विशेष जबलपुर. जब किसी नगर की आत्मा स्वयं अपने भविष्य को पुकारने लगती है, तब समय एक साधारण दिन नहीं रहता-वह इतिहास बन जाता है. संस्कारधानी की माटी उसी महान क्षण की गवाह बनने जा रही है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथों जिस ‘गीता भवन वैचारिक अध्ययन केंद्र’ का लोकार्पण होने जा रहा है, वह केवल एक सरकारी भवन का फीता काटना मात्र नहीं है, बल्कि यह उस "वैचारिक कुंभ" का प्रारंभ है जिसका इंतजार पीढ़ियों से था. अगर आज आप इस परिवर्तन के साक्षी नहीं बने, तो आप उस ऐतिहासिक मोड़ को देखने से चूक जाएंगे जो जबलपुर को दुनिया के बौद्धिक मानचित्र पर पुनर्स्थापित करने वाला है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं शिक्षा और संस्कृति के गहरे पैरोकार रहे हैं. उनके द्वारा इस केंद्र का शुभारंभ करना इस बात का प्रतीक है कि मध्य प्रदेश अब केवल कृषि या उद्योग में ही नहीं, बल्कि "बौद्धिक नेतृत्व" में भी देश का मार्गदर्शन करेगा.
संस्कारधानी जबलपुर आज एक ऐसे ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनने जा रही है, जिसे यदि किसी ने देखा, महसूस किया और समझा नहीं, तो मानो उसने अपने समय की एक वैचारिक क्रांति को छूने का अवसर खो दिया. यह केवल एक भवन का लोकार्पण नहीं, बल्कि जबलपुर की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक चेतना और उसके बौद्धिक भविष्य का औपचारिक उद्घोष है. नगर निगम जबलपुर द्वारा विकसित ‘गीता भवन वैचारिक अध्ययन केंद्र’ का शुभारंभ आज मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कर-कमलों से होने जा रहा है, और इसी के साथ संस्कारधानी में विचारों के एक नए तीर्थ का प्रादुर्भाव हो रहा है.
भारतीय उपनिषदों का उद्घोष है-“विद्ययाऽमृतमश्नुते” (विद्या से ही अमृत की प्राप्ति होती है).
जबलपुर हमेशा से रानी दुर्गावती के शौर्य और आचार्य रजनीश (ओशो) जैसी प्रखर प्रज्ञा की स्थली रही है. लेकिन समय की धूल ने यहाँ की वैचारिक सक्रियता को कहीं पीछे धकेल दिया था. नगर निगम जबलपुर द्वारा निर्मित यह गीता भवन उसी सोई हुई चेतना को जगाने का 'ब्रह्मास्त्र' है.
यह कोई साधारण पुस्तकालय नहीं है. दिल्ली के 'नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी' (NMML) या कोलकाता के 'नेशनल लाइब्रेरी' की तर्ज पर, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों के साथ, यह केंद्र जबलपुर को एक ऐसी बौद्धिक पहचान देने जा रहा है जो अब तक केवल महानगरों तक सीमित थी.
क्यों खास है गीता भवन?
जब हम देश के बड़े अध्ययन केंद्रों की बात करते हैं, तो हमारे मन में दिल्ली या पुणे जैसे शहरों का नाम आता है. आइए समझते हैं कि गीता भवन इन दिग्गजों के समकक्ष कैसे खड़ा है:
ज्ञान का डिजिटल संगम:
जहाँ पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में दुर्लभ पांडुलिपियों का खजाना है, वहीं जबलपुर का यह गीता भवन अपनी ई-लाइब्रेरी और 25 हाई-टेक कंप्यूटरों के माध्यम से दुनिया भर के डिजिटल ज्ञान को एक क्लिक पर उपलब्ध करा रहा है.
समग्रता :
दिल्ली के 'इंडिया हैबिटेट सेंटर' की तरह यहाँ 900 सीटों वाला भव्य ऑडिटोरियम है, लेकिन यहाँ की विशिष्टता इसके 'रामायण कक्ष' और 'गीता कक्ष' में है, जो भारत के मूल दर्शन को शोध का विषय बनाते हैं.
आधुनिक सुविधाएं:
एक सुसज्जित कैफेटेरिया, जहाँ 100 लोग बैठकर चर्चा कर सकें, यह इसे लंदन की 'ब्रिटिश लाइब्रेरी' जैसा एक 'कम्युनिटी हब' बनाता है, जहाँ ज्ञान केवल एकांत की वस्तु नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम है.
विष्णु पुराण का यह सूत्र- “सा विद्या या विमुक्तये” (विद्या वही है जो मुक्ति दिलाए)-यहाँ अक्षरशः चरितार्थ होता है. 5000 से अधिक पुस्तकों का यह संग्रह केवल कागजों का संकलन नहीं है. इसमें सनातन ज्ञान (वेद, पुराण, उपनिषद), आधुनिक विज्ञान के क्रांतिकारी ग्रंथ और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए समर्पित एक समृद्ध अनुभाग शामिल है. यह प्रशासनिक सेवा के सपने देखने वाले युवाओं की नई 'तपोभूमि' बनेगा. यह केंद्र “ज्ञानं परमं बलम्” के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ मंगाया गया लाइसेंस प्राप्त डिजिटल कंटेंट इसे विश्वस्तरीय शोध केंद्र की श्रेणी में खड़ा करता है.
सिर्फ पढ़ना नहीं, गढ़ना है
गीता भवन की संरचना इस प्रकार की गई है कि यहाँ विचार केवल जन्म नहीं लेंगे, बल्कि उनका 'मंथन' होगा.
विचार मंथन कक्ष: यहाँ विद्वान ऑनलाइन और ऑफलाइन जुड़ेंगे. कल्पना कीजिए—जबलपुर का एक छात्र इस केंद्र में बैठकर विश्व के किसी बड़े विश्वविद्यालय के प्रोफेसर से सीधे संवाद कर रहा होगा. क्या यह किसी वैचारिक क्रांति से कम है?
सामाजिक समरसता: 'सर्वधर्म पुस्तक कक्ष' यह संदेश देता है कि संस्कारधानी का विचार सबको साथ लेकर चलने वाला है. यह “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना का सजीव केंद्र है.
इतिहास पुकार रहा है, क्या आप तैयार हैं?
याद रखिए, भवन ईंटों से बनते हैं, लेकिन संस्थान 'विचारों' से. आज जबलपुर की सड़कों पर जो उत्साह है, वह इस बात का संकेत है कि संस्कारधानी अपनी खोई हुई बौद्धिक विरासत को वापस पाने के लिए आतुर है.
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” (उठो, जागो और श्रेष्ठ को प्राप्त करो).
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कर-कमलों से होने वाला यह लोकार्पण केवल एक प्रशासनिक आयोजन नहीं, बल्कि उस सोच का सार्वजनिक उद्घोष है कि मध्य प्रदेश का विकास अब वैचारिक और सांस्कृतिक भी होगा. जबलपुर के लिए यह क्षण उसी तरह ऐतिहासिक है, जैसे किसी नगर में युगांतकारी विश्वविद्यालय का जन्म. यह केंद्र बताएगा कि विकास का अर्थ केवल सड़कें और इमारतें नहीं, बल्कि विचार और चेतना का विस्तार भी है. आज जब गीता भवन के द्वार खुलेंगे, तो वास्तव में जबलपुर में एक नया वैचारिक सूर्योदय होगा. संस्कारधानी ने आज केवल एक भवन नहीं, बल्कि अपने स्वर्णिम भविष्य की नींव रख दी है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-


