जबलपुर. भारतीय सेना की तोपखाना क्षमता को और अधिक मजबूत करने की दिशा में जबलपुर की गन कैरिज फैक्ट्री (जीसीएफ) ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है. स्वदेशी 155 एमएम धनुष तोप के अपग्रेडेड संस्करण ने परीक्षण के दौरान 46 किलोमीटर दूर स्थित लक्ष्य पर सफलतापूर्वक निशाना साधकर अपनी मारक क्षमता का प्रदर्शन किया है. लॉन्ग प्रूफ रेंज (एलपीआर), खमरिया के बैरल टेस्टिंग जोन में किए गए इस परीक्षण को तोप के तकनीकी विकास और रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में अहम कदम माना जा रहा है. परीक्षण के दौरान कुल छह गोले दागे गए. इनमें से पांच गोले निर्धारित लक्ष्य पर सीधे पहुंचे, जबकि छठा गोला लक्ष्य से महज आठ मीटर की दूरी पर गिरा. इस प्रदर्शन से उन्नत धनुष तोप की लंबी दूरी तक सटीक प्रहार करने की क्षमता सामने आई है. परीक्षण के सफल रहने से इसके नियमित उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता भी आसान हुआ है.
धनुष तोप भारतीय सेना के लिए स्वदेशी रक्षा उपकरणों के विकास की महत्वपूर्ण परियोजनाओं में शामिल है. इसके उन्नत संस्करण में बैरल की क्षमता 45 कैलिबर से बढ़ाकर 52 कैलिबर की गई है. इस बदलाव के बाद तोप की अधिकतम मारक दूरी लगभग 38 किलोमीटर से बढ़कर 46 किलोमीटर तक पहुंच गई है. लंबी दूरी पर लक्ष्य को भेदने की यह क्षमता सेना को युद्ध के मैदान में सामरिक बढ़त दिलाने में मददगार हो सकती है. खास बात यह है कि इस विकास और परीक्षण की प्रक्रिया में जबलपुर की रक्षा उत्पादन इकाई की तकनीकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है.
छह राउंड फायरिंग में पांच गोलों ने लक्ष्य पर किया सटीक प्रहार
एलपीआर खमरिया के बैरल टेस्टिंग जोन में आयोजित परीक्षण के दौरान तोप से कुल छह राउंड फायर किए गए. इसके लिए जोन-6 चार्ज का इस्तेमाल किया गया. परीक्षण में 46 किलोमीटर की दूरी पर 12 गुणा 12 मीटर का निर्धारित लक्ष्य रखा गया था. इतनी अधिक दूरी पर लक्ष्य की स्थिति और फायरिंग की सटीकता को परखना इस परीक्षण का प्रमुख उद्देश्य था. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, छह में से पांच गोले सीधे निर्धारित लक्ष्य के दायरे में पहुंचे. एक गोला लक्ष्य से केवल आठ मीटर दूर जाकर गिरा.
लंबी दूरी की फायरिंग में लक्ष्य तक गोले की सटीक पहुंच कई तकनीकी पहलुओं पर निर्भर करती है. इसमें तोप की बैरल की क्षमता, गोले की गति, इस्तेमाल किए गए चार्ज और फायरिंग के समय की परिस्थितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. ऐसे में 46 किलोमीटर की दूरी पर पांच गोलों का निर्धारित लक्ष्य पर पहुंचना परीक्षण के लिहाज से उल्लेखनीय प्रदर्शन है. इससे यह भी पता चलता है कि अपग्रेडेड तोप की फायरिंग प्रणाली और बैरल की कार्यक्षमता को लेकर किए गए तकनीकी बदलावों ने अपेक्षित परिणाम दिए हैं.
52 कैलिबर की बैरल से बढ़ी आठ किलोमीटर तक मारक क्षमता
धनुष तोप के पुराने संस्करण में 155 एमएम गुणा 45 कैलिबर की बैरल का इस्तेमाल किया जाता था. इस व्यवस्था के साथ तोप की मारक क्षमता करीब 38 किलोमीटर तक बताई गई थी. अब इसके उन्नत संस्करण में बैरल की लंबाई और आंतरिक तकनीकी संरचना में बदलाव कर उसे 52 कैलिबर का बनाया गया है. इसी बदलाव के परिणामस्वरूप इसकी अधिकतम मारक दूरी बढ़कर लगभग 46 किलोमीटर तक पहुंच गई है.
