सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन महाकाल मंदिर में वीआईपी दर्शन याचिका ठुकराई, आम भक्तों की प्रवेश स्वतंत्रता बनी रहेगी

सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन महाकाल मंदिर में वीआईपी दर्शन याचिका ठुकराई

प्रेषित समय :22:35:15 PM / Tue, Jan 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. उज्जैन के प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 27 जनवरी 2026 को खारिज कर दिया. शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मंदिर में किसे और कब प्रवेश करना चाहिए, यह तय करने का अधिकार अदालत का नहीं है और इस मामले में हस्तक्षेप करना न्यायालय की भूमिका में नहीं आता.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन को संबोधित करते हुए कहा कि महाकाल की उपस्थिति में कोई भी वीआईपी नहीं है. न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि मंदिर प्रबंधन की ओर से लिए गए निर्णयों का सम्मान किया जाना चाहिए और अदालत इसे तय नहीं कर सकती कि किसे विशेष सुविधाएं मिलें या किसे दर्शन करने में प्राथमिकता दी जाए.

याचिका में दलील दी गई थी कि मंदिर में वीआईपी दर्शन की व्यवस्था सामान्य श्रद्धालुओं के अधिकारों का हनन कर रही है और इससे सार्वजनिक व्यवस्था एवं समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन हो रहा है. याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट मंदिर प्रशासन को निर्देश दे कि सभी श्रद्धालुओं को समान रूप से दर्शन का अवसर मिले और किसी को किसी विशेष सुविधा के तहत प्राथमिकता न दी जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा कि धार्मिक स्थलों का प्रबंधन और वहां की व्यवस्थाएं मंदिर प्रशासन और संबंधित प्राधिकरणों के निर्णयाधिकार में आती हैं. अदालत ने यह भी कहा कि यह विषय धार्मिक आस्था और स्थानीय प्रशासनिक नियमों से जुड़ा है, जिसे न्यायिक हस्तक्षेप की बजाय संबंधित प्रबंधन द्वारा देखा जाना चाहिए.

न्यायालय की ओर से यह निर्णय आते ही मंदिर प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर ध्यान केंद्रित हो गया. उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश का प्रमुख धार्मिक स्थल है और यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं. मंदिर में वीआईपी दर्शन की सुविधा लंबे समय से चल रही है, जिसमें कुछ विशेष मेहमानों और आमंत्रित व्यक्तियों को दर्शन में प्राथमिकता दी जाती है.

मंदिर प्रशासन के अनुसार वीआईपी दर्शन व्यवस्था का उद्देश्य विशेष परिस्थितियों में तीर्थयात्रियों और अतिथियों को सहज और व्यवस्थित रूप से दर्शन उपलब्ध कराना है. मंदिर में दर्शन की प्रक्रिया में भक्तों की भीड़ और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह व्यवस्था बनाई गई है. प्रशासन का कहना है कि यह सुविधा केवल समय और प्रबंधन के दृष्टिकोण से है और किसी भी श्रद्धालु के अधिकार का हनन नहीं करती.

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद याचिकाकर्ता और नागरिक समूहों के बीच प्रतिक्रिया मिली-जुली रही. कुछ लोग इसे मंदिर प्रबंधन की स्वतंत्रता और धार्मिक आस्था के प्रति सम्मान के रूप में देख रहे हैं, जबकि कुछ ने यह कहा कि मंदिर में वीआईपी दर्शन की प्रथा आम श्रद्धालुओं के लिए असमानता पैदा कर सकती है.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन हजारों भक्त आते हैं और त्योहारी मौसम में यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है. मंदिर प्रशासन ने यह सुनिश्चित करने के लिए कई व्यवस्थाएं की हैं, जैसे दर्शन की कतार, सुरक्षा व्यवस्था, और भक्तों के लिए समयबद्ध स्लॉट. वीआईपी दर्शन व्यवस्था इन्हीं व्यवस्थाओं के हिस्से के रूप में संचालित की जाती है, ताकि श्रद्धालु भीड़ के बीच सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से दर्शन कर सकें.

