गटर में उतरती इंसानियत

गटर में उतरती इंसानियत

प्रेषित समय :21:55:41 PM / Sat, May 9th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

-डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत के शहर आज दो तस्वीरों में बँटे हुए दिखाई देते हैं. एक तस्वीर चमचमाती सड़कों, स्मार्ट सिटी योजनाओं, बड़े-बड़े मॉल और स्वच्छता अभियानों की है, जबकि दूसरी तस्वीर कूड़े के ढेरों, बदबूदार नालियों, उफनते सीवरों और उनमें उतरते इंसानों की है. दुर्भाग्य यह है कि दूसरी तस्वीर को देखने से समाज अक्सर बचता है, क्योंकि वह तस्वीर केवल गंदगी की नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक चरित्र की सच्चाई भी दिखाती है. शहरों की सफाई जिन लोगों के भरोसे है, वही लोग आज भी सबसे अधिक अपमान, असुरक्षा और उपेक्षा झेल रहे हैं. यह केवल प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि उस जातिवादी मानसिकता का परिणाम है जो हजारों वर्षों से कुछ लोगों को “गंदगी साफ करने वाला” मानती आई है.

यह विडंबना ही है कि जिस समाज में सफाई को ईश्वर के बराबर बताया जाता है, उसी समाज में सफाई करने वाले इंसान को बराबरी का दर्जा नहीं मिलता. जिन हाथों से शहर साफ रहते हैं, उन्हीं हाथों को लोग अपने घरों की चौखट पर सम्मान नहीं देना चाहते. संविधान ने बराबरी का अधिकार दिया, कानूनों ने अस्पृश्यता को अपराध घोषित किया, लेकिन समाज के दिमागों में बैठी जाति की गंदगी आज भी जस की तस मौजूद है. यही कारण है कि सफाई कर्मचारी आज भी अधिकांशतः एक ही जाति विशेष से आते हैं. आधुनिक भारत का यह सबसे बड़ा सामाजिक विरोधाभास है कि चाँद पर पहुँचने वाला देश आज भी अपने ही नागरिकों को नंगे हाथों से गटर साफ करने पर मजबूर करता है.

हर वर्ष देश के अलग-अलग हिस्सों से खबर आती है कि सीवर साफ करते समय जहरीली गैस से कई सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई. कुछ देर के लिए मीडिया में चर्चा होती है, प्रशासन दुख जताता है, नेता मुआवजे की घोषणा करते हैं और फिर मामला खत्म हो जाता है. लेकिन उन परिवारों के लिए जिंदगी कभी सामान्य नहीं होती. एक मजदूर की मौत केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों, बच्चों के भविष्य और घर की रोटी का अंत होती है. सबसे दुखद बात यह है कि इन मौतों को समाज ने लगभग “सामान्य” मान लिया है. जैसे यह कोई हादसा नहीं, बल्कि उनका तयशुदा भाग्य हो.

सवाल यह है कि आखिर क्यों आज भी इंसानों को सीवर में उतरना पड़ता है? क्या तकनीक के इस दौर में मशीनें यह काम नहीं कर सकतीं? सच यह है कि मशीनें मौजूद हैं, तकनीक मौजूद है, संसाधन भी मौजूद हैं, लेकिन सफाई कर्मचारियों की जान को कभी प्राथमिकता नहीं माना गया. गरीब मजदूर की जिंदगी इस व्यवस्था के लिए सस्ती है. यही कारण है कि सुरक्षा उपकरणों के बिना लोगों को जहरीले गटरों में उतार दिया जाता है. कई बार ठेकेदार और अधिकारी जानते हैं कि यह गैरकानूनी है, फिर भी यह सब जारी रहता है, क्योंकि मरने वाला कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं होता.

यदि किसी बड़े अधिकारी, डॉक्टर या सरकारी कर्मचारी की असामयिक मृत्यु होती है, तो पूरा तंत्र सक्रिय हो जाता है. परिवार को आर्थिक सहायता दी जाती है, सरकारी नौकरी मिलती है, नेताओं के संदेश आते हैं और संवेदनाएँ प्रकट की जाती हैं. ऐसा होना चाहिए, क्योंकि हर इंसान का जीवन मूल्यवान है. लेकिन वही संवेदनशीलता तब क्यों गायब हो जाती है जब कोई सफाई कर्मचारी सीवर में दम तोड़ देता है? उसकी पत्नी और बच्चों के आँसू कम कीमती क्यों माने जाते हैं? उसकी मौत पर समाज उतना विचलित क्यों नहीं होता? इसका उत्तर केवल आर्थिक या प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक है. हमारे दिमागों में सदियों से भरी जातिवादी सोच ने सफाई कर्मचारियों की पीड़ा को “सामान्य” बना दिया है.

असल में सड़कों पर फैली गंदगी से ज्यादा खतरनाक गंदगी हमारे दिमागों में भरी हुई है. सड़क का कचरा नगर निगम उठा सकता है, लेकिन मानसिक कचरा पीढ़ियों की सोच बदलने से ही हटेगा. हमने सफाई को काम नहीं, जाति बना दिया. हमने कुछ लोगों को यह विश्वास दिलाया कि उनका जन्म ही गंदगी साफ करने के लिए हुआ है. यही सोच लोकतंत्र और मानवता दोनों के लिए सबसे बड़ा खतरा है. किसी भी सभ्य समाज में कोई पेशा जन्म से तय नहीं होता, लेकिन भारत में जाति ने इंसान की पहचान, सम्मान और रोजगार तक तय कर दिए.