तोप की बैरल का कैलिबर उसकी लंबाई को दर्शाने वाला तकनीकी मानक है. सामान्य तौर पर 155 एमएम की तोप में 52 कैलिबर की बैरल का अर्थ है कि उसकी लंबाई 155 एमएम के 52 गुना के बराबर होती है. बैरल की लंबाई बढ़ने से गोले को बैरल के भीतर अधिक दूरी तक दबाव के प्रभाव में गति मिल सकती है. इससे प्रक्षेप्य की शुरुआती गति और संभावित मारक दूरी में बढ़ोतरी संभव होती है. हालांकि वास्तविक दूरी केवल बैरल की लंबाई से तय नहीं होती. इसमें गोले के प्रकार, बारूद की मात्रा, चार्ज, तापमान और मौसम जैसी परिस्थितियां भी असर डालती हैं.
अपग्रेडेड धनुष तोप में किए गए बदलावों का उद्देश्य केवल दूरी बढ़ाना नहीं, बल्कि लंबी दूरी पर प्रभावी और भरोसेमंद फायरिंग क्षमता विकसित करना भी है. परीक्षण में हासिल परिणाम इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं. सेना के लिए इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि अधिक दूरी तक प्रहार करने वाली तोपें अपने ठिकाने को अपेक्षाकृत सुरक्षित दूरी पर रखते हुए दूर स्थित लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम होती हैं.
फायरिंग के बाद बैरल का तापमान 52 डिग्री दर्ज
परीक्षण के दौरान फायरिंग के बाद तोप की बैरल का तापमान भी मापा गया. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, छह राउंड फायर किए जाने के बाद बैरल का तापमान 52 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. तकनीकी जानकारों ने इसे सामान्य और सुरक्षित श्रेणी में माना है. लगातार फायरिंग के दौरान बैरल का तापमान बढ़ना स्वाभाविक है, इसलिए परीक्षण में तापमान की निगरानी करना भी महत्वपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा होता है.
तोप की बैरल पर फायरिंग के दौरान अत्यधिक दबाव और तापीय प्रभाव पड़ता है. ऐसे में उसकी मजबूती, संरचनात्मक स्थिरता और निर्धारित परिस्थितियों में काम करने की क्षमता का आकलन जरूरी होता है. तापमान की जांच से यह समझने में मदद मिलती है कि फायरिंग के बाद बैरल की स्थिति कैसी रही. अपग्रेडेड संस्करण के परीक्षण में इस पहलू पर भी नजर रखी गई. हालांकि किसी भी तोप की पूर्ण तकनीकी स्वीकृति के लिए निर्धारित मानकों के अनुसार सभी जरूरी परीक्षण और मूल्यांकन प्रक्रियाएं पूरी करना आवश्यक होता है.
90 से 95 प्रतिशत कलपुर्जों का निर्माण फैक्ट्री में
धनुष तोप की इस उपलब्धि के पीछे स्वदेशी निर्माण क्षमता का भी महत्वपूर्ण योगदान है. गन कैरिज फैक्ट्री वर्ष 2010 से धनुष तोप के निर्माण, विकास और तकनीकी परिष्करण से जुड़ी हुई है. इस दौरान तोप के विभिन्न हिस्सों और कलपुर्जों के स्वदेशीकरण पर लगातार काम किया गया. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले लगभग 90 से 95 प्रतिशत कलपुर्जों का उत्पादन फैक्ट्री परिसर में ही किया जा रहा है.
रक्षा उपकरणों के निर्माण में स्वदेशी कलपुर्जों की हिस्सेदारी बढ़ने से कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है. सबसे बड़ा फायदा यह है कि आवश्यक पुर्जों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम होती है. इससे उत्पादन की समय-सीमा, मरम्मत और रखरखाव की व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है. सेना को जरूरत के समय स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी अधिक व्यवस्थित हो सकती है. इसके साथ ही देश के भीतर तकनीकी विशेषज्ञता और विनिर्माण क्षमता विकसित होती है.
