भोपाल.जब सिनेमा केवल मनोरंजन न रहकर समाज से सीधा संवाद करने लगे, तब वह कला नहीं बल्कि एक सार्वजनिक हस्तक्षेप बन जाता है. कुछ ऐसा ही दृश्य शनिवार शाम भोपाल में देखने को मिला, जहाँ आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, भारत द्वारा आयोजित विचारोत्तेजक सिने आयोजन “सिनेमा नज़र से नज़र तक” ने दर्शकों को केवल फ़िल्में नहीं दिखाई, बल्कि उन्हें अपने समय, समाज और संवेदना से आँख मिलाने के लिए विवश कर दिया. 18 जनवरी 2026 को सायं चार बजे से हाइब्रिड मोड में आयोजित यह कार्यक्रम दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय, शिवाजी नगर में संपन्न हुआ, जिसमें सिनेमा, समाज और मानवीय सरोकारों के बीच एक जीवंत और गहन संवाद उभरकर सामने आया.
कार्यक्रम की शुरुआत फाउंडेशन की ओर से प्रो. आशा शुक्ला के प्रस्तावना और स्वागत वक्तव्य से हुई, जिसमें उन्होंने सिनेमा को शांति, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों का प्रभावशाली माध्यम बताते हुए कहा कि आज के असहज और आक्रामक समय में संवेदनशील कला की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि “सिनेमा नज़र से नज़र तक” का उद्देश्य कैमरे और दर्शक के बीच नहीं, बल्कि मनुष्य और मनुष्य के बीच संवाद स्थापित करना है.
इस आयोजन में प्रदर्शित पहली फ़िल्म ‘प्यास’ ने दर्शकों को आंतरिक द्वंद्व और आत्म-खोज की यात्रा पर ले जाने का कार्य किया. निर्देशक सूर्यान्शु सक्सेना की यह फिल्म एक युवा अर्जुन की कथा है, जो पुजारी बनने की परंपरागत राह पर चलते हुए अपने विश्वास, आस्था और सही कर्म को लेकर गहरे प्रश्नों से जूझता है. फिल्म में अर्जुन का संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना का भी प्रतीक बनकर उभरता है, जहां परंपरा और विवेक के बीच टकराव लगातार बना रहता है. ‘प्यास’ दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आस्था केवल स्वीकार करने का नाम है या प्रश्न करने का साहस भी उसका हिस्सा है. फिल्म की संवेदनशील कथा और संयमित प्रस्तुति ने दर्शकों के बीच गहरी चुप्पी और आत्ममंथन का माहौल रचा.
कार्यक्रम की दूसरी और सबसे अधिक झकझोर देने वाली प्रस्तुति रही मूक लघु फ़िल्म ‘ग्वावा – ए मॉब लिंचिंग’. निर्देशक राहुल शर्मा (राहुल्य) की यह 14 मिनट की फिल्म बिना किसी संवाद के भारत में बढ़ती भीड़ हिंसा की भयावह सच्चाई को सामने रखती है. स्वर रंग फ़िल्म्स के बैनर तले बनी इस फ़िल्म की निर्माता एवं संगीतकार अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सितार वादिका स्मिता नागदेव हैं. यह फिल्म पहले ही खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2025 में आधिकारिक स्क्रीनिंग के लिए चयनित हो चुकी है, जिससे इसकी वैश्विक प्रासंगिकता भी रेखांकित होती है.
फ़िल्म की कहानी एक ऐसे निर्धन व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी पत्नी मृत्यु शैया पर है और इलाज में उसकी सारी पूंजी समाप्त हो चुकी है. भूखी बच्ची और बीमार पत्नी के लिए भोजन जुटाने की मजबूरी में वह सार्वजनिक स्थान से कुछ उठा लेता है. यही क्षण उसके जीवन का अंतिम क्षण बन जाता है, जब एक उन्मादी भीड़ उसे चोर समझकर पीट-पीटकर मार डालती है. फिल्म में संवाद का न होना दर्शकों को और अधिक असहज करता है, क्योंकि हर दृश्य एक सवाल की तरह सामने खड़ा हो जाता है. राग मियां की तोड़ी पर आधारित पृष्ठभूमि संगीत, जिसमें सितार और तबले का प्रभावशाली प्रयोग है, फिल्म की पीड़ा को शब्दों के बिना ही भीतर तक उतार देता है.
फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद दर्शक देर तक मौन में डूबे रहे. निर्देशक राहुल शर्मा ने फिल्म के संदर्भ में कहा कि यह कृति भीड़ हिंसा के ख़िलाफ़ एक मूक चीख है और हर फ्रेम के पीछे किसी न किसी अनकही मानवीय त्रासदी की छाया है. उन्होंने इसे संवैधानिक मूल्यों, सहानुभूति और आत्मनिरीक्षण की एक विनम्र लेकिन दृढ़ अपील बताया.
फ़िल्मों के बाद आयोजित संवाद एवं विमर्श सत्र ने इस आयोजन को केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैचारिक मंच में परिवर्तित कर दिया. वरिष्ठ फ़िल्म निर्देशक, सिनेमेटोग्राफर और स्क्रीनप्ले राइटर प्रो. राजीव गोहिल के साथ हुआ यह संवाद भारतीय सिनेमा के इतिहास, उसके सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों तथा बदलते दर्शक-बोध पर केंद्रित रहा. प्रो. गोहिल ने कहा कि भले ही व्यावसायिक सिनेमा तकनीक और बाज़ार में आगे बढ़ रहा हो, लेकिन समाज की नैतिक और संवेदनात्मक अपेक्षाएँ आज भी यथार्थवादी और कला सिनेमा से जुड़ी हैं. उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सिनेमा केवल समाज को प्रतिबिंबित नहीं करता, बल्कि कई बार उसे दिशा देने का कार्य भी करता है.
इस सत्र में संवादकर्ता के रूप में पत्रकार एवं स्तंभकार पंकज शुक्ला ने सिनेमा और सामाजिक उत्तरदायित्व के रिश्ते को लेकर तीखे और विचारोत्तेजक प्रश्न रखे, जिनसे चर्चा और अधिक गहरी होती चली गई. कार्यक्रम के समापन पर डॉ. वीणा सिन्हा ने आयोजन की प्रासंगिकता पर विस्तार से टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे सिने संवाद आज के समय में लोकतांत्रिक चेतना को जीवित रखने के लिए आवश्यक हैं.
कार्यक्रम का संचालन विशाखा राजुरकर और अपर्णा पात्रिकर ने सहज और प्रभावी ढंग से किया. प्रो. आर. के. शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि लव चावड़ीकर ने समन्वयन की ज़िम्मेदारी निभाई. आयोजन में शहर के गणमान्य नागरिकों, कलाकारों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही, जो यह संकेत देती है कि संवेदनशील सिनेमा के लिए दर्शक अब भी मौजूद हैं.
“सिनेमा नज़र से नज़र तक” ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब कला ईमानदारी से अपने समय की पीड़ा, प्रश्नों और अंतर्विरोधों को सामने रखती है, तो वह केवल पर्दे तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दर्शक की चेतना में स्थायी हस्तक्षेप करती है. भोपाल की इस शाम ने साबित किया कि सिनेमा आज भी समाज से आँख मिलाने की ताकत रखता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

