लंदन यात्रा विवाद में जबलपुर के डॉक्टरों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, 15 साल पुराना मामला खत्म

लंदन यात्रा विवाद में जबलपुर के डॉक्टरों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत, 15 साल पुराना मामला खत्म

प्रेषित समय :19:53:22 PM / Fri, Apr 17th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. लंबे समय से चल रहे लंदन यात्रा विवाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए डॉक्टरों को बड़ी राहत प्रदान की है। न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकलपीठ ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा जारी निलंबन आदेश को निरस्त करते हुए डॉक्टर हर्ष सक्सेना और डॉक्टर आलोक अग्रवाल सहित अन्य चिकित्सकों के खिलाफ की गई कार्रवाई को अवैध करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि बिना ठोस साक्ष्यों के केवल अनुमानों के आधार पर की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती।

यह मामला वर्ष 2012 में हुई एक विदेश यात्रा से जुड़ा है, जब डॉक्टरों के एक समूह के लंदन दौरे को लेकर यह आरोप लगाया गया था कि इस यात्रा का खर्च फार्मा कंपनियों द्वारा वहन किया गया। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की एथिक्स कमेटी ने इसे मेडिकल नियमों का उल्लंघन मानते हुए 18 फरवरी 2015 को आदेश जारी कर संबंधित डॉक्टरों को राज्य मेडिकल रजिस्टर से छह महीने के लिए निलंबित करने के निर्देश दिए थे। इस आदेश के खिलाफ डॉक्टरों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर तत्काल रोक लगा दी गई थी और मामला सुनवाई के लिए लंबित रहा।

सुनवाई के दौरान डॉक्टर हर्ष सक्सेना ने अपने पक्ष में महत्वपूर्ण दस्तावेज पेश किए। उन्होंने बैंक लेनदेन और भुगतान की रसीदें प्रस्तुत कर अदालत को बताया कि यात्रा का पूरा खर्च उन्होंने स्वयं वहन किया था। दस्तावेजों से यह भी स्पष्ट किया गया कि जिन रकमों को फार्मा कंपनियों द्वारा भुगतान बताया जा रहा था, वह राशि बाद में वापस कर दी गई थी। अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि ऐसा कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि यात्रा वास्तव में प्रायोजित थी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी अर्द्ध न्यायिक संस्था के आदेश में ठोस कारणों और स्पष्ट साक्ष्यों का होना अनिवार्य है। केवल संभावनाओं और अटकलों के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। न्यायालय ने माना कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का निर्णय इन सिद्धांतों का पालन नहीं करता और इसी कारण इसे निरस्त किया जाना उचित है।

करीब 15 वर्षों तक चले इस मामले में आए इस फैसले को चिकित्सकों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। इस निर्णय ने न केवल संबंधित डॉक्टरों को न्याय दिलाया है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी पेशेवर के खिलाफ कार्रवाई करते समय पारदर्शिता और साक्ष्यों की मजबूती बेहद आवश्यक है। इस फैसले के बाद चिकित्सा क्षेत्र में जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश गया है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-