अनिल मिश्र/पटना
बिहार की राजनीति में गुरुवार को जो घटनाक्रम सामने आया, उसने राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी कई नए समीकरणों की संभावनाएं पैदा कर दी हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राज्यसभा जाने का फैसला केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बिहार की सत्ता संरचना और राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. लगभग दो दशकों तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहने वाले नेता का सक्रिय राज्य राजनीति से दिल्ली की ओर रुख करना कई संकेत दे रहा है.
सबसे बड़ा बदलाव बिहार की सत्ता संरचना में देखने को मिल सकता है. यदि नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद बनने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते हैं, तो राज्य में नेतृत्व परिवर्तन लगभग तय माना जा रहा है. राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार मुख्यमंत्री पद भारतीय जनता पार्टी के पास जा सकता है. अगर ऐसा होता है तो लगभग 20 वर्षों बाद बिहार में भाजपा का सीधा मुख्यमंत्री बन सकता है. इससे बिहार की राजनीति में शक्ति संतुलन बदल सकता है. अब तक भाजपा जदयू के साथ गठबंधन में जूनियर पार्टनर की भूमिका में रही है, लेकिन नेतृत्व परिवर्तन के बाद स्थिति उलट सकती है.
दूसरा बड़ा प्रभाव जदयू की राजनीति पर पड़ेगा. नीतीश कुमार केवल मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि जदयू की पूरी राजनीतिक पहचान के केंद्र रहे हैं. उनके सक्रिय राज्य नेतृत्व से हटने के बाद पार्टी को नए नेतृत्व और नई दिशा की जरूरत पड़ेगी. पार्टी के भीतर यह चुनौती होगी कि वह अपने संगठन को मजबूत बनाए और नीतीश कुमार की सामाजिक इंजीनियरिंग की राजनीति को आगे बढ़ाए. जदयू के सामने यह भी सवाल होगा कि वह भाजपा के साथ गठबंधन में अपनी राजनीतिक पहचान को किस तरह बनाए रखे.
बिहार की सामाजिक और जातीय राजनीति पर भी इसका असर पड़ सकता है. नीतीश कुमार ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में पिछड़े, अति-पिछड़े और महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करने की रणनीति अपनाई थी. पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण, बालिका साइकिल योजना और शिक्षा से जुड़ी योजनाओं ने उन्हें एक सामाजिक सुधारवादी नेता की छवि दी. उनके सक्रिय नेतृत्व के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई सरकार इन नीतियों को किस दिशा में आगे बढ़ाती है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम का असर विपक्ष की रणनीति पर भी पड़ेगा. राजद और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल अब इस मुद्दे को लेकर भाजपा और जदयू पर हमलावर हो सकते हैं. विपक्ष यह सवाल उठा सकता है कि क्या यह सत्ता हस्तांतरण किसी बड़े राजनीतिक समझौते का हिस्सा है. साथ ही यह भी संभव है कि विपक्ष इस बदलाव को आगामी चुनावों में बड़ा मुद्दा बनाए.
राष्ट्रीय राजनीति की दृष्टि से भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यदि नीतीश कुमार राज्यसभा के माध्यम से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो वह राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए की राजनीति में नई भूमिका निभा सकते हैं. नीतीश कुमार का अनुभव और उनका प्रशासनिक रिकॉर्ड उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली नेता बनाता है. केंद्र सरकार और एनडीए के लिए वह एक ऐसे नेता हो सकते हैं जो क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संतुलन बनाने में सक्षम हों.
इसके अलावा संसद में भी उनका अनुभव महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. नीतीश कुमार पहले भी केंद्र सरकार में रेल मंत्री और कृषि मंत्री जैसे अहम पदों पर रह चुके हैं. इसलिए यह संभावना जताई जा रही है कि भविष्य में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है. कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि वह एनडीए के भीतर समन्वय की भूमिका निभा सकते हैं, खासकर उन राज्यों में जहां क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन की जरूरत होती है.
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस घटनाक्रम से 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति पर भी असर पड़ सकता है. भाजपा पिछले कुछ वर्षों से राज्यों में अपने नेतृत्व को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. अगर बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री बनता है तो यह पार्टी के लिए एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि होगी. इससे पार्टी को आगामी चुनावों में संगठन और नेतृत्व दोनों स्तर पर मजबूती मिल सकती है.
हालांकि इसके साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आएंगी. बिहार की राजनीति लंबे समय से गठबंधन और सामाजिक समीकरणों पर आधारित रही है. ऐसे में सत्ता परिवर्तन के बाद यह जरूरी होगा कि नई सरकार सामाजिक संतुलन बनाए रखे. यदि राजनीतिक संतुलन बिगड़ता है तो विपक्ष को इसका फायदा मिल सकता है.
समग्र रूप से देखा जाए तो नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना केवल एक राजनीतिक पद परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह बिहार की राजनीति में एक युग परिवर्तन की शुरुआत माना जा रहा है. इससे राज्य में नेतृत्व का नया दौर शुरू हो सकता है और राष्ट्रीय राजनीति में भी नए समीकरण बन सकते हैं. आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि यह फैसला बिहार और देश की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

