स्त्री विमर्श की नई चेतना 'अग्निगर्भ में जलती पंखुरियाँ' पर हुआ गंभीर साहित्यिक मंथन

स्त्री विमर्श की नई चेतना

प्रेषित समय :21:31:58 PM / Wed, May 13th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भोपाल. मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल मंगलवार को एक महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन की साक्षी बनी, जहां साहित्य, संवेदना और सामाजिक सरोकारों का अद्भुत संगम देखने को मिला. शहर के प्रतिष्ठित दुष्यंत कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय में आशा पारस फॉर पीस एंड हारमनी फाउंडेशन, भारत द्वारा वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. वीणा सिन्हा के चर्चित उपन्यास “अग्निगर्भ में जलती पंखुरियाँ” पर केंद्रित पुस्तक चर्चा एवं लोकार्पण समारोह का भव्य आयोजन किया गया. कार्यक्रम में साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और समाज सेवा से जुड़े अनेक विद्वानों, साहित्यकारों, शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों की सक्रिय भागीदारी रही.

12 मई 2026 को आयोजित इस समारोह की सबसे विशेष बात यह रही कि उपन्यास में निहित सामाजिक और ऐतिहासिक 21 महत्वपूर्ण मुद्दों को केंद्र में रखकर विस्तृत विमर्श किया गया. इस अभिनव प्रयोग की परिकल्पना कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. आशा शुक्ला ने की थी. उन्होंने उपन्यास की गहराई में जाकर उन 21 प्रश्नों और मुद्दों की पहचान की, जो स्त्री अस्मिता, सामाजिक संघर्ष, मानवीय संवेदनाओं और बदलते सामाजिक परिवेश को नई दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं. साहित्यिक जगत में इस प्रयास को एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल माना जा रहा है.

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ. इसके बाद पूरा सभागार साहित्यिक गरिमा और वैचारिक संवाद से सराबोर हो उठा. अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि समाज को दिशा देने वाली शक्ति है. उन्होंने कहा कि “अग्निगर्भ में जलती पंखुरियाँ” जैसी कृतियां समाज के उन पक्षों को सामने लाती हैं, जिन पर अक्सर पर्याप्त चर्चा नहीं हो पाती. उन्होंने डॉ. वीणा सिन्हा की रचनात्मक प्रतिबद्धता की सराहना करते हुए कहा कि उपन्यास से जुड़े 21 गंभीर मुद्दों पर अलग-अलग आलेख तैयार कर विमर्श का हिस्सा बनाना अत्यंत महत्वपूर्ण और शोधपरक कार्य है.

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. प्रभुदयाल मिश्र ने भारतीय साहित्यिक परंपरा और सामाजिक मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह कृति वर्तमान समाज के यथार्थ को अत्यंत संवेदनशीलता और ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करती है. सारस्वत अतिथि साधना बलबते ने कहा कि साहित्य समाज की चेतना का संवाहक है और डॉ. वीणा सिन्हा का लेखन स्त्री जीवन की उन परतों को सामने लाता है जिन्हें अक्सर सामाजिक संरचनाओं में दबा दिया जाता है.

कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए प्रो. आर. के. शुक्ला ने संस्था के उद्देश्यों और साहित्यिक आयोजनों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि साहित्य समाज में मानवीय मूल्यों और संवेदनशीलता को जीवित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है. उपन्यासकार डॉ. वीणा सिन्हा ने अपने संबोधन में पुस्तक की रचना-प्रक्रिया और उसके भावबोध पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने कहा कि यह उपन्यास स्त्री जीवन की अग्निपरीक्षाओं, संघर्षों और आत्मसम्मान की कथा है.

प्रख्यात लेखिका अपर्णा पात्रीकर ने उपन्यास की भाषा और भावभूमि की सराहना करते हुए कहा कि यह रचना पाठकों को भीतर तक झकझोरती है. वहीं करुणा राजुरकर, कुमार सुरेश, रामाश्रय रत्नेश और कुमकुम गुप्ता ने भी अपने विचार रखते हुए इसे समकालीन हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण कृति बताया.

कार्यक्रम में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे ने कहा कि ऐसे गंभीर साहित्यिक आयोजन भोपाल की सांस्कृतिक परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं. समारोह का एक महत्वपूर्ण पक्ष उन 21 योगदानकर्ताओं का सम्मान रहा, जिन्होंने इस कृति से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने बौद्धिक आलेखों के माध्यम से सहयोग दिया.

कार्यक्रम के अंत में संस्था की ओर से डॉ. वीणा सिन्हा का विशेष सम्मान किया गया. कार्यक्रम का संचालन विशाखा राजुरकर ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन लव चावडीकर द्वारा प्रस्तुत किया गया. उपस्थित साहित्य प्रेमियों ने इस आयोजन को साहित्य, संवेदना और सामाजिक चेतना का सशक्त संगम बताते हुए इसकी मुक्त कंठ से सराहना की.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-