जबलपुर. मध्य प्रदेश में 15 अप्रैल 2026 को घोषित 10वीं-12वीं बोर्ड परीक्षा परिणाम के बीच एक सरकारी स्कूल का चौंकाने वाला रिजल्ट सामने आया है, जिसने पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. जबलपुर संभाग के छिंदवाड़ा जिले के एक सरकारी स्कूल में 10 छात्रों को पढ़ाने के लिए प्रिंसिपल समेत कुल 8 शिक्षक तैनात थे, लेकिन इसके बावजूद 10वीं कक्षा में केवल एक छात्र ही पास हो सका. इस परिणाम ने न केवल अभिभावकों बल्कि शिक्षा विभाग को भी हैरान कर दिया है और सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर बहस तेज कर दी है.जबलपुर संभाग में सामने आए इस चौंकाने वाले परिणाम ने केवल स्कूल स्तर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं. जिला शिक्षा अधिकारियों के साथ-साथ संभाग स्तर पर पदस्थ संयुक्त संचालक की भूमिका पर भी अब गंभीर चर्चा शुरू हो गई है.शिक्षकों की कमी नहीं होने के बावजूद परिणाम बेहद खराब रहना निगरानी और शैक्षणिक प्रबंधन की कमजोरियों को उजागर करता है.
जानकारी के अनुसार, छिंदवाड़ा कलेक्टर कार्यालय के समीप संचालित जवाहर कन्या स्कूल में 10वीं कक्षा में कुल 10 छात्र-छात्राएं नामांकित थे. इन विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए अलग-अलग विषयों के 6 शिक्षक, एक प्रिंसिपल और एक लैब टेक्नीशियन तैनात थे. यानी लगभग हर एक-दो छात्र पर एक शिक्षक की उपलब्धता थी, जो किसी भी स्कूल के लिए आदर्श स्थिति मानी जाती है. इसके बावजूद जब परीक्षा परिणाम घोषित हुआ, तो केवल एक छात्र ही उत्तीर्ण पाया गया, वह भी सेकेंड डिवीजन में. इस तरह स्कूल का कुल परिणाम मात्र 10 प्रतिशत दर्ज किया गया.
इस अप्रत्याशित परिणाम ने स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है. आमतौर पर यह माना जाता है कि शिक्षक-छात्र अनुपात जितना बेहतर होगा, परिणाम उतने ही अच्छे होंगे, लेकिन यहां स्थिति बिल्कुल उलट नजर आई. सवाल उठने लगे हैं कि जब संसाधन और स्टाफ पर्याप्त थे, तो फिर पढ़ाई का स्तर इतना कमजोर क्यों रहा.
स्कूल के प्राचार्य दिनेश भट्ट ने इस खराब परिणाम के पीछे शिक्षकों की अन्य प्रशासनिक ड्यूटी को जिम्मेदार ठहराया है. उनका कहना है कि जिस समय विद्यार्थियों की तैयारी का महत्वपूर्ण दौर चल रहा था, उसी दौरान शिक्षकों को एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन सर्वे में लगा दिया गया. इस कारण शिक्षक नियमित रूप से स्कूल नहीं आ पाए और पढ़ाई प्रभावित हुई. उन्होंने यह भी बताया कि स्वयं उनकी ड्यूटी भी इसी सर्वे में लगी थी और इसी दौरान वे बीमार पड़ गए, जिसके चलते उनका ऑपरेशन भी हुआ. उन्होंने स्वीकार किया कि यह परिणाम निराशाजनक है और इसकी जिम्मेदारी से वे पीछे नहीं हट रहे.
वहीं जिला शिक्षा अधिकारी गोपाल सिंह बघेल ने कहा कि जिले के अधिकांश सरकारी स्कूलों का परिणाम अच्छा रहा है और कई मामलों में निजी स्कूलों से भी बेहतर प्रदर्शन देखने को मिला है. हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ स्कूलों का परिणाम उम्मीद से काफी खराब रहा है, जिनमें यह स्कूल भी शामिल है. ऐसे मामलों में संबंधित शिक्षकों और स्टाफ को नोटिस जारी कर जवाब मांगा जा रहा है और जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.
आंकड़ों के अनुसार, जिले में इस वर्ष हाईस्कूल परीक्षा में कुल 23,775 परीक्षार्थी शामिल हुए थे, जिनमें से 18,770 छात्र-छात्राएं उत्तीर्ण घोषित किए गए. इस तरह जिले का कुल परीक्षा परिणाम लगभग 79 प्रतिशत रहा. इसमें सरकारी स्कूलों का परिणाम 85.43 प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि निजी स्कूलों का परिणाम 70.43 प्रतिशत रहा. इसके अलावा इस वर्ष भी छात्राओं ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए छात्रों से आगे निकलने का क्रम जारी रखा. छात्राओं का पास प्रतिशत 83.5 रहा, जबकि छात्रों का 73.8 प्रतिशत दर्ज किया गया.
हालांकि समग्र आंकड़े बेहतर तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन छिंदवाड़ा के इस स्कूल का परिणाम शिक्षा व्यवस्था में मौजूद खामियों की ओर इशारा करता है. विशेषज्ञों का मानना है कि केवल शिक्षक संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी नियमित उपस्थिति, पढ़ाई की गुणवत्ता और छात्रों की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है. साथ ही, शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में अत्यधिक व्यस्त रखना भी छात्रों की पढ़ाई को प्रभावित करता है.
इस बीच फेल हुए छात्रों के लिए राहत की खबर भी है. मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल ने इस वर्ष सप्लीमेंट्री परीक्षा की पारंपरिक व्यवस्था समाप्त कर दी है और इसकी जगह सेकेंड में एग्जाम की व्यवस्था लागू की है. इसके तहत छात्र दोबारा परीक्षा देकर पास हो सकते हैं, वहीं पास छात्र भी अपने अंक सुधारने के लिए इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं. यह परीक्षा 7 मई 2026 से शुरू होगी, जिसके लिए छात्र ऑनलाइन या अपने स्कूल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं.
इसके अलावा मध्य प्रदेश सरकार की ‘रुक जाना नहीं’ योजना भी ऐसे छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण सहारा है, जो किसी कारणवश परीक्षा में असफल हो जाते हैं. इस योजना के तहत छात्र मध्य प्रदेश राज्य ओपन स्कूल के माध्यम से उन विषयों की दोबारा परीक्षा दे सकते हैं, जिनमें वे फेल हुए हैं. खास बात यह है कि इस योजना के अंतर्गत वर्ष में एक से अधिक बार परीक्षा आयोजित की जाती है, जिससे छात्रों को जल्द ही दूसरा मौका मिल जाता है और उनका शैक्षणिक वर्ष भी खराब नहीं होता.
जबलपुर संभाग के इस स्कूल का परिणाम केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए केवल संसाधन पर्याप्त नहीं हैं. जरूरत है बेहतर प्रबंधन, जवाबदेही और शिक्षकों की प्राथमिकता तय करने की, ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल बनाया जा सके.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

