अनजाने में टाइपिंग की गलती पर जज को नहीं ठहरा सकते लापरवाह, राजस्थान हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियां हटाईं

अनजाने में टाइपिंग की गलती पर जज को नहीं ठहरा सकते लापरवाह, राजस्थान हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियां हटाईं

प्रेषित समय :19:17:58 PM / Wed, Nov 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. न्यायिक फैसले लिखते समय अनजाने में हुई टाइपिंग की गलतियों के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी की कार्यशैली, योग्यता और ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि निर्णय में हुई टाइपिंग संबंधी त्रुटियों का मामले के अंतिम परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, तो इसके लिए संबंधित न्यायिक अधिकारी की कठोर आलोचना करना उचित नहीं है. शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा एक महिला विशेष न्यायाधीश के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ऐसी टिप्पणियां करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है.

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की पीठ ने राजस्थान न्यायिक सेवा की जिला जज संवर्ग की एक महिला अधिकारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया. संबंधित न्यायिक अधिकारी उस समय राजस्थान के झुंझुनू जिले में पॉक्सो (POCSO) मामलों की विशेष न्यायाधीश के रूप में पदस्थ थीं. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में की गई कठोर टिप्पणियों और उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले निर्देशों को निरस्त कर दिया.

दो मामलों के फैसलों में शामिल हो गए थे एक-दूसरे के तथ्य

मामले के अनुसार, संबंधित महिला न्यायिक अधिकारी ने दो अलग-अलग मामलों में फैसले सुनाए थे. निर्णय लिखने के दौरान अनजाने में एक मामले के कुछ साक्ष्य और आंकड़े दूसरे मामले के फैसले में भी शामिल हो गए. इसमें अभियोजन पक्ष के गवाहों के सीरियल नंबरों में गलतियां और दोनों मामलों से संबंधित तथ्यों का एक-दूसरे में आ जाना शामिल था.

इन त्रुटियों को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां की थीं. हाईकोर्ट ने कहा था कि न्यायिक अधिकारी फैसले लिखने में पर्याप्त समय नहीं दे रही हैं और पूरी तरह से स्टेनोग्राफर पर निर्भर हैं. हाईकोर्ट ने यहां तक टिप्पणी कर दी थी कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बच रही हैं और न्यायिक सेवा में बने रहने की हकदार नहीं हैं.

हाईकोर्ट ने प्रशिक्षण देने और ACR में आदेश शामिल करने के दिए थे निर्देश

राजस्थान हाईकोर्ट ने केवल प्रतिकूल टिप्पणियां ही नहीं की थीं, बल्कि राजस्थान न्यायिक अकादमी के प्रभारी को संबंधित न्यायिक अधिकारी को फैसला लिखने का प्रशिक्षण देने का निर्देश भी दिया था. इसके अलावा हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति वर्ष 2024 की अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में शामिल करने का निर्देश दिया था.

इससे संबंधित न्यायिक अधिकारी के सेवा रिकॉर्ड और भविष्य के करियर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका पैदा हो गई थी. अधिकारी ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपने खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग की.

न्यायिक अधिकारी ने बताया टाइपिंग की अनजाने में हुई थीं गलतियां

सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायिक अधिकारी की ओर से बताया गया कि फैसलों में हुई गलतियां जानबूझकर नहीं की गई थीं. ये केवल अनजाने में हुई टाइपिंग संबंधी त्रुटियां थीं. इन गलतियों से न तो फैसले के अंतिम परिणाम पर कोई असर पड़ा और न ही निर्णय के मूल अर्थ में कोई बदलाव आया.

अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों मामले आपस में काफी गहराई से जुड़े हुए थे. दोनों में गवाह और मुख्य साक्ष्य लगभग एक जैसे थे. इसी कारण फैसले तैयार करते समय कुछ तथ्यों और विवरणों का आपस में मिल जाना संभव हुआ.

उन्होंने अपनी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए बताया कि सीमित संसाधनों और स्टेनोग्राफर के अवकाश पर होने के कारण यह अनजाने में हुई चूक थी. उनका तर्क था कि ऐसी त्रुटियों को सुधारने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी, लेकिन इसके आधार पर उनके खिलाफ व्यक्तिगत और करियर को प्रभावित करने वाली प्रतिकूल टिप्पणियां करना उचित नहीं था.