धनुष परियोजना के माध्यम से जबलपुर की रक्षा उत्पादन इकाई ने यह दिखाया है कि देश की पारंपरिक रक्षा निर्माण क्षमता को आधुनिक तकनीकी जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जा सकता है. बैरल की क्षमता बढ़ाने से लेकर कलपुर्जों के निर्माण तक, इस प्रक्रिया में स्थानीय तकनीकी कौशल और औद्योगिक ढांचे की भूमिका सामने आती है.
सेना की लंबी दूरी की फायरिंग क्षमता को मिलेगा बल
आधुनिक युद्ध में तोपखाने की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है. किसी भी सैन्य अभियान में दूर स्थित ठिकानों, सामरिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों और दुश्मन की गतिविधियों को निशाना बनाने के लिए लंबी दूरी तक मार करने वाली तोपों की जरूरत होती है. ऐसी स्थिति में 46 किलोमीटर तक प्रहार करने की क्षमता वाला धनुष का उन्नत संस्करण भारतीय सेना के लिए उपयोगी साबित हो सकता है.
मारक दूरी में वृद्धि का एक सामरिक लाभ यह है कि तोप को लक्ष्य से अधिक दूरी पर तैनात रखकर भी प्रभावी फायरिंग की जा सकती है. इससे तैनाती के विकल्प बढ़ते हैं और अलग-अलग परिस्थितियों में सैन्य योजना बनाने में मदद मिल सकती है. हालांकि किसी हथियार की वास्तविक उपयोगिता उसकी मारक दूरी के साथ-साथ सटीकता, विश्वसनीयता, गतिशीलता, रखरखाव और सेना की परिचालन आवश्यकताओं पर भी निर्भर करती है.
जबलपुर में हुए परीक्षण का महत्व इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है. छह राउंड की फायरिंग में पांच गोलों का निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचना और एक गोले का लक्ष्य से केवल आठ मीटर दूर गिरना उन्नत संस्करण के प्रदर्शन को रेखांकित करता है. वहीं 52 कैलिबर की बैरल के जरिए मारक क्षमता में आठ किलोमीटर की बढ़ोतरी इसे पुराने संस्करण से अधिक सक्षम बनाती है.
स्वदेशी रक्षा उत्पादन के लिए जबलपुर की अहम भूमिका
गन कैरिज फैक्ट्री लंबे समय से भारतीय रक्षा उत्पादन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है. धनुष तोप के विकास और निर्माण में इसकी भागीदारी जबलपुर को देश के स्वदेशी तोप निर्माण के प्रमुख केंद्रों में शामिल करती है. अपग्रेडेड संस्करण का सफल परीक्षण स्थानीय रक्षा उद्योग के लिए भी उत्साहजनक उपलब्धि है. इससे यह उम्मीद मजबूत हुई है कि देश में विकसित हथियार प्रणालियों को लगातार तकनीकी रूप से उन्नत किया जा सकता है.
हालांकि सफल परीक्षण को नियमित उत्पादन और सेना में व्यापक तैनाती के समान नहीं माना जाना चाहिए. इसके लिए संबंधित तकनीकी मूल्यांकन, आवश्यक स्वीकृतियां और उत्पादन से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी होना जरूरी है. फिर भी 46 किलोमीटर की दूरी पर किए गए इस परीक्षण ने धनुष तोप के उन्नत संस्करण की क्षमता को प्रदर्शित किया है.
जबलपुर की धरती पर हासिल यह सफलता रक्षा निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. स्वदेशी तकनीक, स्थानीय स्तर पर कलपुर्जों का निर्माण और बढ़ी हुई मारक क्षमता के साथ धनुष का नया संस्करण भारतीय तोपखाना शक्ति को मजबूत करने की संभावनाएं रखता है. अब सबकी नजरें इस बात पर रहेंगी कि परीक्षण के बाद उत्पादन और आगे की तकनीकी प्रक्रियाएं किस गति से पूरी होती हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

