नई दिल्ली. आय से अधिक संपत्ति के मामले में सरकारी कर्मचारियों के पास बरामद सोने की मात्रा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि आयकर विभाग के सर्कुलर या वित्त मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में सोना रखने के लिए निर्धारित सीमा को भ्रष्टाचार के मामले में बचाव का आधार नहीं बनाया जा सकता. केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि संबंधित व्यक्ति के पास मौजूद सोना सरकारी दिशा-निर्देशों के तहत अनुमत मात्रा के भीतर है. आरोपी को यह भी बताना होगा कि उसके पास मौजूद संपत्ति का वैध स्रोत क्या है और उसका ज्ञात आय से किस प्रकार संबंध है.
जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्लि की पीठ ने यह टिप्पणी बिहार सरकार की अपील स्वीकार करते हुए की. अदालत ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक पूर्व बाल विकास परियोजना पदाधिकारी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में संपत्ति के स्रोत और उसके लेखा-जोखा की जांच को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है.
सोना रखने की अनुमति और संपत्ति का हिसाब देना अलग-अलग विषय
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को एक निश्चित मात्रा में सोना रखने की अनुमति होना और उस सोने के वैध स्रोत का हिसाब देना दो अलग-अलग कानूनी पहलू हैं. आयकर विभाग के निर्देश या वित्त मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति यह बता सकती है कि तलाशी के दौरान सामान्य परिस्थितियों में कितनी मात्रा में सोना जब्त नहीं किया जाएगा, लेकिन इससे आय से अधिक संपत्ति के आरोप का स्वतः समाधान नहीं हो जाता.
अदालत के अनुसार, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत यदि किसी लोकसेवक पर उसकी ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने का आरोप है, तो उसे संपत्ति के स्रोत और उसके वैध अर्जन के संबंध में स्पष्टीकरण देना होगा. केवल सरकारी सर्कुलर या प्रेस रिलीज दिखाकर संपत्ति का संतोषजनक हिसाब नहीं दिया जा सकता.
500, 250 और 100 ग्राम सोने की सीमा का दिया गया था हवाला
इस मामले में पटना हाईकोर्ट ने 11 मई 1994 के निर्देश संख्या 1916 और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) की 1 दिसंबर 2016 की प्रेस विज्ञप्ति का हवाला दिया था. इन दिशा-निर्देशों में विवाहित महिला के लिए 500 ग्राम, अविवाहित महिला के लिए 250 ग्राम और पुरुष के लिए 100 ग्राम तक सोना रखने की मात्रा का उल्लेख है.
मामले में पूर्व बाल विकास परियोजना पदाधिकारी और उनकी अविवाहित बेटी के पास कुल 646.400 ग्राम सोने के आभूषण पाए गए थे. हाईकोर्ट ने इन दोनों के पास मौजूद सोने की मात्रा को निर्धारित सीमा के भीतर मानते हुए निष्कर्ष निकाला था कि केवल इस आधार पर उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही निरस्त कर दी थी.
बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दी थी चुनौती
पटना हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि आयकर विभाग के सर्कुलर और प्रेस विज्ञप्ति का आय से अधिक संपत्ति के मामले में संपत्ति के वैध स्रोत का निर्धारण करने से कोई सीधा संबंध नहीं है. इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य तलाशी के दौरान सोने की जब्ती से संबंधित परिस्थितियों को स्पष्ट करना है, न कि भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी को आय के स्रोत का हिसाब देने से छूट देना.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के तर्कों को स्वीकार करते हुए माना कि हाईकोर्ट ने इन दिशा-निर्देशों को आय से अधिक संपत्ति के मामले में लागू करके कानूनी दृष्टि से गलत निष्कर्ष निकाला था.
धारा 13 के तहत आरोपी को देना होगा संपत्ति का स्पष्टीकरण
पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(e) और धारा 13(2) के संदर्भ में कहा कि आय से अधिक संपत्ति के आरोपों में आरोपी को अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के संबंध में स्पष्टीकरण देना होता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि सोना रखने की एक सामान्य सीमा निर्धारित करने वाले प्रशासनिक निर्देश किसी व्यक्ति की पूरी संपत्ति के वैध स्रोत का प्रमाण नहीं बन सकते.
इसका अर्थ यह है कि सोने की मात्रा निर्धारित सीमा के भीतर होने के बावजूद, यदि किसी लोकसेवक के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला बनता है, तो जांच और न्यायिक कार्यवाही में उसके स्रोत का परीक्षण किया जा सकता है. हालांकि, केवल सोना रखने की मात्रा के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता. मामले में आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होना आवश्यक है.
सुप्रीम कोर्ट ने बहाल की आपराधिक कार्यवाही, ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार की अपील स्वीकार करते हुए पटना हाईकोर्ट का 14 मई 2026 का आदेश निरस्त कर दिया. इसके साथ ही विशेष न्यायाधीश, निगरानी, पटना द्वारा 28 जनवरी 2021 को पारित संज्ञान लेने का आदेश बहाल कर दिया गया. अदालत ने निर्देश दिया कि विशेष मामला संख्या 20/2015 की कार्यवाही अब उसी चरण से आगे बढ़ेगी, जहां उसे रोका गया था.
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रतिवादी के पास कानून के तहत ट्रायल कोर्ट के समक्ष अन्य उपलब्ध कानूनी आधार उठाने की स्वतंत्रता रहेगी. उन आधारों पर विचार करते समय ट्रायल कोर्ट सुप्रीम कोर्ट अथवा हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना स्वतंत्र रूप से निर्णय करेगा.
केस स्टेटस और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की महत्वपूर्ण जानकारी
इस मामले का शीर्षक State of Bihar vs. Phulpari Kumari है. सुप्रीम कोर्ट में यह आपराधिक अपील संख्या 5212/2026 के रूप में दर्ज हुआ, जो विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 15711/2026 से उत्पन्न हुई थी. मामले की सुनवाई जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने की.
सुप्रीम कोर्ट ने 2 नवंबर 2026 को आदेश पारित करते हुए बिहार सरकार की अपील स्वीकार कर ली. इसका केस स्टेटस Appeal Allowed है. अदालत ने पटना हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर विशेष न्यायाधीश, निगरानी, पटना का 28 जनवरी 2021 का संज्ञान आदेश पुनः प्रभावी कर दिया. अब मामला ट्रायल कोर्ट में आगे चलेगा.
इस फैसले का महत्वपूर्ण कानूनी संदेश यह है कि सोना रखने की अनुमत सीमा को आय से अधिक संपत्ति के आरोपों का स्वतः बचाव नहीं माना जा सकता. सरकारी कर्मचारी को अपनी संपत्ति के वैध स्रोत का हिसाब देना होगा. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर आरोपी को दोषी घोषित नहीं किया है, बल्कि उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही दोबारा शुरू करने का रास्ता साफ किया है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

