जबलपुर. विकास के नाम पर शहर की सड़कों को मौत के कुएं में तब्दील करने और आम जनता की सेहत से खिलवाड़ करने वाली निर्माण एजेंसियों के खिलाफ अब जबलपुर नगर निगम प्रशासन ने 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपना ली है. इसका जीता जागता उदाहरण मंगलवार की रात तब देखने को मिला जब नगर निगम कमिश्नर रामप्रकाश अहिरवार औचक निरीक्षण पर निकले और ग्वारीघाट रोड की बदहाल स्थिति देखकर उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. अमृत 2.0 परियोजना के तहत शहर की लाइफ लाइन मानी जाने वाली ग्वारीघाट रोड पर चल रहे रॉ-वॉटर राईजिंग मेन पाइप लाइन बिछाने के काम में बरती जा रही घोर अनियमितताओं और सुरक्षा मानकों की अनदेखी को गंभीरता से लेते हुए निगमायुक्त ने तत्काल प्रभाव से काम पर तीन दिन की रोक लगा दी है. इतना ही नहीं, काम कर रही ठेका कंपनी ईगल पी.सी. स्नेहल जे.व्ही. पर लापरवाही के लिए कुल साढ़े पांच लाख रुपये का भारी भरकम जुर्माना ठोकते हुए अधिकारियों और ठेकेदारों को कड़ा सबक सिखाया है. रात के अंधेरे में सड़क पर धूल के गुबार और खुले पड़े गड्ढों के बीच निगमायुक्त की इस सख्त कार्रवाई ने पूरे प्रशासनिक अमले और निर्माण एजेंसियों में हड़कंप मचा दिया है.
मंगलवार की रात करीब 10 बजे जब शहर सोने की तैयारी कर रहा था, निगमायुक्त रामप्रकाश अहिरवार अपने दलबल के साथ ग्वारीघाट रोड स्थित आकाश गंगा होटल से रामपुर चौराहे के बीच चल रहे निर्माण कार्यों का जायजा लेने पहुंच गए. यह निरीक्षण पूरी तरह से औचक था, जिससे मैदानी अमले को संभलने का मौका ही नहीं मिला. निगमायुक्त ने अपनी गाड़ी छोड़कर पैदल ही पूरे क्षेत्र का भ्रमण किया. इस दौरान उन्होंने जो देखा, वह बेहद चौंकाने वाला था. पाइप लाइन बिछाने के नाम पर ठेका कंपनी ने पूरी सड़क को अस्त-व्यस्त कर रखा था. जगह-जगह खोदे गए गड्ढों के आसपास न तो कोई मजबूत बैरीकेटिंग की गई थी और न ही सुरक्षा के कोई संकेतक लगाए गए थे. सड़क के किनारे रेत और मिट्टी के बड़े-बड़े ढेर लगे हुए थे जो रात के अंधेरे में दोपहिया वाहन चालकों के लिए जानलेवा साबित हो सकते थे. इसके अलावा, निर्माण कार्य के चलते उड़ रही धूल ने पूरे वातावरण को प्रदूषित कर रखा था, जिससे स्थानीय रहवासियों और राहगीरों का सांस लेना दूभर हो रहा था.
इस बदइंतजामी को देखकर निगमायुक्त का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने मौके पर ही मौजूद ईगल पी.सी. स्नेहल जे.व्ही. कंपनी के प्रतिनिधियों और निगम के जिम्मेदार अधिकारियों की जमकर क्लास लगाई. निगमायुक्त ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विकास कार्य नागरिकों की सुविधा के लिए होते हैं, उनकी जान जोखिम में डालने के लिए नहीं. उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि बिना सुरक्षा इंतजामों के इतना बड़ा काम कैसे चल रहा है? सड़क पर बिखरी रेत और खुले गड्ढे किसी बड़ी दुर्घटना को न्योता दे रहे थे. नागरिकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के प्रति अपनी चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने तत्काल प्रभाव से कंपनी के कार्य पर तीन दिनों का प्रतिबंध लगा दिया. यह प्रतिबंध तब तक जारी रहेगा जब तक कंपनी सुरक्षा के सभी मानकों को पूरा नहीं कर लेती. यह कार्रवाई शहर के उन सभी ठेकेदारों के लिए एक बड़ा संदेश है जो सरकारी काम मिलने के बाद जनता की परेशानियों को भूल जाते हैं.