धार्मिक विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय धर्मस्थलों में प्रशासनिक निर्णयों की स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता को मान्यता देने वाला है. उन्होंने बताया कि अदालत का उद्देश्य केवल न्यायिक हस्तक्षेप के मामलों तक सीमित होना चाहिए, और धार्मिक आस्थाओं से जुड़े मामलों में स्थानीय प्रबंधन का निर्णय सर्वोच्च माना जाना चाहिए.

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया था कि वीआईपी दर्शन से आम श्रद्धालुओं को प्रतीक्षा करनी पड़ती है और कई बार उन्हें लंबे समय तक बाहर इंतजार करना पड़ता है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि मंदिर प्रशासन अपनी व्यवस्था के तहत श्रद्धालुओं की सुविधा सुनिश्चित करता है और किसी भी धर्मस्थल में न्यायालय का यह कर्तव्य नहीं कि वह दर्शन के समय या प्रक्रिया में हस्तक्षेप करे.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि धार्मिक स्थलों में प्रबंधन की जिम्मेदारी प्रशासन और मंदिर प्राधिकरण के हाथ में है. अदालत ने कहा कि धार्मिक स्थलों में किसी भी तरह की असुविधा या असमानता के आरोपों की समीक्षा स्थानीय प्रशासन द्वारा ही की जानी चाहिए. न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि मंदिर प्रशासन द्वारा लिए गए निर्णय में यदि कोई कानूनी उल्लंघन होता है, तभी न्यायालय का दखल उचित होगा.

वहीं, उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन की प्रथा पर नागरिक समूहों और भक्तों के बीच चर्चाएं जारी हैं. कुछ भक्तों ने कहा कि यह व्यवस्था समय की बचत और श्रद्धालुओं के लिए सुविधा के लिए बनाई गई है, जबकि अन्य ने इसे असमानता का प्रतीक बताया. मंदिर प्रशासन ने दोनों समूहों को संतुलित करने के लिए दर्शन की प्रक्रिया में समयबद्ध व्यवस्था और ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग जैसी सुविधाएं भी शुरू की हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला मंदिर प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन को धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में स्वतंत्रता देता है. अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यह धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का समय नहीं है और मंदिर में वीआईपी दर्शन जैसी व्यवस्थाओं का मूल्यांकन प्रशासन द्वारा किया जाना चाहिए.

अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि आम भक्तों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक है. लेकिन मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने साफ किया कि अदालत किसी भी श्रद्धालु या समूह को दर्शन में प्राथमिकता देने या न देने का निर्णय नहीं ले सकती. अदालत ने कहा कि धर्मस्थलों में श्रद्धालुओं के अधिकार और प्रशासनिक निर्णयों का संतुलन बनाए रखना मंदिर प्रबंधन का काम है.

उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश का प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है. मंदिर में शिव जी की विशेष पूजा और रात्रि दर्शन का आयोजन होता है. वीआईपी दर्शन की सुविधा लंबे समय से चली आ रही है, और यह विशेष अवसरों और त्यौहारों के दौरान और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह संदेश गया कि धार्मिक स्थलों में प्रशासनिक निर्णयों में न्यायालय का हस्तक्षेप तभी किया जाएगा जब कोई गंभीर कानूनी उल्लंघन हो. इसके अलावा, यह फैसला मंदिर प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन को धर्मस्थलों के संचालन और सुरक्षा में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने का अधिकार देता है.

इस प्रकार, उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में वीआईपी दर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह स्पष्ट करता है कि धार्मिक स्थलों में प्रशासनिक निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है और मंदिर प्रशासन के निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए. अदालत ने इस फैसले के माध्यम से धर्मस्थलों में प्रशासनिक स्वतंत्रता और धार्मिक आस्था के बीच संतुलन बनाए रखने का मार्ग दिखाया है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-