महाराष्ट्र में मोदी को क्या चुनौती दे सकते हैं शरद पवार और उद्धव ठाकरे

महाराष्ट्र में मोदी को क्या चुनौती दे सकते हैं शरद पवार और उद्धव ठाकरे

प्रेषित समय :20:33:19 PM / Thu, Feb 22nd, 2024
Reporter : reporternamegoeshere
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नवीन कुमार

देश में महाराष्ट्र ही एक ऐसा राज्य है जो आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 400 के पार के सपने को पूरा करने में पूरी तरह से सहायक नहीं दिख रहा है जबकि भाजपा ने अपने सियासी खेल में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी शिवसेना और एनसीपी को बुरी तरह से तोड़-मरोड़ दिया है और उसके एक गुट को अपनी सत्ता का हिस्सा भी बना लिया है. यहां विपक्ष का सफाया हो जाए इसके लिए कांग्रेस को भी तोड़कर मरोड़ने का खेल चल रहा है. कांग्रेस के टूटने से भाजपा को अपने चुनावी समीकरण से लगता है कि मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र में उसकी स्थिति पहले से बेहतर हो जाएगी. भाजपा जिस तरह से पूरे विपक्ष को तोड़ने में सक्रिय है उससे उसके अंदर का एक ऐसा डर भी जाहिर हो रहा है जिससे ऐसा लगता है कि उसे अब भी भरोसा नहीं हो रहा है कि वह महाराष्ट्र में 2019 वाली अपनी स्थिति को बरकरार रख पाएगी. 2019 में भाजपा और शिवसेना ने संयुक्त रूप से चुनाव लड़ा था और भाजपा ने 23 तो शिवसेना ने 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी. विपक्ष के तौर पर कांग्रेस और एनसीपी ने भी साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और एनसीपी को 4 तो कांग्रेस को एक ही सीट पर जीत मिली थी. अब तो शिवसेना, एनसीपी के साथ कांग्रेस भी बिखरने के कगार है तो भी भाजपा को 48 में से 45 सीटों पर जीत पाने का भरोसा नहीं हो पा रहा है. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पार्टियों को तोड़ा तो जा सकता है लेकिन पारंपरिक वोटरों को तोड़ना आसान नहीं है. पार्टी समर्थक और कार्यकर्ता जो भावनात्मक रूप से जुड़े हुए होते हैं उनको दूसरी पार्टी की ओर मोड़ना आसान नहीं है. यही कमजोर कड़ी भाजपा को चिंता में डाले हुए हो सकता है और यही वजह है कि कांग्रेस को भी बुरी तरह से तोड़ने की कोशिश हो रही है और इसमें भाजपा को अपना बेहतर भविष्य दिख रहा है.

शिवसेना और एनसीपी का टूटना ऐतिहासिक है. इससे पहले शिवसेना से उसके कई नेता, विधायक और सांसद अलग हुए थे. उसका कुप्रभाव शिवसेना पर नहीं पड़ा था. लेकिन एकनाथ शिंदे ने जिस तरह से 40 विधायकों को लेकर शिवसेना से बाहर हुए और राज्य की सत्ता को संभाला, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, उससे शिवसेना की स्थिति अलग ही देखने को मिल रही है. शिंदे मुख्यमंत्री बन गए और उनके नेतृत्व में भाजपा के साथ एनसीपी (अजित पवार गुट) भी सत्ता में शामिल है. शिंदे ने कानूनी तौर पर शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह भी हासिल कर लिया. इसका नतीजा यह हुआ कि शिंदे के पास मूल शिवसेना आ गई और उद्धव ठाकरे के पास मूल शिवसेना नहीं रही. यही हाल शरद पवार की एनसीपी की भी हुई है. उनके भतीजे अजित ने बगावत की और शिवसेना की तरह ही कानूनी रूप से एनसीपी पर कब्जा कर लिया. अजित के पास भी मूल एनसीपी और चुनाव चिन्ह आ गया. अब शरद यह कहकर मन बहला रहे हैं कि उन्होंने एनसीपी पार्टी बनाई और उनसे ही उनकी पार्टी छीन ली गई. यह भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद पहली बार हुआ है. लेकिन शरद ने हिम्मत नहीं हारी है. वह राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं और ऐसे कई राजनीतिक पतझड़ देखे हैं जिससे वह अजित के बगावत से थोड़ा भी विचलित नहीं दिख रहे हैं. वह एक योद्धा के तौर पर कह रहे हैं कि जनता उन्हें जानती है और वह अपनी पार्टी को फिर से बड़ा करेंगे. उनके जज्बे से निश्चित रूप से उनके विरोधी अंदर से कमजोर महूसस कर रहे होंगे. उधर उद्धव भी पस्त नहीं दिख रहे हैं और अपने गुट की शिवसेना को मजबूत करने के लिए मैदान में उतर गए हैं. वह बार-बार बोल रहे हैं कि उनकी शिवसेना और पार्टी के चुनाव चिन्ह को चुरा लिया है. अपनी पार्टी के बागियों पर वह गुस्सा उतार रहे हैं. उन्हें अपने पारंपरिक शिवसैनिकों पर ज्यादा भरोसा है जिसके बल पर वह लोकसभा चुनाव में भाजपा को परास्त करने का दंभ भर रहे हैं. पार्टी के टूटने से उद्धव का भी मनोबल टूटा नहीं है और वह अपने शिवसैनिकों से विरोधियों को सबक सिखाने की अपील कर रहे हैं.  