लापरवाही की कीमत भी ठेका कंपनी को भारी चुकानी पड़ी है. निगमायुक्त ने असुरक्षित तरीके से कार्य करने और आम जनजीवन को खतरे में डालने के लिए कंपनी पर 5 लाख रुपये का अर्थदंड (पेनाल्टी) लगाया. इसके साथ ही, सड़क किनारे बेतरतीब तरीके से रेत और बालू के ढेर लगाकर यातायात बाधित करने के लिए 50 हजार रुपये का अलग से 'स्पॉट फाइन' भी वसूला गया. कुल मिलाकर साढ़े पांच लाख रुपये का यह जुर्माना हाल के दिनों में किसी निर्माण एजेंसी पर की गई सबसे बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है. निगमायुक्त ने जुर्माने की रसीद कटवाते हुए निर्देश दिए कि यह राशि कंपनी के बिल से काटी जाएगी या तत्काल जमा करवाई जाएगी. उन्होंने साफ किया कि जनता के टैक्स के पैसे से चल रहे प्रोजेक्ट में जनता की ही जान से खिलवाड़ किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
कार्रवाई का दौर यहीं नहीं थमा. निगमायुक्त ने ठेकेदार को अल्टीमेटम देते हुए कहा कि अगले तीन दिनों के भीतर पूरे निर्माण क्षेत्र में लोहे की मजबूत और ऊंची बैरीकेटिंग की जाए, ताकि कोई भी वाहन या पैदल राहगीर गलती से गड्ढे में न गिरे. उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि जब तक बैरीकेटिंग और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हो जाते, तब तक एक इंच भी खुदाई नहीं होगी. इसके अलावा, सड़क पर उड़ रही धूल को नियंत्रित करने के लिए पानी का छिड़काव करने और सड़क की तुरंत सफाई और धुलाई करने के निर्देश भी रात में ही दे दिए गए. निगमायुक्त के तेवर देख ठेका कंपनी के कर्मचारियों के हाथ-पांव फूल गए और रात में ही सफाई अभियान शुरू करना पड़ा. यह दृश्य उन नागरिकों के लिए राहत भरा था जो पिछले कई दिनों से धूल और गंदगी से परेशान थे.
इसके साथ ही, निगमायुक्त ने प्रोजेक्ट के कंसल्टेंट और निगम के उपयंत्रियों को भी फटकार लगाई. उन्होंने सवाल किया कि उनकी निगरानी के बावजूद ठेकेदार इतनी मनमानी कैसे कर रहा है? उन्होंने निर्देश दिए कि जिन हिस्सों में पाइप लाइन डाली जा चुकी है, वहां तत्काल 'री-स्टोरेशन' का काम शुरू किया जाए. अक्सर देखा जाता है कि पाइप डालने के बाद गड्ढों को मिट्टी से भरकर छोड़ दिया जाता है जो बाद में धंस जाते हैं. लेकिन इस बार निगमायुक्त ने स्पष्ट किया कि री-स्टोरेशन का काम उच्च गुणवत्ता के साथ होना चाहिए. सड़क को वापस उसी स्थिति में लाना होगा जैसी वह खुदाई से पहले थी. उन्होंने अधिकारियों को हिदायत दी कि वे एसी कमरों से बाहर निकलें और फील्ड पर जाकर काम की गुणवत्ता चेक करें. यदि भविष्य में दोबारा ऐसी लापरवाही मिली तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ भी विभागीय जांच शुरू की जाएगी.
ग्वारीघाट रोड जबलपुर का एक प्रमुख मार्ग है जहां से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु मां नर्मदा के दर्शन के लिए जाते हैं. ऐसे व्यस्त मार्ग पर इस तरह की अव्यवस्था न केवल यातायात को बाधित करती है बल्कि शहर की छवि भी खराब करती है. निगमायुक्त रामप्रकाश अहिरवार के इस कदम की स्थानीय नागरिकों ने सराहना की है. उनका कहना है कि पहली बार किसी अधिकारी ने ठेकेदारों की मनमानी पर इतनी सख्ती दिखाई है. अमृत 2.0 परियोजना शहर की पेयजल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में हो रही लेटलतीफी और लापरवाही ने लोगों को हताश कर दिया था. अब उम्मीद बंधी है कि इस कार्रवाई के बाद काम में तेजी आएगी और गुणवत्ता में भी सुधार होगा.
निगमायुक्त ने अपने निर्देशों में यह भी जोड़ा कि काम को टुकड़ों में बांटा जाए. यानी, पहले एक हिस्से की खुदाई हो, पाइप डाला जाए और उसका री-स्टोरेशन पूरा होने के बाद ही आगे की खुदाई की जाए. पूरी सड़क को एक साथ खोदकर छोड़ देने की प्रवृत्ति पर उन्होंने रोक लगा दी है. तीन दिन बाद जब काम दोबारा शुरू होगा, तब भी निगमायुक्त स्वयं इसका निरीक्षण करेंगे. यदि मानकों का पालन नहीं हुआ तो ठेका निरस्त करने की प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है. रात के सन्नाटे में हुई इस कार्रवाई ने सुबह होते-होते शहर में चर्चा का बाजार गर्म कर दिया है. यह कार्रवाई प्रशासन की बदलती कार्यशैली और जनहित के प्रति उसकी संवेदनशीलता का परिचायक है. अब देखना यह होगा कि तीन दिन के बाद ईगल पी.सी. स्नेहल जे.व्ही. कंपनी अपनी कार्यप्रणाली में कितना सुधार लाती है, लेकिन फिलहाल तो निगमायुक्त के इस 'नाइट मार्च' ने लापरवाह सिस्टम की नींद उड़ा दी है.
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