बिना पक्ष सुने प्रतिकूल टिप्पणी करना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी के स्पष्टीकरण और मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की टिप्पणियों को अनावश्यक बताया. पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा अपीलकर्ता न्यायिक अधिकारी के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियां और आलोचनाएं टाली जा सकती थीं.

अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि न्यायिक अधिकारी को अपना पक्ष रखने या त्रुटियों के संबंध में स्पष्टीकरण देने का अवसर दिए बिना ही उनके खिलाफ कठोर टिप्पणियां कर दी गईं.

पीठ ने कहा कि इस प्रकार की टिप्पणियां प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं. किसी न्यायिक अधिकारी के कार्य में त्रुटि सामने आने पर उसका मूल्यांकन उचित प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए. संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना उसके पेशेवर आचरण और क्षमता पर गंभीर सवाल उठाना उचित नहीं है.

जिला न्यायपालिका के अधिकारियों के संरक्षक की भूमिका में है हाईकोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हाईकोर्ट की संवैधानिक और प्रशासनिक भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट को अधीनस्थ न्यायपालिका पर पर्यवेक्षी अधिकार प्राप्त हैं. इस अधिकार का इस्तेमाल करते समय हाईकोर्ट को अधिक उदारता और उचित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए.

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट राज्य की जिला न्यायपालिका के अधिकारियों का संरक्षक होता है. इसलिए उसे अपने अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के मार्गदर्शन और संरक्षण की भूमिका सही भावना के साथ निभानी चाहिए.

अदालत के अनुसार, न्यायिक अधिकारी के फैसले में हुई ऐसी अनजाने टाइपिंग की गलतियों के लिए उसे फटकारना, जिनका मामले के परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, पूरी तरह टाला जा सकता था. इस तरह की प्रतिकूल टिप्पणियां संबंधित अधिकारी के करियर को नुकसान पहुंचा सकती हैं और जिला न्यायपालिका के अन्य अधिकारियों पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं.

हाईकोर्ट की कठोर टिप्पणियां और ACR संबंधी निर्देश निरस्त

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध परिस्थितियों में वह हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं है कि संबंधित न्यायिक अधिकारी 20 जनवरी 2024 को फैसला सुनाते समय अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रही थीं.

पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के 1 मई 2025 के आदेश के पैराग्राफ 9, 10 और 11 में न्यायिक अधिकारी के खिलाफ की गई कठोर टिप्पणियों और आलोचनाओं को हटा दिया. इसके साथ ही पैराग्राफ 17 और 18 में प्रशिक्षण तथा अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में प्रतिकूल निर्देश शामिल करने से संबंधित आदेशों को भी निरस्त कर दिया.

अदालत ने निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रति राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए, ताकि इसे मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके.

केस स्टेटस और सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

इस मामले का शीर्षक In Re: XXX, A Judicial Officer in the District Judge Cadre of Rajasthan Judicial Services है. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की पीठ ने 3 नवंबर 2026 को संबंधित न्यायिक अधिकारी को राहत देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों और ACR संबंधी निर्देशों को निरस्त कर दिया.

इस फैसले के तहत न्यायिक अधिकारी की याचिका स्वीकार की गई और विवादित टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया गया. यानी संबंधित अधिकारी के खिलाफ की गई आलोचनात्मक टिप्पणियां और प्रशिक्षण तथा ACR में प्रतिकूल निर्देश देने वाले आदेश अब प्रभावी नहीं रहेंगे.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का महत्व केवल एक न्यायिक अधिकारी को राहत देने तक सीमित नहीं है. यह अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारियों के सम्मान, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और हाईकोर्ट की पर्यवेक्षी शक्तियों के उचित इस्तेमाल से जुड़ा महत्वपूर्ण संदेश देता है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक कार्य में हुई अनजाने मानवीय त्रुटियों को सुधारने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, न कि उनके आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी के पेशेवर भविष्य पर प्रतिकूल टिप्पणी की जानी चाहिए.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-