चेन्नई. ट्रेन में सफर करने वाले यात्रियों के लिए स्लीपर बर्थ के इस्तेमाल को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने भारतीय रेलवे के उस नियम को बरकरार रखा है, जिसके तहत आरक्षित कोच में रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक ही सोने के लिए बर्थ का इस्तेमाल किया जा सकता है. दिन में सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक इन बर्थ का उपयोग बैठने के लिए किया जाना चाहिए. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था किसी एक यात्री की सुविधा के बजाय एक ही कोच में सफर कर रहे सभी यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखकर बनाई गई है.
मद्रास हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश एसए धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने रेलवे के इस नियम को चुनौती देने वाली अपील खारिज कर दी. यह अपील चेन्नई निवासी एस. बालासुब्रमणियन ने दायर की थी. उन्होंने भारतीय रेलवे के कमर्शियल मैनुअल के पैरा 652 (ए) में निर्धारित सोने के समय पर सवाल उठाया था. उनका कहना था कि कुछ विशेष परिस्थितियों में यात्रियों को निर्धारित समय के अतिरिक्त भी सोने की सुविधा मिलनी चाहिए.
अदालत ने माना कि रेलवे का यह नियम यात्रियों के बीच सुविधा का संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है. यदि दिन के समय भी कुछ यात्री अपनी बर्थ पर लेटे रहें तो मिडिल और अपर बर्थ पाने वाले यात्रियों के लिए बैठने की जगह सीमित हो सकती है. इसलिए निर्धारित समय का पालन सभी यात्रियों के हित में है.
क्या है रेलवे का सोने और बैठने का नियम
भारतीय रेलवे के कमर्शियल मैनुअल के पैरा 652 (ए) के अनुसार, आरक्षित कोच में सोने की सुविधा रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक उपलब्ध रहती है. इस दौरान यात्री अपनी निर्धारित बर्थ पर सो सकते हैं. वहीं सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक बर्थ का इस्तेमाल बैठने के लिए किया जाना चाहिए.
इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य स्लीपर कोच में सभी यात्रियों को बैठने की पर्याप्त जगह उपलब्ध कराना है. खासकर मिडिल बर्थ और अपर बर्थ पर आरक्षण कराने वाले यात्रियों को दिन में नीचे की सीट पर बैठने की जरूरत होती है. यदि लोअर बर्थ पर यात्रा कर रहा यात्री दिनभर सोता रहे तो अन्य यात्रियों को बैठने में परेशानी हो सकती है.
रेलवे की यह व्यवस्था एक ही कोच में अलग-अलग बर्थ पर यात्रा करने वाले लोगों के बीच सुविधा का संतुलन बनाए रखने के लिए लागू की गई है. हाई कोर्ट ने भी इसी आधार पर नियम को उचित माना.
पत्नी की तबीयत खराब होने पर यात्री ने उठाया था सवाल
इस मामले की शुरुआत एक रेल यात्रा के दौरान हुए विवाद से हुई थी. चेन्नई निवासी एस. बालासुब्रमणियन अपनी पत्नी के साथ ट्रेन में सफर कर रहे थे. याचिका में उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी की तबीयत खराब थी और उन्हें निर्धारित समय से अधिक देर तक सोने के लिए बर्थ की जरूरत थी.
आरोप के अनुसार, साथ में यात्रा कर रहे अन्य यात्रियों ने उनकी पत्नी को निर्धारित समय के बाद भी बर्थ पर सोने की अनुमति देने से इनकार कर दिया. इसके बाद बालासुब्रमणियन ने रेलवे के नियम को चुनौती दी. उनका तर्क था कि रेलवे मैनुअल में गर्भवती महिलाओं, दिव्यांग व्यक्तियों और बीमार यात्रियों की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए प्रावधान किए गए हैं.
उन्होंने कहा कि यदि ऐसे यात्रियों को अतिरिक्त सुविधा की जरूरत हो तो उन्हें इसका लाभ मिलना चाहिए. लेकिन जब दूसरे यात्री ही उनकी मांग स्वीकार करने से इनकार कर दें तो रेलवे के इन प्रावधानों का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता. इसी आधार पर उन्होंने नियम को चुनौती दी थी.
हाई कोर्ट ने क्यों खारिज की अपील
खंडपीठ ने कहा कि रेलवे के नियम का उद्देश्य सभी यात्रियों की सुविधा सुनिश्चित करना है. किसी एक यात्री को हुई परेशानी या किसी एक यात्रा के दौरान सामने आई घटना के आधार पर पूरे नियम को गलत नहीं ठहराया जा सकता.
