शारदीय नवरात्रि मां कालरात्रि के सातवें दिन विशेष पूजा मुहूर्त

शारदीय नवरात्रि मां कालरात्रि के सातवें दिन विशेष पूजा मुहूर्त

प्रेषित समय :19:21:38 PM / Sat, Sep 27th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

शारदीय नवरात्रि मां कालरात्रि के सातवें दिन विशेष पूजा मुहूर्त:-

महासप्तमी:-
इस दिन शुभ मुहूर्त ब्रह्म मुहूर्त - सुबह
04:43 - 05:31 बजे है . अभिजीत मुहूर्त - सुबह 11:47 - दोपहर 12:35 बजे

राहु काल का समय:- इस समय नहीं करे पूजा पाठ का कार्य,शाम को 04 बजकर 41 मिनट से 06 बजकर 11 मिनट शाम तक राहु काल है, इस समय अवधि में पूजा बिल्कुल भी न करें.

मां कालरात्रि की पूजा विधि:-

मां कालरात्रि की पूजा विधि विशेष रूप से सरल होती है. साधक को ध्यानपूर्वक और श्रद्धा से मां की पूजा करनी चाहिए. पूजा की विधि निम्नलिखित है:

1. दीप जलाना:- पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाएं और मां की प्रतिमा के सामने रखें. मां कालरात्रि की पूजा में तिल, गुड़ और काले वस्त्र अर्पित करना शुभ माना जाता है.

2. धूप और फूल:- मां को धूप, गंध, और काले रंग के फूल अर्पित करें. मां की पूजा के लिए गेंदा या अन्य काले रंग के फूल उपयुक्त होते हैं.

3. मंत्र जाप:- मां कालरात्रि के विशेष मंत्र का जाप करें:

   ॐ कालरात्र्यै नमः.

   इस मंत्र का जाप करने से साधक को हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और भय से मुक्ति मिलती है.

4. प्रसाद:- मां को गुड़ का भोग विशेष रूप से प्रिय होता है. पूजा के बाद इसे प्रसाद के रूप में सभी में बांटें.

5. आरती:- अंत में मां की आरती करें और स्तोत्र का पाठ करें. मां की आरती करते समय उन्हें पूर्ण श्रद्धा से नमन करें.

मां कालरात्रि का स्वरूप:-
मां कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत भयावह होता है. इनका रंग काला है, और इनका वाहन गधा है. मां के चार हाथ होते हैं, जिनमें से एक हाथ में तलवार और दूसरे में वज्र होता है. बाकी दो हाथों से वे वर और अभय मुद्रा में आशीर्वाद देती हैं. मां के तीन नेत्र होते हैं, जो अग्नि के समान चमकते हैं. मां के इस भयंकर स्वरूप का अर्थ है कि वे जीवन के हर प्रकार के अंधकार और विपत्तियों को समाप्त करने वाली हैं.

माँ कालरात्रि का महत्व:
देवी कालरात्रि का यह नाम उनके कृष्ण वर्ण (काला रंग) के कारण पड़ा है. माँ कालरात्रि को शुभंकरी भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने शुम्भ राक्षस का वध किया था. तीन नेत्रों वाली देवी कालरात्रि गधे पर विराजमान हैं और अपनी चार भुजाओं में खड्ग और कांता (लौह अस्त्र) धारण करती हैं.

मां कालरात्रि की कथा:-

पौराणिक कथाओं के अनुसार जब दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था, तब इससे चिंतित होकर सभी देवता शिवजी के पास गए और उनसे रक्षा की प्रार्थना करने लगे. भगवान शिव ने माता पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने को कहा. शिवजी की बात मानकर माता पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया.

जब मां दुर्गा ने दैत्य रक्तबीज को मौत के घाट उतारा, तो उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज दैत्य उत्पन्न हो गए. इसे देख दुर्गा ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया. इसके बाद जब मां दुर्गा ने दैत्य रक्तबीज का वध किया और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को मां कालरात्रि ने जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया. इस तरह मां दुर्गा ने सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया.

दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है. इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी मां का दरवाज़ा खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं. सर्वप्रथम कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें, इसके पश्चात माता कालरात्रि जी की पूजा कि जाती है.

पूजा की विधि शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है. सप्तमी की पूजा अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है. इस दिन कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है. सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है.

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Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-