जबलपुर. महज 19 साल के एक छात्र ने न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, बल्कि बिना किसी वरिष्ठ वकील की मदद के खुद अपनी पैरवी करते हुए एमबीबीएस की सीट हासिल कर ली. यह कहानी है जबलपुर निवासी अथर्व चतुर्वेदी की, जिन्होंने आर्थिक तंगी के बावजूद हार नहीं मानी और अपने डॉक्टर बनने के सपने को बचाने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ी.
अथर्व चतुर्वेदी एक साधारण परिवार से आते हैं. उन्होंने 12वीं कक्षा के बाद मेडिकल और इंजीनियरिंग दोनों प्रवेश परीक्षाएं पास की थीं. उनका लक्ष्य स्पष्ट था—उन्हें डॉक्टर बनना है. उन्होंने दो बार नीट परीक्षा पास की और 530 अंक हासिल किए. यह स्कोर उन्हें निजी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश दिलाने के लिए पर्याप्त था, लेकिन समस्या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस कोटे से जुड़ी नीतिगत खामियों के कारण खड़ी हो गई. मध्य प्रदेश में निजी मेडिकल कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत प्रवेश की स्पष्ट नीति न होने से अथर्व जैसे छात्रों को सीट नहीं मिल पा रही थी.
आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि परिवार सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों की भारी फीस चुका सके. ऐसे में अथर्व ने खुद ही अपनी याचिका तैयार करने का फैसला किया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से याचिका का प्रारूप डाउनलोड किया, पुराने फैसलों का अध्ययन किया और विशेष अनुमति याचिका तैयार की. यह कदम किसी भी कानून के छात्र के लिए भी चुनौतीपूर्ण माना जाता है, लेकिन अथर्व ने यह सब स्वयं सीखा. कोविड काल में जब अदालतों की कार्यवाही ऑनलाइन होने लगी, तब उन्होंने वर्चुअल सुनवाई देखकर अदालत की प्रक्रिया, बहस की शैली और कानूनी शब्दावली को समझा.
इससे पहले जब उन्होंने जबलपुर हाई कोर्ट में अपना पक्ष खुद रखा था, तब एक न्यायाधीश ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा था कि उन्हें डॉक्टर नहीं बल्कि वकील बनना चाहिए, क्योंकि वे गलत क्षेत्र में हैं. यह टिप्पणी भले ही हल्के अंदाज में की गई थी, लेकिन इससे अथर्व का आत्मविश्वास और मजबूत हुआ. उनके पिता मनोज चतुर्वेदी पेशे से वकील हैं, हालांकि उन्होंने कभी सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस नहीं की. पिता का मार्गदर्शन और घर का माहौल अथर्व के लिए प्रेरणा बना, लेकिन अदालत में खड़े होकर बहस करना पूरी तरह उनका अपना साहस था.
सुप्रीम कोर्ट में जब अथर्व की याचिका पर सुनवाई हुई, तो उन्होंने मात्र दस मिनट में अपनी बात स्पष्ट और तार्किक ढंग से रखी. उन्होंने अदालत को बताया कि उन्होंने दो बार नीट क्वालीफाई किया है, लेकिन राज्य सरकार द्वारा निजी मेडिकल कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस आरक्षण की स्पष्ट सूचना और नीति न होने के कारण उन्हें प्रवेश से वंचित होना पड़ रहा है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि किसी छात्र को सरकारी नीतिगत कमी का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए.
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने अथर्व की दलीलों को गंभीरता से सुना. अदालत ने माना कि यदि कोई छात्र आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से है और नीट परीक्षा में योग्य घोषित हो चुका है, तो सिर्फ नीति की अस्पष्टता के कारण उसे प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि 2025-26 सत्र के लिए ईडब्ल्यूएस वर्ग के नीट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को प्रोविजनल एडमिशन दिया जाए, बशर्ते वे निर्धारित फीस का भुगतान करें.
यह फैसला सिर्फ अथर्व की व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि उन अनेक छात्रों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है जो आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं और नीतिगत कमियों के कारण अपने सपनों से दूर हो जाते हैं. हालांकि अदालत के आदेश के बाद भी एक बड़ा सवाल शेष है—निजी मेडिकल कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत फीस कितनी होगी. मध्यमवर्गीय और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह चिंता का विषय बना हुआ है.
अथर्व की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी उल्लेखनीय है. उन्होंने महर्षि स्कूल में गणित, जीव विज्ञान, अंग्रेजी और कंप्यूटर विज्ञान जैसे कठिन विषयों का चयन किया था. जीव विज्ञान की प्रैक्टिकल परीक्षा में उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया. जबलपुर गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज में उनका चयन हुआ था, लेकिन उन्होंने इंजीनियरिंग के बजाय मेडिसिन को चुना. उनका मानना था कि कठिन राह ही उन्हें आगे ले जाएगी.
कानून की कोई औपचारिक पढ़ाई न करने के बावजूद अथर्व ने जिस तरह से खुद को तैयार किया, वह प्रेरणादायक है. उन्होंने अपनी अंग्रेजी और अभिव्यक्ति कौशल को बेहतर बनाने के लिए शिक्षकों का मार्गदर्शन लिया. वे मानते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई है. अदालत में खड़े होकर अपनी बात रखना उनके आत्मविश्वास को नई ऊंचाई पर ले गया.
आज जबलपुर ही नहीं, पूरे देश में अथर्व चतुर्वेदी की चर्चा हो रही है. सोशल मीडिया पर उन्हें साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प का प्रतीक बताया जा रहा है. एक 12वीं पास छात्र द्वारा सुप्रीम कोर्ट में खुद बहस कर ऐतिहासिक आदेश हासिल करना असाधारण घटना है. यह कहानी यह भी बताती है कि यदि इरादे मजबूत हों तो संसाधनों की कमी भी रास्ता नहीं रोक सकती.
डॉक्टर बनने का अथर्व का सपना अब एक कदम और करीब है. हालांकि फीस और आगे की औपचारिकताएं अभी शेष हैं, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया है कि संघर्ष से घबराने के बजाय यदि उसे चुनौती की तरह स्वीकार किया जाए, तो असंभव भी संभव हो सकता है. जबलपुर का यह युवा अब उन हजारों छात्रों के लिए प्रेरणा बन चुका है, जो अपने सपनों के लिए व्यवस्था से लड़ने का साहस जुटा रहे हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