अदालत के अनुसार, जिस घटना का उल्लेख अपीलकर्ता ने किया, वह एक विशेष परिस्थिति थी. सहयात्रियों द्वारा बीमार पत्नी को निर्धारित समय से अधिक सोने की अनुमति नहीं देने की घटना अपने आप में रेलवे के नियम को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकती.
अदालत ने माना कि पैरा 652 के तहत निर्धारित समय-सीमा का यात्रियों की सुविधा से सीधा संबंध है. यह नियम सुनिश्चित करता है कि दिन के समय सभी यात्रियों को बैठने की जगह मिले और किसी एक यात्री की ओर से बर्थ का लगातार इस्तेमाल करने के कारण दूसरे यात्रियों को असुविधा न हो.
इस तरह हाई कोर्ट ने रेलवे के कमर्शियल मैनुअल के पैरा 652 (ए) को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी.
बीमार, गर्भवती और दिव्यांग यात्रियों के लिए विशेष व्यवस्था
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि रेलवे के नियमों में विशेष जरूरत वाले यात्रियों के लिए प्रावधान मौजूद हैं. कमर्शियल मैनुअल के पैरा 652 (डी) के तहत गर्भवती महिलाओं, दिव्यांग व्यक्तियों और बीमार यात्रियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विशेष सुविधा का प्रावधान किया गया है.
अदालत ने कहा कि ऐसे यात्रियों को आवश्यकता पड़ने पर संबंधित सुविधा दिलाने के लिए रेलवे अधिकारियों की जिम्मेदारी है. यदि किसी यात्री को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी है और उसे निर्धारित व्यवस्था से अलग किसी सुविधा की जरूरत पड़ती है तो वह रेलवे कर्मचारियों से संपर्क कर सकता है.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विशेष परिस्थितियों में यात्रियों की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. रेलवे अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि मैनुअल में दिए गए सुरक्षा और सुविधा संबंधी प्रावधानों का सही तरीके से पालन हो.
सहयात्री सहयोग न करें तो रेलवे अधिकारियों से करें शिकायत
फैसले में हाई कोर्ट ने यात्रियों को एक महत्वपूर्ण रास्ता भी बताया है. अदालत ने कहा कि यदि किसी यात्री को सहयात्रियों के असहयोग के कारण परेशानी होती है तो उसे रेलवे अधिकारियों के सामने अपनी शिकायत रखनी चाहिए. संबंधित अधिकारी पैरा 652 (डी) के तहत उपलब्ध विशेष सुविधाओं को लागू कराने के लिए जिम्मेदार हैं.
अदालत ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता को यात्रा के दौरान सहयात्री के सहयोग नहीं करने पर रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) या अन्य संबंधित रेलवे अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए था.
इसका अर्थ है कि किसी यात्री को स्वास्थ्य या अन्य विशेष कारणों से अतिरिक्त सुविधा की जरूरत हो तो उसे केवल सहयात्री की सहमति पर निर्भर रहने के बजाय रेलवे कर्मचारियों से सहायता मांगनी चाहिए. रेलवे अधिकारियों को नियमों के तहत उपलब्ध व्यवस्था के अनुसार मामले को देखना होगा.
यात्रियों के लिए क्या समझना जरूरी है
मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के बाद आरक्षित स्लीपर कोच में सोने और बैठने के समय को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है. सामान्य परिस्थितियों में यात्री रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक अपनी बर्थ पर सो सकेंगे. सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक बर्थ का इस्तेमाल बैठने के लिए करना होगा.
दिन में मिडिल और अपर बर्थ वाले यात्रियों को भी बैठने की सुविधा मिलनी चाहिए. वहीं बीमार, गर्भवती और दिव्यांग यात्रियों को विशेष जरूरत होने पर रेलवे मैनुअल के प्रावधानों के तहत सहायता मिल सकती है.
इस फैसले का संदेश साफ है कि ट्रेन में यात्रा के दौरान हर यात्री को अपनी सुविधा के साथ दूसरों की जरूरतों का भी ध्यान रखना चाहिए. रेलवे का निर्धारित समय इसी सामूहिक सुविधा को बनाए रखने के लिए है. विशेष परिस्थितियों में परेशानी होने पर यात्रियों को रेलवे अधिकारियों और आरपीएफ से संपर्क करना चाहिए, ताकि नियमों में उपलब्ध राहत का लाभ मिल सके.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

