जबलपुर. नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल ने चिकित्सा जगत में एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जो न केवल महाकौशल बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के लिए एक मील का पत्थर साबित हो रही है. अस्पताल के विशेषज्ञों की टीम ने कैंसर के कारण अपना स्तन खो चुकी एक 45 वर्षीय महिला के शरीर में पेट की चर्बी का उपयोग करके पुनः स्तन का निर्माण (ब्रेस्ट रिकंस्ट्रक्शन) करने में बड़ी सफलता प्राप्त की है. प्रदेश के किसी भी सरकारी अस्पताल में इस तरह की जटिल और अनूठी सर्जरी का यह पहला मामला है. मेडिकल साइंस के इस करिश्मे ने न केवल कैंसर से जूझ रही महिलाओं के लिए आत्मविश्वास के नए द्वार खोल दिए हैं, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थान अब अत्याधुनिक तकनीक और शोध के मामले में निजी अस्पतालों को पीछे छोड़ने की क्षमता रखते हैं.
इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत ब्रेस्ट कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. संजय यादव के नेतृत्व में हुई. डॉ. यादव बताते हैं कि भारत में ब्रेस्ट कैंसर के अधिकांश मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं जब बीमारी अंतिम चरण में होती है. ऐसी स्थिति में, कैंसर के प्रसार को रोकने के लिए पूरे स्तन को हटाना मजबूरी बन जाता है. स्तन का अंग कट जाने के बाद महिला न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर भी टूट जाती है, जिससे उसका आत्मविश्वास बुरी तरह प्रभावित होता है. अब तक ऐसी महिलाओं के पास इम्प्लांट लगवाने का विकल्प होता था, लेकिन वह अत्यंत महंगा होने के कारण हर मरीज की पहुंच से बाहर होता है. इसी चुनौती को देखते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने मरीज को कम से कम तकलीफ और बिना किसी कृत्रिम महंगे इम्प्लांट के पुनर्वास देने का निर्णय लिया.
इस बेहद जटिल ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए एक विशेष टीम का गठन किया गया, जिसमें ब्रेस्ट कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. संजय यादव के साथ प्लास्टिक सर्जरी विशेषज्ञ डॉ. पवन अग्रवाल, डॉ. प्रशांत, डॉ. राजीव कुकरेले, डॉ. आशुतोष, डॉ. बघेल, डॉ. प्रदीप, डॉ. विनीत और डॉ. आशीष सेठी शामिल थे. डॉ. पवन अग्रवाल ने बताया कि इस सर्जरी में महिला के शरीर के ही निचले हिस्से की चर्बी (फैट टिश्यू) और त्वचा को काटकर उसका उपयोग स्तन के निर्माण के लिए किया गया. इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें एंडोस्कोपी और दूरबीन पद्धति का उपयोग किया गया, जिससे मरीज को बहुत कम चीर-फाड़ झेलनी पड़ी और घाव भरने की प्रक्रिया भी अत्यंत तीव्र होगी. डॉक्टरों की टीम ने लगातार छह घंटे तक चले इस ऑपरेशन के दौरान शरीर के अंगों को स्थानांतरित कर उन्हें ब्रेस्ट वाले स्थान पर व्यवस्थित किया.
डॉ. अग्रवाल के अनुसार, यह विधि ब्रेस्ट रिकंस्ट्रक्शन का सबसे सटीक और प्राकृतिक तरीका है. चूंकि इसमें मरीज के अपने ही ऊतकों का उपयोग किया गया है, इसलिए शरीर द्वारा इन्हें अस्वीकार करने की संभावना शून्य हो जाती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की सर्जरी के कई उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन भारत में ब्रेस्ट कैंसर का इलाज करने वाले सामान्य चिकित्सकों के बीच इस तकनीक की जानकारी का अभाव है. डॉ. संजय यादव ने स्पष्ट किया कि यह सर्जरी आर्थिक रूप से भी बेहद सुलभ है, क्योंकि इसमें बाहर से किसी भी महंगे कृत्रिम उपकरण की आवश्यकता नहीं होती. हालांकि, इस प्रक्रिया में समय अधिक लगता है और विशेषज्ञता की अत्यधिक आवश्यकता होती है, जिसके लिए जबलपुर के इस मेडिकल कॉलेज में पूरी तैयारी और संसाधन मौजूद हैं.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल न केवल इलाज के लिए बल्कि अपने शोध और नवाचार के लिए भी ख्याति प्राप्त कर रहा है. यहाँ के डॉक्टर न केवल मरीजों को अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं, बल्कि नियमित रूप से अपने शोध पत्र अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत कर रहे हैं और पेटेंट भी हासिल कर रहे हैं. इस सफल ऑपरेशन के बाद अस्पताल प्रशासन ने आगे की रणनीति भी तैयार कर ली है. डॉ. संजय यादव ने बताया कि यह एक बेहद सफल प्रयोग रहा है और अब अस्पताल में नियमित रूप से ब्रेस्ट रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी करने की योजना है. अगले सप्ताह भी इसी तरह का एक और जटिल ऑपरेशन तय किया गया है, जिससे कई अन्य जरूरतमंद महिलाओं को नई जीवन दिशा मिल सकेगी.
यह उपलब्धि इसलिए भी मायने रखती है क्योंकि जबलपुर का यह मेडिकल कॉलेज न केवल महाकौशल क्षेत्र के लोगों के लिए, बल्कि विंध्य क्षेत्र के लाखों मरीजों के लिए भी मुख्य आधार है. यहाँ एक साथ 250 छात्र एमबीबीएस की पढ़ाई करते हैं, जो भविष्य के ऐसे चिकित्सक तैयार कर रहे हैं जो चिकित्सा में मानवता और आधुनिक तकनीक का मेल बिठाना जानते हैं. कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को हराकर वापस लौट रही महिलाओं के लिए यह सर्जरी किसी वरदान से कम नहीं है. अब महिलाएँ कैंसर से मुक्त होने के बाद एक पूर्ण और आत्मसम्मान पूर्ण जीवन जी सकेंगी. इस अनूठी सर्जरी के बाद प्रदेश के अन्य सरकारी अस्पतालों के लिए भी यह एक नई मिसाल बन गई है कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो संसाधनों के सीमित दायरे में भी विश्वस्तरीय चिकित्सा चमत्कार किए जा सकते हैं. चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इस पूरी प्रक्रिया को भारतीय सरकारी चिकित्सा प्रणाली में एक नई क्रांति के रूप में देख रहे हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

