पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की सैन्य रहस्यों से भरी नई किताब द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड का मास्टर स्ट्रोक

पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की सैन्य रहस्यों से भरी नई किताब द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड का मास्टर स्ट्रोक

प्रेषित समय :22:41:36 PM / Wed, Apr 22nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने अपनी नई किताब 'द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड' के माध्यम से साहित्य और रक्षा जगत में एक ऐसी वापसी की है जो न केवल उनके लेखन कौशल को दर्शाती है बल्कि उनके रणनीतिक कौशल का भी प्रमाण है. यह पुस्तक एक ऐसे नाजुक समय पर सामने आई है जब उनकी पिछली अप्रकाशित कृति 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' को लेकर देश की संसद से लेकर गलियारों तक में भारी राजनीतिक घमासान मच चुका है. एक समीक्षा के तौर पर देखा जाए तो जनरल नरवणे ने अपनी इस नई गैर-काल्पनिक रचना के जरिए बहुत ही चतुराई और शालीनता से खुद को उन राजनीतिक संवेदनशीलताओं से दूर कर लिया है जिन्होंने उनके पिछले संस्मरण को विवादों के भंवर में डाल दिया था. जहां उनका पिछला कार्य गलवान घाटी संघर्ष और नीतिगत फैसलों जैसे भारी-भरकम विषयों पर केंद्रित था वहीं यह नई किताब भारतीय सशस्त्र बलों के उन अनछुए और विचित्र पहलुओं को कुरेदती है जिन्हें अक्सर इतिहास की मुख्यधारा की किताबों में जगह नहीं मिल पाती. यह बदलाव केवल विषयों का नहीं है बल्कि एक जनरल की उस सोच का भी है जो विवादों के बजाय सेना की गौरवशाली संस्कृति और उसकी जड़ों को दुनिया के सामने लाना चाहता है.

किताब की सबसे बड़ी खूबी इसका 'इनसाइडर पर्सपेक्टिव' है जो पाठकों को सीधे सेना की मेस, बैरकों और उन किंवदंतियों के बीच ले जाता है जिन्हें अब तक केवल वर्दी पहनने वाले ही जानते थे. जनरल नरवणे ने इसमें थल सेना, नौसेना और वायु सेना की उन लोककथाओं और परंपराओं को पिरोया है जो सैन्य जीवन को एक अलग रंग देती हैं. पुस्तक की समीक्षा करते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि लेखक ने जानबूझकर एक 'लाइट और एक्सप्लोरेटरी' दृष्टिकोण अपनाया है ताकि पाठक बिना किसी भारी बोझ के भारतीय सेना की विविधता का आनंद ले सकें. इसमें कैप्टन बाबा हरभजन सिंह जैसे उन किरदारों का जिक्र है जो सैन्य लोककथाओं में एक अमर आत्मा के रूप में पूजे जाते हैं और जिनके लिए आज भी सीमा पर विशेष व्यवस्था की जाती है. इस तरह के किस्से न केवल जिज्ञासा पैदा करते हैं बल्कि सेना के प्रति एक गहरा सम्मान भी जगाते हैं. नरवणे ने अपनी कलम से उन छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण परंपराओं को जीवंत किया है जो किसी भी रेजिमेंट की पहचान होती हैं.

तकनीकी और ऐतिहासिक रूप से भी यह किताब अत्यंत समृद्ध है. लेखक ने 1944 की कोहिमा की लड़ाई जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भों को बहुत ही मानवीय अंदाज में पेश किया है. इसमें 'बदलूराम का बदन' जैसे प्रसिद्ध सैन्य गीतों की उत्पत्ति और उनके पीछे छिपे बलिदान की कहानी को जिस तरह से बयां किया गया है वह पाठकों को भावुक कर देता है. इसके अलावा 17वीं और 18वीं शताब्दी की सिख सेना के गौरवशाली अतीत से लेकर 'चक दे फट्टे' जैसे युद्धघोषों के सफर को समझना किसी भी इतिहास प्रेमी के लिए एक रोमांचक अनुभव है. जनरल नरवणे ने केवल युद्ध की रणनीतियों पर बात न करते हुए यह भी बताया है कि कैसे बेंगलुरु जैसे शहर का नाम प्रथम विश्व युद्ध के दौरान एक गेम-चेंजर हथियार से जुड़ गया. वायुसेना के पायलटों के खास 'कॉल साइन' और यहां तक कि सेना के वफादार खच्चरों (Pedongi) के साहस के किस्से इस किताब को एक मुकम्मल और बेहद दिलचस्प दस्तावेज बनाते हैं.

समीक्षा के नजरिए से देखा जाए तो जनरल नरवणे की लेखन शैली में एक स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है. पहले जहां वे नीति-निर्धारण और विवादित सैन्य रिपोर्टों के लिए जाने जाते थे वहीं अब वे एक कुशल कहानीकार के रूप में उभरकर सामने आए हैं. उन्होंने पहले भी 'द कैंटोनमेंट कॉन्स्पिरेसी' जैसे थ्रिलर उपन्यास के जरिए फिक्शन में हाथ आजमाया था लेकिन 'द क्यूरियस एंड द क्लासिफाइड' में वे वापस नॉन-फिक्शन की जमीन पर खड़े हैं. उनकी यह कृति किसी भी प्रकार की सरकारी मंजूरी की बाधाओं या गोपनीयता के उल्लंघन के आरोपों से पूरी तरह मुक्त नजर आती है क्योंकि इसमें किसी संवेदनशील सुरक्षा रणनीति के बजाय सेना की विरासत और मानवीय पक्ष को केंद्र में रखा गया है. यह किताब उन लोगों के लिए एक सटीक जवाब है जो यह मान रहे थे कि पिछले विवाद के बाद जनरल नरवणे की कलम शायद खामोश हो जाएगी. इसके विपरीत उन्होंने एक ऐसी किताब पेश की है जो विवादों की जगह जिज्ञासा और सम्मान को बढ़ावा देती है.

अंत में यह कहना उचित होगा कि जनरल एमएम नरवणे की यह नई पुस्तक भारतीय सैन्य साहित्य में एक नई जान फूंकने का काम करेगी. यह पुस्तक केवल रक्षा विशेषज्ञों के लिए नहीं बल्कि हर उस नागरिक के लिए है जो अपनी सेना के असली चरित्र को समझना चाहता है. प्रकाशक रूपा पब्लिकेशंस ने भी इसे एक ऐसी 'पेज-टर्नर' किताब बताया है जो सतह की सच्चाई से आगे बढ़कर गहरे राज खोलती है. पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक द्वारा इस पुस्तक की सराहना किया जाना इसकी बौद्धिक और तथ्यात्मक गहराई को और अधिक वजन देता है. विवादों के साये से बाहर निकलकर जनरल नरवणे ने अपनी इस नई साहित्यिक पारी के जरिए यह साबित कर दिया है कि एक अनुभवी सैनिक न केवल सीमा की रक्षा करना जानता है बल्कि वह अपनी सेना की स्मृतियों और संस्कृति को शब्दों के जरिए अमर करना भी जानता है. यह पुस्तक आने वाले समय में सैन्य पुस्तकालयों और जिज्ञासु पाठकों के बीच एक अनिवार्य संग्रह के रूप में पहचानी जाएगी जो बिना किसी राजनीतिक शोर के भारतीय सेना के गौरव का गान करती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-