जबलपुर। डिजिटल युग में जहां मोबाइल और कंप्यूटर शिक्षा, सूचना और संवाद का सबसे बड़ा माध्यम बन चुके हैं, वहीं दृष्टिहीन लोगों के लिए यह तकनीकी दुनिया आज भी कई चुनौतियां लेकर आती है। ऐसे समय में जबलपुर से सामने आई एक सकारात्मक और प्रेरक पहल ने न केवल शहर बल्कि पूरे प्रदेश के दृष्टिबाधित समुदाय के लिए नई उम्मीद जगाई है। मोबाइल स्क्रीन पर लिखी किसी भी स्क्रिप्ट को पलक झपकते ही ब्रेल लिपि में बदल देने वाला उपकरण ‘ऑर्बिट-20’ इन दिनों जबलपुर के दृष्टिहीन छात्रावास और शिक्षण संस्थानों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यह उपकरण दृष्टिहीन बच्चों और युवाओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं माना जा रहा है।
4 जनवरी को विश्व ब्रेल लिपि दिवस मनाया गया। यह वही दिन है जब लुई ब्रेल ने दृष्टिहीनों के पढ़ने और सीखने के लिए ब्रेल लिपि का आविष्कार किया था। इसी दिन जबलपुर में भी ब्रेल से जुड़ी यह नई तकनीक सुर्खियों में आई। जन्म से दृष्टिहीन राजा चौरसिया की पहल और प्रयासों से यह अत्याधुनिक उपकरण जबलपुर तक पहुंच सका, जिसने दृष्टिहीन छात्रों की पढ़ाई को आसान और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। राजा चौरसिया का जीवन संघर्ष और संकल्प की मिसाल है। नरसिंहपुर जिले के निवासी राजा जन्म से ही दृष्टिहीन हैं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा जबलपुर के दृष्टिहीन विद्यालय में रहकर पूरी की और बाद में दृष्टिहीन छात्रावास में रहकर उच्च शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया। वर्तमान में वे पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे हैं। ब्रेल लिपि के माध्यम से शिक्षा हासिल करने वाले राजा ने समय के साथ यह महसूस किया कि आज की पढ़ाई केवल किताबों और ब्रेल तक सीमित नहीं रह गई है। मोबाइल, कंप्यूटर, ई-बुक, ऑनलाइन नोट्स और डिजिटल कंटेंट शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इन तक दृष्टिहीनों की पहुंच अब भी सीमित है। इसी चुनौती ने राजा को सोचने पर मजबूर किया कि क्या कोई ऐसा उपकरण है जो मोबाइल से जुड़कर स्क्रीन पर लिखी सामग्री को ब्रेल लिपि में बदल सके। उन्होंने इंटरनेट और विभिन्न स्रोतों के माध्यम से जानकारी जुटानी शुरू की। इसी खोज के दौरान उन्हें ‘ऑर्बिट-20’ नामक ब्रेल डिस्प्ले उपकरण के बारे में पता चला। यह उपकरण मोबाइल या कंप्यूटर से कनेक्ट होकर स्क्रीन पर मौजूद टेक्स्ट को ब्रेल डॉट्स में बदल देता है, जिसे दृष्टिहीन व्यक्ति अपनी उंगलियों से पढ़ सकता है। हालांकि यह तकनीक जितनी उपयोगी है, उतनी ही महंगी भी। ऑर्बिट-20 की कीमत आम दृष्टिहीन छात्रों और परिवारों की पहुंच से बाहर है। लेकिन राजा ने हार नहीं मानी। उन्होंने सामाजिक संस्थाओं और स्वयंसेवी संगठनों से संपर्क किया और अपनी लगन के बल पर इस उपकरण को हासिल करने में सफल रहे। जब यह उपकरण जबलपुर के दृष्टिहीन छात्रावास में पहुंचा, तो मानो पढ़ाई का एक नया रास्ता खुल गया। अब स्थिति यह है कि मोबाइल पर आने वाला कोई भी संदेश, ई-बुक, नोट्स या दस्तावेज पलक झपकते ही ब्रेल लिपि में बदल जाता है। दृष्टिहीन छात्र बिना देखे और बिना सुने, केवल स्पर्श के माध्यम से सामग्री को समझ पा रहे हैं। इससे न केवल उनकी पढ़ने की गति बढ़ी है, बल्कि आत्मविश्वास में भी जबरदस्त इजाफा हुआ है। जबलपुर के दृष्टिहीन शिक्षक कोमल सिंह बघेल भी इस उपकरण को शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी मानते हैं। उनका कहना है कि ऑर्बिट-20 जैसे उपकरण दृष्टिबाधित छात्रों के लिए पढ़ाई को कहीं अधिक सरल और प्रभावी बना सकते हैं। डिजिटल शिक्षा के इस दौर में यह तकनीक उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का काम कर रही है। राजा चौरसिया का कहना है कि इस उपकरण से उनकी पढ़ाई में काफी मदद मिली है। मोबाइल और कंप्यूटर पर उपलब्ध अध्ययन सामग्री अब उनके लिए पहले से कहीं ज्यादा सुलभ हो गई है। वे यह भी बताते हैं कि ऑर्बिट-20 बनाने वाली कंपनी आगे भी ऐसे कई उपकरण विकसित कर रही है, लेकिन उनकी कीमत अधिक होने के कारण आम दृष्टिहीन लोगों के लिए इन्हें खरीद पाना मुश्किल है। स्वयंसेवी संस्थाएं जरूर मदद करती हैं, लेकिन उनकी पहुंच अभी जबलपुर जैसे शहरों तक ही सीमित है। इस उपकरण को बनाने वाली कंपनी ऑर्बिट रिसर्च अमेरिका की है, लेकिन गर्व की बात यह है कि इसके रिसर्चर और मालिक वेंकटेश चारी भारतीय मूल के हैं। अमेरिका में रहकर उन्होंने दृष्टिहीनों के लिए जो रिसर्च और नवाचार किए हैं, वे पूरी दुनिया में सराहे जा रहे हैं। उनके अधिकांश प्रोडक्ट पेटेंटेड हैं और शिक्षा के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीकों को बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने के लिए सरकारों को भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, ताकि दृष्टिहीन लोगों को कम लागत में ये उपकरण मिल सकें। जबलपुर में ऑर्बिट-20 का आना केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समावेशन और समान अवसरों की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। यह साबित करता है कि सही तकनीक और मजबूत इच्छाशक्ति मिल जाए, तो दृष्टिहीनता भी ज्ञान और प्रगति के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती। आज जबलपुर के दृष्टिहीन छात्र इस उपकरण के माध्यम से भविष्य के नए सपने देख रहे हैं और डिजिटल दुनिया में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
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