माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि यानी बसंत पंचमी का पावन पर्व इस बार 23 जनवरी 2026 शुक्रवार को पूरे देश में अपार हर्षोल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ मनाया जाएगा। शास्त्र सम्मत मान्यताओं के अनुसार यह दिन केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं है बल्कि यह वह सूक्ष्म संधि-काल है जब ब्रह्मांड की चेतना, प्रकृति का सौंदर्य और विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की कृपा एक ही तरंग में प्रवाहित होती है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार पंचमी तिथि का शुभारंभ 23 जनवरी को तड़के 02:28 बजे से हो जाएगा जो कि अगले दिन 24 जनवरी की रात्रि 01:46 बजे तक बना रहेगा, ऐसे में उदयातिथि के मान से 23 जनवरी को ही सरस्वती पूजन का विधान सर्वश्रेष्ठ रहेगा। इस विशेष दिन पर मां शारदा की आराधना के लिए सुबह 07:13 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक का समय सबसे शुभ फलदायी माना जा रहा है जिसमें पूजन करने से साधकों को ज्ञान, वाणी और बुद्धि का अक्षय वरदान प्राप्त होगा।
ऋग्वेद के ऋचाओं में भगवती सरस्वती को 'प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु' कहकर संबोधित किया गया है जिसका सीधा अर्थ है कि वे परम चेतना हैं और हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा समस्त मनोवृत्तियों की एकमात्र संरक्षिका हैं। बसंत पंचमी का यह अवसर विशेष रूप से उन विद्यार्थियों और साधकों के लिए वरदान की तरह है जो शिक्षा, प्रतियोगिता या कला के क्षेत्र में सफलता की कामना रखते हैं। आध्यात्मिक गुरुओं का मत है कि इस दिन किया गया एक छोटा सा सात्विक प्रयास भी पूरे वर्ष के लिए भाग्य के द्वार खोल सकता है क्योंकि मां सरस्वती की कृपा कठोर परिश्रम से अधिक व्यक्ति के शुद्ध भाव और एकाग्रता पर निर्भर करती है। इसी कारण इस दिन कुछ विशेष उपायों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है जो सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्रभाव पैदा करते हैं।
वाणी दोष, अनियंत्रित क्रोध और मानसिक अशांति से जूझ रहे लोगों के लिए इस दिन मौन-संकल्प का उपाय अत्यंत प्रभावी बताया गया है। परंपरा के अनुसार सूर्योदय से लेकर दोपहर 12 बजे तक मौन धारण कर मन में शुद्ध विचारों का प्रवाह रखने से वाणी में ओज और विचारों में स्पष्टता आती है। इसे मात्र एक तप नहीं बल्कि वाणी-संस्कार माना जाता है जो केवल बसंत पंचमी के विशिष्ट वातावरण में ही सिद्ध होता है। इसके अतिरिक्त छात्रों और शिक्षकों के लिए 'विद्या-ग्रंथ जागरण' का विधान है जिसमें अपनी प्रिय पुस्तकों या शास्त्रों को पीले वस्त्र पर स्थापित कर उन पर हल्दी या केसर का तिलक लगाया जाता है और 'ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः' के मंत्र जाप से उनमें चेतना जागृत की जाती है। यह प्रक्रिया शिक्षा के प्रति श्रद्धा भाव को बढ़ाती है और अध्ययन में आने वाली बाधाओं को दूर करती है।
करियर में भ्रम की स्थिति और आत्मविश्वास की कमी का सामना कर रहे युवाओं के लिए पीले दीपक का विशेष प्रयोग सुझाया गया है। घी के दीपक में एक चुटकी हल्दी मिलाकर मां सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलित करना और कुछ समय एकाग्र होकर उस ज्योति को देखना निर्णय शक्ति को मजबूत करता है। छोटे बच्चों के लिए तो यह दिन अक्षराभंभ या विद्यारंभ संस्कार का लघु रूप है जिसमें पीले कागज पर बच्चे से पहली बार कोई अक्षर या मंत्र लिखवाया जाता है जो उनके भविष्य की शैक्षणिक नींव को सुदृढ़ करता है। दान के दृष्टिकोण से भी यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है जहां पीली मिठाई, पीले वस्त्र और विशेषकर शिक्षण सामग्री जैसे कॉपी-पेन का दान सीधे सरस्वती कृपा से जोड़ता है और इसके परिणाम शीघ्र प्राप्त होते हैं।
बसंत पंचमी का यह उत्सव हमें सिखाता है कि सफलता के लिए केवल कठिन साधना या कठोर व्रत अनिवार्य नहीं हैं बल्कि शुद्ध भाव, मौन का संयम, पीले रंग की सात्विकता और विद्या का सच्चा सम्मान ही मां शारदा को प्रसन्न करने के सर्वोत्तम मार्ग हैं। यह वह दिन है जब प्रकृति स्वयं केसरिया बाना पहनकर ज्ञान के स्वागत में खड़ी होती है और हर वह व्यक्ति जो अपनी बुद्धि को संस्कारित करना चाहता है, वह इस सुनहरे अवसर का लाभ उठाकर अपने जीवन में नई ऊर्जा का संचार कर सकता है। अतः इस शुक्रवार को शुभ मुहूर्त में मां सरस्वती का आह्वान कर ज्ञान और विवेक की ज्योति जलाना प्रत्येक साधक के लिए मंगलकारी सिद्ध होगा।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-




