप्राकृतिक या संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है या नहीं.

इस प्रक्रिया का उद्देश्य घटना का पूरा विवरण दर्ज करना, हमलावरों की पहचान करना या सभी चश्मदीद गवाहों के नाम लिखना नहीं है. अदालत ने अपने पूर्व निर्णय 'राधा मोहन सिंह उर्फ लाल साहेब बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' का भी उल्लेख किया. इस फैसले में इन्क्वेस्ट रिपोर्ट की सीमित भूमिका स्पष्ट की गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन्क्वेस्ट पंचनामा में किसी चश्मदीद का नाम दर्ज नहीं होना, अपने आप में अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर करने के लिए पर्याप्त नहीं है. इसलिए इस आधार पर प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता.

सात दोषियों की अपील खारिज, तत्काल सरेंडर करने का निर्देश

सभी तथ्यों, मेडिकल साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सातों दोषियों की अपील खारिज कर दी. अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए उनकी दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. साथ ही अपीलकर्ताओं को तत्काल आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया.

केस स्टेटस और सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

इस मामले का शीर्षक Shekappa & Ors. Versus State of Karnataka है. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने 4 नवंबर 2026 को उपलब्ध कराए गए समाचार विवरण के अनुसार दोषियों की अपील खारिज कर दी. मामले में अपीलकर्ताओं को राहत नहीं मिली और कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा बहाल की गई दोषसिद्धि बरकरार रही. केस का परिणाम Appeal Dismissed यानी अपील खारिज होना है. दोषियों को तत्काल सरेंडर करने का निर्देश दिया गया.

इस फैसले का आपराधिक न्याय व्यवस्था के लिए व्यापक महत्व है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मेडिकल साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही के बीच किसी अंतर का मूल्यांकन पूरे मामले के संदर्भ में होना चाहिए. पाचन प्रक्रिया जैसे अनिश्चित वैज्ञानिक अनुमानों को विश्वसनीय चश्मदीद बयानों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता. इसी तरह रिश्तेदार होना या इन्क्वेस्ट रिपोर्ट में नाम दर्ज न होना भी किसी गवाह की गवाही खारिज करने का स्वतः आधार नहीं बन सकता.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-