जबलपुर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उन दो युवकों को जमानत का लाभ प्रदान किया है जिन पर इंस्टाग्राम रील के जरिए ईरान का समर्थन करने और धार्मिक नारेबाजी कर समुदायों के बीच नफरत फैलाने का आरोप लगा था. जस्टिस आर.के. चौबे की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि आरोपियों के खिलाफ कथित अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद नहीं हैं और पुलिस ने जल्दबाजी में यह प्रकरण दर्ज किया है.
याचिकाकर्ता वसीम खान और यूसुफ महफूज की ओर से दायर इस याचिका में बताया गया था कि रायसेन जिले की कोतवाली पुलिस ने एक खास विचारधारा के व्यक्ति की शिकायत पर उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1)(ए) के तहत एफआईआर दर्ज की थी और वे बीते 8 मार्च से न्यायिक अभिरक्षा में जेल में बंद थे. अभियोजन पक्ष का तर्क था कि इंस्टाग्राम पर अपलोड की गई विवादित रील में याचिकाकर्ता अन्य लोगों के साथ मिलकर ईरान के पक्ष में नारे लगा रहे थे जो समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दुश्मनी और नफरत बढ़ा सकते थे लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया.
कोर्ट ने केस डायरी का गहन अवलोकन करने के बाद अपने आदेश में कहा कि केवल रील में कहे गए शब्दों या उसके कंटेंट को धर्म, जाति, जन्म स्थान या भाषा के आधार पर अलग-अलग समूहों के बीच वैमनस्य पैदा करने वाला नहीं माना जा सकता है. अदालत ने वैश्विक परिदृश्य का हवाला देते हुए एक बड़ी टिप्पणी की कि ईरान हाल के समय में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संघर्ष की स्थिति का सामना कर रहा है और ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता यदि ईरान के पक्ष में और उसके विरोधी देश के खिलाफ कुछ कहते दिख रहे हैं तो इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. जस्टिस आर.के. चौबे ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस ने बिना पर्याप्त साक्ष्यों के ही याचिकाकर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है जबकि रील की सामग्री प्रथम दृष्टया नफरत फैलाने वाली नहीं है.
अदालत में सुनवाई के दौरान शासन की ओर से जमानत याचिका का पुरजोर विरोध किया गया और दलील दी गई कि आरोपियों ने आपत्तिजनक सामग्री सोशल मीडिया पर साझा की है जिसकी जांच अभी जारी है और भविष्य में और भी साक्ष्य मिल सकते हैं. हालांकि एकलपीठ ने बचाव पक्ष के तर्कों से सहमति जताई कि शिकायतकर्ता की निजी मान्यताओं के आधार पर किसी को जेल में नहीं रखा जा सकता जब तक कि कानून का स्पष्ट उल्लंघन न दिखे. हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद दोनों याचिकाकर्ताओं की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है जो लगभग सवा महीने से जेल में थे. यह आदेश सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी और पुलिस द्वारा की जाने वाली त्वरित कार्यवाहियों के बीच संतुलन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर किसी देश विशेष का समर्थन करना या विरोध करना तब तक अपराध नहीं है जब तक वह देश के भीतर आंतरिक सुरक्षा या सांप्रदायिक सद्भाव को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित न करे. रायसेन पुलिस के लिए यह आदेश एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि कोर्ट ने सीधे तौर पर सबूतों की कमी की बात कही है. फिलहाल इस आदेश के बाद क्षेत्र में कानूनी और सामाजिक गलियारों में बहस छिड़ गई है कि सोशल मीडिया कंटेंट पर एफआईआर दर्ज करने से पहले पुलिस को किन मापदंडों का पालन करना चाहिए.
याचिकाकर्ताओं के परिजनों ने कोर्ट के इस न्यायपूर्ण निर्णय पर संतोष व्यक्त किया है और इसे सत्य की जीत बताया है. अब देखना होगा कि शासन इस आदेश के खिलाफ आगे अपील करता है या पुलिस जांच को नए सिरे से आगे बढ़ाती है लेकिन वर्तमान में हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने अभिव्यक्ति और कानून की व्याख्या को एक नई दिशा प्रदान की है. इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर है और बिना ठोस आधार के किसी की स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जा सकता है. अब जेल प्रशासन को आदेश की प्रति मिलने के बाद दोनों युवकों की औपचारिक रिहाई की प्रक्रिया पूरी की जाएगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

