चीनी विदेश मंत्री वांग यी का भारत दौरा बॉर्डर चर्चा की अटकलें और कूटनीतिक समीकरण

चीनी विदेश मंत्री वांग यी का भारत दौरा बॉर्डर चर्चा की अटकलें और कूटनीतिक समीकरण

प्रेषित समय :18:25:18 PM / Sat, Aug 16th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

अजय श्रीवास्तव

भारत और चीन के संबंध बीते कुछ वर्षों में जिस गहरे अविश्वास और तनावपूर्ण दौर से गुज़रे हैं, उसके बीच चीनी विदेश मंत्री वांग यी का भारत दौरा कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर रहा है. यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब दोनों देशों के बीच सीमा विवाद अब भी अनसुलझा है, गालवान संघर्ष की स्मृतियाँ ताज़ा हैं, और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सैनिकों की तैनाती आज भी असामान्य रूप से भारी है. स्वाभाविक है कि इस दौरे के साथ-साथ सीमा विवाद पर चर्चा की संभावनाओं को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं.

भारत और चीन के रिश्ते जटिलताओं से भरे हैं. एक ओर दोनों देश एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग की आवश्यकता महसूस करते हैं, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, सीमा विवाद और सामरिक टकराव संबंधों को अविश्वास की खाई में धकेलते रहते हैं. वांग यी का दौरा इन द्विपक्षीय विरोधाभासों को फिर से उजागर करता है.

सीमा विवाद की पृष्ठभूमि
भारत–चीन सीमा विवाद का इतिहास लंबा और पेचीदा है. 1962 का युद्ध, अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन का दावा, अक्साई चिन पर कब्ज़ा, और लगातार टकराव की घटनाएँ इस रिश्ते को परिभाषित करती रही हैं. 2017 का डोकलाम गतिरोध और 2020 का गालवान संघर्ष इस खाई को और गहरा कर चुके हैं. गालवान की झड़प में दोनों ओर के जवानों की शहादत ने यह स्पष्ट कर दिया कि सीमा विवाद केवल कागज़ी बहस का विषय नहीं है, बल्कि जमीनी हकीकत में जानलेवा संघर्ष का रूप ले सकता है.

वांग यी का यह भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है जब दोनों देशों के सैन्य कमांडरों की कई दौर की वार्ताओं के बावजूद LAC पर असामान्य स्थिति बनी हुई है. टेंट, बंकर, तोपखाने और सैनिकों की मौजूदगी यह संकेत देती है कि दोनों देश पूरी तरह से भरोसा करने की स्थिति में नहीं हैं.

कूटनीतिक संकेत और अटकलें
चीनी विदेश मंत्री का भारत आना केवल एक औपचारिक यात्रा नहीं है. यह एक संदेश भी है कि बीजिंग और नई दिल्ली दोनों ही तनाव कम करने और संवाद को ज़िंदा रखने के इच्छुक हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संवाद किसी ठोस परिणाम में बदल पाएगा?

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चीन भारत को यह दिखाना चाहता है कि वह सीमा मुद्दे पर बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है, लेकिन इसके बदले में वह चाहता है कि भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपनी सामरिक नज़दीकी पर पुनर्विचार करे. चीन को आशंका है कि भारत का इंडो–पैसिफिक रणनीति और क्वाड जैसे मंचों पर बढ़ता सक्रिय रोल उसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में बाधा बन रहा है.

भारत की ओर से यह अपेक्षा होगी कि चीन सीमा पर यथास्थिति बहाल करने की दिशा में ठोस कदम उठाए. केवल बयानबाज़ी से अब संतोष नहीं मिल सकता. भारत स्पष्ट कर चुका है कि जब तक सीमा पर शांति नहीं होगी, तब तक द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं हो सकते.

आर्थिक और सामरिक परिप्रेक्ष्य
हालाँकि सीमा विवाद संबंधों पर छाया रहता है, फिर भी भारत और चीन के बीच आर्थिक रिश्ते अत्यधिक गहरे हैं. चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, औद्योगिक कच्चे माल में भारत चीन पर निर्भर है. 2024–25 के आँकड़ों के अनुसार, भारत और चीन के बीच व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक का है, लेकिन इसमें भारी व्यापार घाटा भारत के खिलाफ़ जाता है.

