जबलपुर. किसी घर को बनाने में केवल ईंट, सीमेंट और मजदूरी नहीं लगती, उसमें परिवार की पूरी जिंदगी खप जाती है. कोई अपनी छोटी-छोटी बचत जोड़कर दीवारें खड़ी करता है, तो कोई बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद में पक्की छत का सपना देखता है. लेकिन बरगी तहसील के ग्राम रैपुरा स्थित महुआ टोला में रहने वाले करीब 150 परिवारों के लिए आज यही घर चिंता का कारण बन गया है. जिस जगह पर उन्होंने अपनी जिंदगी के कई दशक गुजारे, जहां उनके बच्चों ने बचपन बिताया और जहां परिवार की यादें जुड़ी हैं, अब उसी जगह से बेदखल होने का डर सता रहा है.
महुआ टोला में लगभग 50 वर्षों से रह रहे ग्रामीणों के सामने विस्थापन का संकट खड़ा हो गया है. प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत बने मकानों को खाली कराने के आदेश जारी होने के बाद बस्ती में चिंता और असमंजस का माहौल है. प्रभावित परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि उन्हें अपने घर छोड़ने पड़े तो वे कहां जाएंगे? जिन लोगों ने वर्षों की मेहनत से एक सुरक्षित ठिकाना बनाया, वे फिर से बेघर होने की आशंका से परेशान हैं.
बच्चों का भविष्य और बुजुर्गों की यादें भी घर से जुड़ी हैं
किसी बस्ती को उजाड़ने या बसाने का फैसला कागजों पर भले ही कुछ पंक्तियों में दर्ज हो जाए, लेकिन उसका असर वहां रहने वाले हर परिवार की जिंदगी पर पड़ता है. महुआ टोला के परिवारों के लिए यह केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा सवाल है. बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल, परिवार का रोजगार और सामाजिक संबंध सभी इसी बस्ती से जुड़े हुए हैं.
ग्रामीणों का कहना है कि वे यहां कई दशकों से रह रहे हैं. समय के साथ उन्होंने अपने घर बनाए और परिवारों को बसाया. कुछ मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत भी निर्मित हुए हैं. ऐसे में मकान खाली कराने के आदेश ने उन परिवारों को सबसे अधिक परेशान किया है, जिनके पास रहने के लिए दूसरा कोई ठिकाना नहीं है.
चार दशक पुराने पट्टों का हवाला, अब दस्तावेजों की जांच की मांग
ग्रामीणों का दावा है कि करीब 40 वर्ष पहले ग्राम पंचायत और तत्कालीन नायब तहसीलदार की ओर से उन्हें आवासीय पट्टे दिए गए थे. इसी भरोसे के आधार पर उन्होंने यहां अपने घर बनाए और जीवन बसाया. बस्ती में लगभग 35 से 40 पक्के मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत निर्मित होने की बात भी सामने आई है.
अब निष्कासन के आदेश के बाद ग्रामीण पुराने पट्टों और राजस्व दस्तावेजों की जांच की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि यदि जमीन की वास्तविक स्थिति को लेकर कोई विवाद है तो पहले उसका निष्पक्ष सीमांकन कराया जाना चाहिए. संबंधित खसरा नंबरों की पहचान हो, पुराने रिकॉर्ड देखे जाएं और सभी पक्षों को सुनने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाए.
ग्रामीणों ने रामशरण चौकसे के पुत्र मुकेश कुमार और विपिन कुमार पर शासकीय जमीन पर अधिकार जताने का आरोप लगाया है. हालांकि, इस दावे और जमीन के वास्तविक स्वामित्व की स्थिति का निर्धारण राजस्व अभिलेखों तथा प्रशासनिक जांच से ही हो सकेगा.
घर बचाने के लिए प्रशासन के दरवाजे पर पहुंचे ग्रामीण
अपने आवास बचाने की चिंता के बीच प्रभावित परिवारों ने भीम आर्मी भारत एकता मिशन के साथ मिलकर प्रशासन से गुहार लगाई है. संगठन के पदाधिकारियों ने तहसील कार्यालय पहुंचकर अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा. इसमें निष्कासन आदेश वापस लेने और संबंधित भूमि का निष्पक्ष सीमांकन कराने की मांग की गई.
संगठन का कहना है कि गरीब परिवारों को बेदखल करने से पहले उनके आवासीय दस्तावेजों और लंबे समय से चले आ रहे कब्जे की स्थिति की गंभीरता से जांच होनी चाहिए. ज्ञापन में सात दिनों के भीतर न्यायोचित समाधान निकालने की मांग की गई है. ऐसा नहीं होने पर धरना-प्रदर्शन और जन आंदोलन की चेतावनी दी गई है.
ज्ञापन सौंपने के दौरान जिला अध्यक्ष संजू लाल झरिया, विधिक सलाहकार भूरेलाल झरिया, जिला उपाध्यक्ष मदन चौधरी, कमलेश चौधरी, सोनू चौधरी, दिनेश यादव, आरती चौधरी, सुलोचना चौधरी, रश्मि चौधरी और विद्या बाई यादव सहित कई लोग मौजूद रहे.
प्रशासन के एक फैसले से तय होगा 150 परिवारों का भविष्य
महुआ टोला का मामला प्रशासन के सामने संवेदनशील जिम्मेदारी लेकर आया है. सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हो तो नियमानुसार कार्रवाई जरूरी है, लेकिन वर्षों से रह रहे परिवारों के पुराने पट्टों, सरकारी आवास योजना के दस्तावेजों और उनके दावों की निष्पक्ष जांच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.
प्रशासन के लिए जरूरी है कि मौके पर सीमांकन कराया जाए, राजस्व रिकॉर्ड का मिलान हो और प्रभावित परिवारों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिले. यदि किसी परिवार का दावा वैध पाया जाता है तो उसके अधिकारों की रक्षा हो और यदि भूमि पर अवैध कब्जा प्रमाणित होता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए.
फिलहाल महुआ टोला के लोगों की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं. उनके लिए यह किसी सरकारी आदेश की औपचारिकता नहीं, बल्कि उस छत को बचाने की लड़ाई है जिसके नीचे उनकी कई पीढ़ियों की यादें बसी हैं. वे जमीन के विवाद का समाधान चाहते हैं, लेकिन साथ ही यह भी चाहते हैं कि न्याय की प्रक्रिया में उनके परिवारों को बेघर होने की कीमत न चुकानी पड़े.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

