चीन की अर्थव्यवस्था पर संकट गहराया रियल एस्टेट सेक्टर में भारी गिरावट के बाद बेरोजगारी बढ़ी

चीन की अर्थव्यवस्था पर संकट गहराया रियल एस्टेट सेक्टर में भारी गिरावट के बाद बेरोजगारी बढ़ी

प्रेषित समय :21:33:55 PM / Tue, Aug 19th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

चीन, जिसे लंबे समय से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विकास का प्रतीक माना जाता रहा है, आज अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है. कभी तेज़ी से उभरते उद्योग, विशाल निवेश और तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने चीन को वैश्विक शक्ति बनाया था, लेकिन अब वही विकास मॉडल उसके लिए संकट की जड़ बन गया है. विशेषकर रियल एस्टेट सेक्टर में आई अभूतपूर्व गिरावट ने चीन की आर्थिक मशीनरी को हिला दिया है और इसके परिणामस्वरूप बेरोजगारी की समस्या विकराल होती जा रही है. यह संकट केवल आर्थिक नहीं है बल्कि सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी छोड़ रहा है, जिससे चीन के भविष्य पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं.चीन की अर्थव्यवस्था का यह संकट केवल रियल एस्टेट तक सीमित नहीं है. यह उस विकास मॉडल की कमजोरी को उजागर करता है जिस पर चीन ने दशकों तक भरोसा किया. रियल एस्टेट सेक्टर का पतन बेरोजगारी, बैंकिंग संकट और सामाजिक असंतोष का कारण बन रहा है. अगर सरकार ने समय रहते ठोस और दीर्घकालिक सुधार नहीं किए, तो यह संकट चीन को लंबे समय तक परेशान कर सकता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल सकता है.

आज जब दुनिया चीन की आर्थिक शक्ति को कम होते हुए देख रही है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि—क्या चीन अपने विकास मॉडल को बदलकर नई दिशा देगा, या फिर उसकी अर्थव्यवस्था लंबे समय तक मंदी और अस्थिरता की गिरफ्त में रहेगी? यही आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक राजनीति का सबसे अहम मुद्दा होगा.

रियल एस्टेट सेक्टर की भूमिका और उसका पतन
चीन की अर्थव्यवस्था में रियल एस्टेट सेक्टर की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत रही है. शहरों के विस्तार, ऊंची-ऊंची इमारतों और बड़े पैमाने पर बने टाउनशिप्स ने चीन की छवि "कंस्ट्रक्शन महाशक्ति" के रूप में गढ़ी थी. चीन के मिडिल क्लास के लिए घर खरीदना न केवल रहने की जरूरत थी बल्कि निवेश का सबसे बड़ा साधन भी. लेकिन जब डेवलपर्स ने ज्यादा कर्ज लेकर प्रोजेक्ट्स शुरू किए और उन्हें पूरा करने में असफल रहे, तब इस बुलबुले के फूटने की शुरुआत हुई.

विशेष रूप से "एवरग्रांडे" और "कंट्री गार्डन" जैसे बड़े रियल एस्टेट दिग्गजों का कर्ज संकट इस पतन का प्रतीक बन गया. एवरग्रांडे पर 300 अरब डॉलर से ज्यादा का कर्ज है, जिसे चुकाने की स्थिति में वह अब नहीं है. हजारों अधूरे प्रोजेक्ट्स, खरीदारों का फंसा हुआ पैसा और बैंकों पर बढ़ता दबाव—ये सब मिलकर एक चेन रिएक्शन बना रहे हैं. नतीजा यह हुआ कि नए निवेश रुक गए, घरों की मांग घटी और सेक्टर का पतन तेजी से शुरू हो गया.

बेरोजगारी की बढ़ती समस्या
रियल एस्टेट सेक्टर में आई इस गिरावट ने निर्माण, सीमेंट, स्टील और मैन्युफैक्चरिंग जैसे कई सहायक उद्योगों को प्रभावित किया है. करोड़ों मजदूर, इंजीनियर और ठेकेदार इस संकट की चपेट में आ गए हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि शहरी युवा बेरोजगारी दर 21 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जबकि वास्तविक आंकड़े और भी ज्यादा हो सकते हैं.

