नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले को लेकर सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि दोष सिद्ध करने के लिए प्राइवेट पार्ट्स पर चोट के निशानों का होना जरूरी नहीं है. अन्य सबूतों को भी आधार बनाया जा सकता है.
जस्टिस संदीप मेहता और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की. ये मामला करीब 40 साल पुराना है. कोर्ट ने 1984 में बीए की छात्रा से बलात्कार के लिए एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा. अभियोजन पक्ष के अनुसार, 19 मार्च 1984 को पीडि़ता ट्यूशन के लिए आरोपी के घर गई थी, जब उसने उसका यौन उत्पीडऩ किया. उसने उसे धमकी भी दी कि अगर उसने शोर मचाया तो वह उसे जान से मार देगा.
इस मामले में व्यक्ति को पांच साल की सजा हुई है. एक ट्यूशन टीचर पर अपनी ही छात्रा के साथ दुष्कर्म करने का आरोप था. टीचर की ओर से दलील दी गई थी कि पीडि़ता के प्राइवेट पार्ट्स पर कोई भी निशान नहीं था इसलिए दुष्कर्म साबित नहीं किया जा सकता है. उसका कहना था कि पीडि़ता की मां ने उसपर गलत आरोप लगाए हैं. हालांकि, कोर्ट ने आरोपी की ओर से दी गई दलीलों को खारिज कर दिया. जस्टिस वराले ने कहा कि जरूरी नहीं है कि रेप के हर मामले में पीडि़ता के शरीर पर चोट के निशान ही पाए जाएं. कोई भी केस परिस्थितियों पर निर्भर करता है. इसलिए दुष्कर्म साबित करने के लिए पीडि़ता के शरीर पर चोट के निशानों को जरूरी नहीं. न्यायालय ने यह भी कहा कि अभियोक्ता के बयान के अनुसार, आरोपी ने उसे जबरन बिस्तर पर धकेल दिया और उसके प्रतिरोध के बावजूद कपड़े के टुकड़े से उसका मुंह बंद कर दिया. इस प्रकार, इस पहलू पर विचार करते हुए, यह संभव है कि कोई बड़ी चोट के निशान नहीं थे.
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