बरगी क्रूज मौतकांड में बड़ा सवाल, बिना अनुभव वाली कृषि सर्वे कंपनी को किस नेता और अफसर के इशारे पर मिला ठेका ?

बरगी क्रूज मौतकांड में बड़ा सवाल, बिना अनुभव वाली कृषि सर्वे कंपनी को किस नेता और अफसर के इशारे पर मिला ठेका ?

प्रेषित समय :20:24:24 PM / Sun, May 10th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. बरगी जलाशय में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने अब सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि पूरे पर्यटन तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. 13 लोगों की जान लेने वाले इस हादसे की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे ऐसे खुलासे सामने आ रहे हैं जो प्रशासनिक लापरवाही से कहीं आगे जाकर संगठित संरक्षण, संदिग्ध ठेकेदारी और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की ओर इशारा कर रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल अब यही उठ रहा है कि आखिर पर्यटन और जल सुरक्षा जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र का ठेका एक ऐसी कंपनी को किसके इशारे पर दिया गया, जिसका पर्यटन, जल परिवहन या क्रूज संचालन से कोई प्रत्यक्ष अनुभव ही नहीं था.

जांच में सामने आया है कि मध्य प्रदेश पर्यटन निगम में क्रूज संचालन और उससे जुड़े कर्मचारियों की व्यवस्था भोपाल स्थित आरबी एसोसिएट ग्लोबल कनेक्ट प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के माध्यम से की जा रही थी. कंपनी का आधिकारिक प्रोफाइल और वेबसाइट देखने पर पता चलता है कि उसका मुख्य कार्यक्षेत्र कृषि सर्वे, गेहूं गुणवत्ता परीक्षण और मानव संसाधन उपलब्ध कराना है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जल पर्यटन और पर्यटक सुरक्षा जैसे संवेदनशील विभाग में इस कंपनी की एंट्री कैसे हुई. क्या पर्यटन विभाग में अनुभवी एजेंसियों की कमी थी, या फिर पर्दे के पीछे कोई ऐसा प्रभावशाली संरक्षण था जिसने नियमों और अनुभव को दरकिनार कर यह ठेका दिलवाया.

सूत्रों के मुताबिक मेकल रिसॉर्ट बरगी में कार्यरत अधिकांश कर्मचारी आउटसोर्स व्यवस्था के तहत रखे गए थे. जिस क्रूज में हादसा हुआ, उसमें तैनात कर्मचारी भी इसी कंपनी के माध्यम से नियुक्त किए गए थे. अब जांच एजेंसियां इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि क्या इन कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन, जल सुरक्षा और आपातकालीन स्थिति से निपटने का प्रशिक्षण दिया गया था या नहीं. सवाल यह भी है कि यदि कंपनी केवल मानव संसाधन सप्लाई का काम करती थी तो क्या उसने योग्य और प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध कराया था, या फिर सिर्फ कागजों में औपचारिकताएं पूरी कर दी गई थीं.

हादसे के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि आखिर भोपाल में बैठे पर्यटन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस व्यवस्था को मंजूरी कैसे दी. क्या विभागीय स्तर पर तकनीकी परीक्षण हुआ था. क्या कंपनी की पात्रता जांची गई थी. क्या सुरक्षा मानकों की समीक्षा की गई थी. या फिर पूरा सिस्टम केवल फाइलों और सिफारिशों के सहारे चल रहा था. पर्यटन विभाग के कई अधिकारियों की भूमिका अब सवालों के घेरे में है.

पर्यटन विभाग के जल क्रीड़ा प्रभारी सीडीआर राजेंद्र निगम ने यह कहकर खुद को अलग करने की कोशिश की कि ठेका किस कंपनी को दिया गया, यह उनके विभाग का विषय नहीं है. लेकिन यही बयान अब नए सवाल खड़े कर रहा है. यदि जल क्रीड़ा संचालन की जिम्मेदारी उनके विभाग के अंतर्गत थी तो फिर ठेके की गुणवत्ता, कर्मचारियों की क्षमता और सुरक्षा प्रशिक्षण की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी. क्या विभाग केवल नाम का संचालन कर रहा था और असली फैसले कहीं और लिए जा रहे थे.