सबसे ज्यादा प्रभावित युवा वर्ग हुआ है. चीन के करोड़ों ग्रेजुएट्स को उम्मीद थी कि उन्हें तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में रोजगार के अवसर मिलेंगे, लेकिन अब उनके लिए नौकरियों की उपलब्धता तेजी से घट रही है. कई युवाओं को मजबूरी में "फ्लेक्सिबल जॉब्स" अपनाने पड़े हैं—जैसे फूड डिलीवरी, टैक्सी ड्राइविंग या छोटे-मोटे ऑनलाइन काम. यह प्रवृत्ति चीन की सामाजिक संरचना पर गहरा असर डाल रही है.

बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली पर दबाव
रियल एस्टेट संकट का असर चीन की बैंकिंग प्रणाली पर भी साफ दिखाई देने लगा है. छोटे-बड़े बैंक जिनका पैसा अधूरे प्रोजेक्ट्स में फंसा हुआ है, वे ग्राहकों को भुगतान करने में असमर्थ हो रहे हैं. ग्रामीण बैंकों के सामने नकदी संकट गहराता जा रहा है और कई जगहों पर लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किए हैं.

कर्ज न चुका पाने की स्थिति में डेवलपर्स दिवालिया हो रहे हैं और यह वित्तीय संस्थानों के लिए बड़ा खतरा है. इसके अलावा, विदेशी निवेशक भी चीन के बाजारों से अपना पैसा खींच रहे हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार और युआन की स्थिरता पर दबाव बढ़ रहा है.

सामाजिक असंतोष और राजनीतिक असर
यह संकट केवल आर्थिक स्तर तक सीमित नहीं है. चीन जैसे देश में जहां सामाजिक स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है, वहां बेरोजगारी और अधूरे घरों से उपजे असंतोष ने राजनीतिक नेतृत्व को भी चिंतित कर दिया है. कई शहरों में घर खरीदारों ने "मॉर्टगेज स्ट्राइक" शुरू कर दी है, यानी वे अधूरे घरों की किस्तें चुकाने से इनकार कर रहे हैं.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती है. पिछले कुछ वर्षों में "जीरो कोविड पॉलिसी" ने भी आर्थिक गतिविधियों को गहरा नुकसान पहुंचाया था. अब रियल एस्टेट संकट और बेरोजगारी ने जनता का भरोसा और कमजोर कर दिया है. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर सरकार जल्द ही राहत पैकेज और रोजगार सृजन के ठोस कदम नहीं उठाती, तो यह असंतोष बड़े पैमाने पर राजनीतिक अस्थिरता में बदल सकता है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
चीन की अर्थव्यवस्था वैश्विक सप्लाई चेन का एक अहम हिस्सा है. चीन में मंदी का असर दुनिया भर की कंपनियों और बाजारों पर पड़ रहा है. कच्चे माल, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्नोलॉजी और उपभोक्ता वस्तुओं के व्यापार में कमी आ रही है. एशिया के कई पड़ोसी देशों की अर्थव्यवस्था चीन के निवेश पर निर्भर है, वहां भी संकट गहराने की आशंका है.

अमेरिका और यूरोप के निवेशक पहले ही चीन से दूरी बनाने लगे हैं और "डिकपलिंग" की रणनीति पर जोर दे रहे हैं. भारत और वियतनाम जैसे देश इस स्थिति को अवसर के रूप में देख रहे हैं और विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं.

सरकार की नीतियां और भविष्य की चुनौतियां
चीनी सरकार ने रियल एस्टेट सेक्टर को बचाने के लिए कई कदम उठाए हैं. बैंकों को डेवलपर्स को कर्ज देने में छूट दी जा रही है, अधूरे घरों को पूरा करने के लिए विशेष फंड बनाए जा रहे हैं और युवाओं के लिए रोजगार योजनाओं की घोषणा की गई है. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ये उपाय केवल तात्कालिक राहत हैं, स्थायी समाधान नहीं.

चीन की असली चुनौती उसके आर्थिक मॉडल में है. लंबे समय तक भारी निवेश और निर्यात पर आधारित विकास अब टिकाऊ नहीं रहा. चीन को घरेलू मांग बढ़ाने, नए उद्योगों जैसे टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी और सर्विस सेक्टर को मजबूत करने की जरूरत है. साथ ही, पारदर्शिता और नियामक सुधार भी जरूरी हैं, ताकि निवेशकों का भरोसा वापस जीता जा सके.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-