वांग यी के दौरे से यह भी संभावना जताई जा रही है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग पर चर्चा हो सकती है. भारत में निवेश करने के लिए चीनी कंपनियाँ इच्छुक हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से भारत ने कई क्षेत्रों में चीनी निवेश पर प्रतिबंध और निगरानी बढ़ा दी है.

सामरिक दृष्टि से भारत चीन को केवल सीमा विवाद तक नहीं देखता. हिंद महासागर में चीन की बढ़ती गतिविधियाँ, श्रीलंका और पाकिस्तान में उसका बढ़ता प्रभाव, और नेपाल–भूटान तक उसकी कूटनीति भारत के लिए चुनौती है. ऐसे में भारत का यह प्रयास होगा कि वह स्पष्ट संदेश दे कि किसी भी आर्थिक या राजनीतिक समझौते से पहले सीमा विवाद का हल अनिवार्य है.

जनता और राजनीतिक प्रतिक्रिया
भारत में चीनी विदेश मंत्री के दौरे को लेकर जनता और राजनीतिक वर्ग में मिश्रित प्रतिक्रिया है. एक वर्ग मानता है कि बातचीत ही समाधान का रास्ता है और दोनों देशों को आपसी टकराव को पीछे छोड़कर सहयोग की दिशा में बढ़ना चाहिए. लेकिन बड़ी संख्या में लोग चीन पर अविश्वास करते हैं. गालवान संघर्ष और उसके बाद चीनी रवैये ने भारतीय जनता के मन में गहरी नाराज़गी पैदा की है.

राजनीतिक दल भी इस मुद्दे पर अलग-अलग सुर में बोल रहे हैं. सत्तारूढ़ दल का रुख यह है कि सरकार चीन को उसकी जगह दिखा चुकी है और अब बातचीत बराबरी की स्थिति से हो रही है. विपक्ष सवाल उठा रहा है कि सरकार चीन के दबाव में तो नहीं झुक रही और क्या सीमा पर यथास्थिति बहाल करने की कोई ठोस योजना बन रही है.

भविष्य की दिशा
वांग यी की यह यात्रा संबंधों में किसी क्रांतिकारी बदलाव का संकेत देगी या नहीं, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी. लेकिन यह निश्चित है कि यह यात्रा भारत–चीन संबंधों को नए मोड़ पर खड़ा कर सकती है. अगर सीमा विवाद पर कुछ प्रगति होती है तो दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीक, शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं. लेकिन अगर बातचीत केवल औपचारिकता तक सीमित रही तो यह यात्रा भी उन अनेक कोशिशों में शामिल हो जाएगी जो तनाव कम करने में विफल रही हैं.

भारत और चीन, दोनों ही महाशक्तियाँ बनने की आकांक्षा रखते हैं. लेकिन यह तभी संभव है जब दोनों आपसी अविश्वास और टकराव को पीछे छोड़कर वास्तविक सहयोग की ओर बढ़ें. वांग यी का भारत दौरा इसी सवाल को हमारे सामने रखता है—क्या एशिया की ये दो महाशक्तियां सहयोग की राह चुनेंगी या टकराव का रास्ता जारी रखेंगी?

वांग यी की यह यात्रा एशिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. सीमा विवाद, भू–राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, आर्थिक संबंध और वैश्विक गठबंधनों के बीच यह दौरा केवल एक राजनयिक घटना नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला अवसर है. भारत और चीन के नेताओं पर यह जिम्मेदारी है कि वे अपने-अपने राष्ट्रहितों की रक्षा करते हुए भी शांति और सहयोग की राह खोजें.

अगर इस यात्रा से सीमा विवाद पर ठोस समाधान की नींव रखी जाती है तो आने वाले वर्षों में एशिया की राजनीति का स्वरूप बदल सकता है. लेकिन अगर बातचीत केवल औपचारिक रहकर कूटनीतिक तस्वीरों तक सीमित रही तो यह दौरा भी इतिहास में केवल एक और अधूरा अवसर बनकर रह जाएगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-