विडंबना यह भी है कि “स्वच्छ भारत” जैसे अभियान चलाने वाला देश सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाया. फोटो खिंचवाने के लिए झाड़ू पकड़ना आसान है, लेकिन सीवर में उतरते इंसानों की जिंदगी बदलने के लिए गंभीर राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए. आज भी अनेक नगरपालिकाओं में सीवर सफाई का पूरा काम ठेकेदारों के भरोसे चलता है. ठेकेदार लागत बचाने के लिए सुरक्षा उपकरण नहीं देते और मजदूर मजबूरी में मौत के कुएँ में उतर जाते हैं. जब हादसा होता है तो जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल दी जाती है. किसी अधिकारी या ठेकेदार को शायद ही कभी सख्त सजा मिलती हो. यही दंडहीनता इन मौतों को जारी रखती है.

यह भी ध्यान देने योग्य है कि सफाई कर्मचारियों के साथ केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि सामाजिक अपमान भी जुड़ा हुआ है. वे शहरों की सफाई करते हैं, लेकिन अक्सर गंदी बस्तियों में रहने को मजबूर होते हैं. उनके बच्चों को स्कूलों में भेदभाव झेलना पड़ता है. कई जगह आज भी लोग उनके साथ बैठकर खाना खाने से हिचकते हैं. यह कैसा समाज है जो सफाई तो चाहता है, लेकिन सफाई करने वाले इंसान को सम्मान नहीं देना चाहता?

हमें यह समझना होगा कि सफाई कोई छोटा काम नहीं है. डॉक्टर शरीर बचाता है, शिक्षक भविष्य बनाता है और सफाई कर्मचारी समाज को बीमारियों से बचाता है. यदि एक दिन सफाई कर्मचारी काम बंद कर दें, तो शहरों का जीवन ठहर जाएगा. महामारी फैल जाएगी, बदबू और संक्रमण लोगों का जीना मुश्किल कर देंगे. फिर भी सबसे कम सम्मान और सबसे ज्यादा खतरा उसी पेशे से जुड़ा है. यह केवल सामाजिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन भी है.

समस्या का समाधान केवल भाषणों से नहीं होगा. सबसे पहले सीवर और गटर सफाई का पूर्ण मशीनीकरण जरूरी है. किसी भी इंसान को जहरीली गैसों के बीच उतरने के लिए मजबूर करना सीधा-सीधा मानवाधिकारों का उल्लंघन है. सरकारों को आधुनिक मशीनों, रोबोटिक तकनीक और सुरक्षा उपकरणों पर गंभीर निवेश करना होगा. इसके साथ ही यदि किसी सफाई कर्मचारी की मौत होती है, तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए. जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला नहीं रुकेगा.

इसके साथ ही सफाई कर्मचारियों के परिवारों को सम्मानजनक मुआवजा मिलना चाहिए. केवल कुछ लाख रुपये देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती. कम से कम एक करोड़ रुपये की सहायता, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी, बच्चों की शिक्षा और आवास की गारंटी दी जानी चाहिए. क्योंकि जिसने अपनी जान गंवाई, वह केवल मजदूर नहीं था, बल्कि समाज को स्वस्थ रखने वाली व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था.

लेकिन कानून और मुआवजा भी तब तक अधूरे रहेंगे जब तक समाज अपनी सोच नहीं बदलेगा. स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को जातिवाद के खिलाफ गंभीर जागरूकता अभियान चलाने होंगे. बच्चों को यह सिखाना होगा कि कोई काम छोटा नहीं होता और किसी इंसान की गरिमा उसके पेशे से कम नहीं होती. जब तक सफाई कर्मचारियों को बराबरी का सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक “स्वच्छ भारत” का सपना भी अधूरा रहेगा.

आज जरूरत केवल शहरों की सफाई की नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को साफ करने की है. हमें अपने भीतर झाँककर पूछना होगा कि आखिर क्यों एक सफाई कर्मचारी की मौत हमें उतना विचलित नहीं करती जितना किसी बड़े अधिकारी की मौत करती है? क्यों आज भी जाति के आधार पर काम बँटे हुए हैं? और क्यों हम आधुनिकता का दावा करते हुए भी मानसिक रूप से सदियों पीछे खड़े हैं?

किसी भी राष्ट्र की असली पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और आर्थिक विकास से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और मेहनतकश नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है. यदि आज भी सफाई कर्मचारी सीवरों में मर रहे हैं और समाज चुप है, तो यह केवल उनकी हार नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की हार है.

हमें यह स्वीकार करना होगा कि असली गंदगी कूड़े के ढेरों में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो इंसानों को जाति के आधार पर बाँटती है. जिस दिन यह मानसिक गंदगी साफ हो जाएगी, उसी दिन भारत सचमुच स्वच्छ, सभ्य और मानवीय राष्ट्र कहलाने के योग्य बनेगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-