पूर्व क्षेत्रीय अधिकारी संजय मल्होत्रा का बयान भी पूरे मामले को और रहस्यमय बना रहा है. उन्होंने स्वीकार किया कि पर्यटन विभाग में सैकड़ों कर्मचारी आउटसोर्स पर काम कर रहे हैं और उक्त कंपनी को ठेका मिला हुआ है, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए अधिक बोलने से इनकार कर दिया कि उनका तबादला हो चुका है. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या विभागीय अधिकारी जानबूझकर चुप्पी साध रहे हैं. क्या किसी बड़े नेटवर्क का दबाव है. क्या इस ठेके के पीछे राजनीतिक और प्रशासनिक गठजोड़ काम कर रहा था.

सबसे गंभीर बात यह है कि जिन लोगों को पर्यटकों की जान की सुरक्षा सौंपी गई थी, वे खुद कितने प्रशिक्षित थे, इसका स्पष्ट जवाब अब तक सामने नहीं आया है. हादसे के बाद बचाव कार्यों और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी कई खामियां उजागर हुईं. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक हादसे के समय घबराहट की स्थिति थी और यात्रियों को व्यवस्थित तरीके से बाहर निकालने की तैयारी नहीं दिखी. अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या क्रूज संचालन सिर्फ कमाई का जरिया बन गया था और सुरक्षा केवल कागजों में दर्ज एक औपचारिक शब्द बनकर रह गई थी.

विशेषज्ञों का कहना है कि जल पर्यटन एक अत्यंत तकनीकी और जोखिम भरा क्षेत्र है, जहां प्रशिक्षित चालक, आपदा प्रबंधन टीम, लाइफ सेविंग सिस्टम और नियमित सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य होते हैं. इसके बावजूद यदि कृषि सर्वे और मानव संसाधन सप्लाई करने वाली कंपनी को इस व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर प्रशासनिक विफलता मानी जाएगी.

अब राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह पूरा मामला केवल विभागीय गड़बड़ी है या फिर इसके पीछे किसी बड़े नेता या प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण था. विपक्षी दल भी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी जिम्मेदारी देने से पहले कंपनी की तकनीकी क्षमता क्यों नहीं जांची गई. क्या निविदा प्रक्रिया पारदर्शी थी. क्या योग्य कंपनियों को बाहर कर किसी पसंदीदा एजेंसी को फायदा पहुंचाया गया.

सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है. एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर लोग लगातार पूछ रहे हैं कि “कृषि सर्वे कंपनी को पर्यटन सुरक्षा का ठेका किसने दिया?”, “क्या भोपाल में बैठे अधिकारियों ने आंखें बंद कर फाइलें साइन की थीं?” और “13 मौतों का जिम्मेदार कौन है?”. कई यूजर्स ने इसे “सिस्टम द्वारा की गई हत्या” तक करार दिया है.

बरगी हादसे ने अब केवल एक दुर्घटना का दायरा पार कर लिया है. यह मामला सरकारी ठेकों की पारदर्शिता, विभागीय जवाबदेही और राजनीतिक संरक्षण की जांच का विषय बनता जा रहा है. लोगों की मांग है कि केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर मामले को दबाया न जाए, बल्कि उन वरिष्ठ अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों की भूमिका भी सार्वजनिक की जाए जिन्होंने अनुभवहीन व्यवस्था को संवेदनशील पर्यटन गतिविधि की जिम्मेदारी सौंपी.

जबलपुर से लेकर भोपाल तक अब सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि आखिर 13 जिंदगियों की कीमत पर किसका खेल चल रहा था, और क्या इस मौतकांड के असली चेहरे कभी सामने आ पाएंगे.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-