जबलपुर.जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में मौजूद औषधीय पौधों को लेकर आयुर्वेदिक विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों ने बड़ा दावा किया है कि कुछ विशेष पेड़-पौधे मधुमेह को नियंत्रित ही नहीं बल्कि लंबे समय में ठीक करने की क्षमता भी रखते हैं। हालांकि यह दावा आधुनिक चिकित्सा पद्धति से अलग है, लेकिन इसने स्वास्थ्य जगत में नई बहस छेड़ दी है।
भारत में प्राचीन काल से ही जड़ी-बूटियों और पेड़-पौधों के माध्यम से इलाज की परंपरा रही है, जिसे आज आयुर्वेद के रूप में जाना जाता है। वर्तमान समय में बदलती जीवनशैली, खानपान और तनाव के कारण डायबिटीज के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार दुनिया भर में करोड़ों लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं और भारत में भी इसकी संख्या चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है। ऐसे में जबलपुर से आई यह खबर खास महत्व रखती है।
कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार यहां देश की सबसे बड़ी औषधीय पौधों की नर्सरी विकसित की गई है, जहां करीब 1100 प्रकार की जड़ी-बूटियां संरक्षित की गई हैं। इन पौधों में कई ऐसे भी हैं जिनका उपयोग पारंपरिक रूप से मधुमेह को नियंत्रित करने के लिए किया जाता रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन पौधों पर लंबे समय से अध्ययन किया जा रहा है और इनके उपयोग से सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं।
सबसे ज्यादा चर्चा जिस पौधे की हो रही है, वह है कॉस्टस इग्नियस, जिसे आम भाषा में इंसुलिन प्लांट कहा जाता है। यह पौधा देखने में साधारण होता है, लेकिन इसके बारे में दावा किया जा रहा है कि इसकी पत्तियों का सेवन करने से खून में शुगर का स्तर नियंत्रित रहता है। इसकी पत्तियां अदरक के पत्तों जैसी दिखती हैं और यह पौधा मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। हालांकि वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह पौधा सीधे इंसुलिन नहीं बनाता, बल्कि शरीर में ग्लूकोज के स्तर को संतुलित करने में मदद करता है।
इसी तरह विजयसार या बीजासार नामक पेड़ भी चर्चा में है। आयुर्वेदिक चिकित्सकों के अनुसार इस पेड़ की लकड़ी से बने बर्तन में पानी पीने से शुगर लेवल नियंत्रित रहता है। बताया जा रहा है कि यह तरीका लंबे समय से ग्रामीण क्षेत्रों में अपनाया जाता रहा है। हालांकि इसके कारण इस पेड़ की कटाई भी बढ़ गई है, जिससे पर्यावरणीय चिंता भी सामने आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके संरक्षण पर ध्यान देना जरूरी है।
गुड़मार नामक औषधीय पौधा भी डायबिटीज नियंत्रण में उपयोगी बताया जा रहा है। आयुर्वेद में इसका उपयोग काफी समय से किया जा रहा है और यह बाजार में दवाओं के रूप में भी उपलब्ध है। कहा जाता है कि इसका सेवन करने से मीठे के प्रति आकर्षण कम होता है और शुगर लेवल नियंत्रित रहता है। इसके अलावा गिलोय, जो आमतौर पर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए जानी जाती है, उसे भी मधुमेह नियंत्रण में सहायक माना जा रहा है।
एक अन्य पौधा जिम्नेथियम भी चर्चा में है, जिसे भी इंसुलिन प्लांट की श्रेणी में रखा जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पौधा शरीर के लीवर को मजबूत करता है, जिससे ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है और शुगर लेवल नियंत्रित रहता है। हालांकि यह पौधा मूल रूप से भारत का नहीं है, लेकिन यहां की जलवायु में भी इसे सफलतापूर्वक उगाया जा रहा है।
आयुर्वेदिक चिकित्सकों का मानना है कि डायबिटीज केवल एक शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि यह जीवनशैली से जुड़ी समस्या है। उनका कहना है कि अगर पाचन तंत्र मजबूत हो और शरीर का संतुलन बना रहे तो कई बीमारियां स्वतः ठीक हो सकती हैं। इसी सिद्धांत के आधार पर आयुर्वेद में उपचार किया जाता है, जिसमें दवाओं के साथ-साथ खानपान, दिनचर्या और मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिया जाता है।
दूसरी ओर आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति डायबिटीज को एक क्रॉनिक बीमारी मानती है, जिसका स्थाई इलाज फिलहाल संभव नहीं है। इसमें मरीज को जीवनभर दवाइयों या इंसुलिन के सहारे शुगर को नियंत्रित रखना पड़ता है। यही कारण है कि आयुर्वेदिक दावों ने एक नई चर्चा को जन्म दिया है कि क्या वास्तव में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां इस बीमारी का स्थाई समाधान दे सकती हैं।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि किसी भी उपचार पद्धति को अपनाने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। कई मामलों में आयुर्वेद और एलोपैथी का संयोजन बेहतर परिणाम दे सकता है। खासकर उन मरीजों के लिए जिनमें डायबिटीज आनुवंशिक कारणों से होती है, उनके लिए संतुलित इलाज की जरूरत होती है।
इस पूरी चर्चा के बीच एक बात साफ है कि डायबिटीज का संबंध सीधे तौर पर जीवनशैली से है। अगर खानपान संतुलित हो, नियमित व्यायाम किया जाए, तनाव कम रखा जाए और पर्याप्त नींद ली जाए तो इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जबलपुर के कृषि विश्वविद्यालय में चल रहे इस शोध और दावों ने निश्चित रूप से लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है, लेकिन इसके साथ ही वैज्ञानिक प्रमाण और विस्तृत अध्ययन भी उतने ही जरूरी हैं।
फिलहाल यह खबर लोगों के बीच तेजी से फैल रही है और सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर काफी चर्चा हो रही है। कई लोग इसे आयुर्वेद की बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं तो कुछ लोग इसे जांच और प्रमाण की कसौटी पर परखने की बात कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन दावों पर कितनी वैज्ञानिक मुहर लगती है और क्या वास्तव में यह डायबिटीज के मरीजों के लिए एक स्थाई समाधान साबित हो सकता है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