भाजपा ने न सिर्फ शिवसेना और एनसीपी को बांट दिया है बल्कि उनमें सियासी दुश्मनी भी पैदा कर दी है. इसलिए शिवसेना और एनसीपी के दोनों गुट के नेता एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं तो लोकसभा चुनाव में पटखनी देने की भी बात कर रहे हैं. कोल्हापुर में शिवसेना का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ जिसमें शिंदे ने उद्धव पर जमकर निशाना साधा. शिंदे ने मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है. शिंदे की तरह एनसीपी के अजित की भी प्राथमिकता मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए महाराष्ट्र से ज्यादा से ज्यादा लोकसभा की सीटें जीतना है. इधर भाजपा कांग्रेस को पूरी तरह से तोड़ने की कोशिश में लगी हुई है. कांग्रेस के कमजोर होते ही महाराष्ट्र में विपक्ष नाम की चीज नहीं रहेगी. इससे महाराष्ट्र में लोकसभा की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने का भाजपा का लक्ष्य पूरा हो सकता है. कांग्रेस की दयनीय हालत उसके लोनावाला के चिंतन शिविर में देखने को मिला. उसके कई विधायक इस चिंतन शिविर से गायब थे. अब कांग्रेस को यह चिंतन करना पड़ेगा कि उसे लोकसभा चुनाव में एक भी सीट मिलेगी या नहीं. क्योंकि, पिछले लोकसभा चुनाव में उसे सिर्फ एक सीट ही मिली थी. कांग्रेस का हाथ भाजपा के साथ होने जा रहा है तो कांग्रेस को अपनी सियासी जमीन बचाने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी. कांग्रेस में तो दागी नेता हैं ही तो उनके लिए भाजपा के दरवाजे खुले ही हैं. भाजपा के पास तो वाशिंग मशीन है जो दागी नेताओँ के दाग आसानी से साफ कर देती है. कांग्रेस ही नहीं, महाराष्ट्र के एनसीपी (अजित पवार गुट) के भी दागी नेताओं के भाजपा के साथ होने से दाग मिट रहे हैं. भ्रष्टाचार तो ऐसे भी मिटते हैं. इसके साथ ही भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत बनाने का सपना भी पूरा हो रहा है. भाजपा की सियासी रणनीति यह है कि उसे देश पर राज करना है और लंबे समय तक राज करना है. इसमें उसे सफलता मिल रही है. विपक्ष जो खत्म हो रहा है. इंडिया गठबंधन तैयार किया जा रहा था. लेकिन यह गठबंधन बिहार में नीतीश कुमार के भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना लेने से बिखर गया है. महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन महा विकास आघाड़ी के रूप में है. मगर जिस तरह से शिवसेना, एनसीपी के बाद कांग्रेस में बिखराव हो रहा है उससे इंडिया गठबंधन कमजोर हो रहा है. जिस तरह से शिंदे मेहनत कर रहे हैं और शिवसैनिकों के बीच विश्वास पैदा कर रहे हैं उससे यह स्थिति दिखने लगी है कि लोकसभा चुनाव में शिंदे उद्धव से बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं और इसका फायदा मोदी को होगा. वैसे, आज की राजनीति में कुछ भी संभव है. नीतीश के लिए भाजपा ने सारे दरवाजे बंद कर दिए थे. लेकिन सत्ता के लिए नीतीश के लिए दरवाजे खोल दिए गए. महाराष्ट्र में भी उद्धव का यह बयान सियासी रंग को अलग तरह से दिखा रहा है. उद्धव ने कहा कि उनकी मोदी से कोई दुश्मनी नहीं है. इसके बाद अटकलें लगाई जा रही है कि उद्धव का फिर से भाजपा के साथ दोस्ताना रिश्ता हो सकता है. क्योंकि, उद्धव को लोकसभा के चुनाव में बाल ठाकरे के नाम पर शिवसैनिकों की सहानुभूति मिल सकती है जो भाजपा पर भारी पड़ सकता है. अपने समर्थकों से सहानुभूति तो शरद भी पा सकते हैं और फिर से वे अपने भतीजे अजित पर भारी पड़ सकते हैं. अपने चाचा शरद की छाया से बाहर निकलकर अजित पहली बार लोकसभा चुनाव के मैदान में रहेंगे. शरद की सियासी रणनीति के आगे अजित के लिए चुनावी जंग जीतना आसान नहीं होगा. अजित तो यही सोच रहे होंगे कि शरद के लिए बिना पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह के चुनावी मैदान में टिकना मुश्किल होगा. लेकिन शरद इससे पहले भी कई बार अलग-अलग पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह के सहारे चुनाव लड़े चुके हैं. इसलिए शरद के लिए यह कोई नई बात नहीं है और न ही उनके लिए यह मुश्किल का काम है. अगर शरद को सहानुभूति मिल गई तो अजित अपने चाचा से आगे नहीं निकल पाएंगे और मोदी के लिए वह कमजोर कड़ी साबित हो सकते हैं. शरद और उद्धव के पास सहानुभूति ऐसा हथियार है जिससे भाजपा और मोदी को चुनौती मिल सकती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

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