नई दिल्ली. दुनिया की सबसे ऊंची चोटी Mount Everest एक बार फिर अपनी भयावह सच्चाई के कारण चर्चा में है. समुद्र तल से 8,849 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह पर्वत जितना रोमांच और गौरव का प्रतीक माना जाता है, उतना ही खतरनाक भी है. हर साल हजारों पर्वतारोही एवरेस्ट फतह करने का सपना लेकर नेपाल पहुंचते हैं और लाखों रुपये खर्च कर जान जोखिम में डालते हैं, लेकिन शिखर तक पहुंचने से पहले उन्हें उस क्षेत्र से गुजरना पड़ता है जिसे दुनिया “डेथ जोन” के नाम से जानती है. यह वह इलाका है जहां पहुंचने के बाद इंसानी शरीर धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगता है और मौत का खतरा हर कदम पर मंडराता रहता है.
विशेषज्ञों के अनुसार डेथ जोन लगभग 8,000 मीटर की ऊंचाई से शुरू होता है. इस ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन की मात्रा समुद्र तल की तुलना में लगभग एक-तिहाई रह जाती है. शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती और इंसानी अंग धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगते हैं. पर्वतारोहियों का दिल तेजी से धड़कने लगता है, दिमाग तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचती, निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और शरीर की ऊर्जा तेजी से खत्म होने लगती है. कई पर्वतारोही इस स्थिति को “धीरे-धीरे दम घुटने जैसा अनुभव” बताते हैं.
साल 2026 के एवरेस्ट सीजन में एक बार फिर इस खतरनाक क्षेत्र की भयावहता दुनिया के सामने आई. इस सीजन में कम से कम पांच पर्वतारोहियों की मौत हुई, जिनमें दो भारतीय पर्वतारोही भी शामिल थे. दोनों ने शिखर तक पहुंचने में सफलता हासिल कर ली थी, लेकिन वापसी के दौरान उनकी जान चली गई. रिपोर्ट के अनुसार एक पर्वतारोही की मौत हिलेरी स्टेप के पास हुई, जिसे एवरेस्ट के सबसे खतरनाक हिस्सों में गिना जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि भीड़, अत्यधिक थकान, गलत फैसले और ऑक्सीजन की भारी कमी लगातार एवरेस्ट को दुनिया की सबसे घातक जगहों में बनाए हुए हैं.
पर्वतारोहण विशेषज्ञ बताते हैं कि डेथ जोन में सबसे बड़ा खतरा “हाइपोक्सिया” होता है. यह वह स्थिति है जब शरीर के अंगों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचती. एवरेस्ट की चोटी पर वायुमंडलीय दबाव इतना कम होता है कि हर सांस के साथ शरीर में बेहद कम ऑक्सीजन पहुंचती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि वहां इंसान अपनी जीवित रहने की अंतिम सीमा पर पहुंच जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति को एवरेस्ट की चोटी पर बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के छोड़ दिया जाए तो वह कुछ ही मिनटों में बेहोश हो सकता है और थोड़ी देर बाद उसकी मौत हो सकती है.
ऑक्सीजन की कमी का सबसे अधिक असर दिमाग पर पड़ता है. पर्वतारोही भ्रमित होने लगते हैं, उनका संतुलन बिगड़ता है और सामान्य फैसले लेना भी मुश्किल हो जाता है. कई बार लोग रस्सी में खुद को बांधना भूल जाते हैं या गलत दिशा में चलने लगते हैं. अनुभवी पर्वतारोही बताते हैं कि डेथ जोन में इंसान की मानसिक स्थिति इतनी कमजोर हो जाती है कि कई बार उसे यह समझ ही नहीं आता कि वह खतरे में है.
एवरेस्ट पर अंतिम चढ़ाई आमतौर पर कैंप-4 से शुरू होती है, जो खुद डेथ जोन के भीतर स्थित है. यहां से शिखर तक पहुंचने में 10 से 15 घंटे तक का समय लग सकता है. इस दौरान पर्वतारोहियों को तेज बर्फीली हवाओं, माइनस 35 डिग्री सेल्सियस तक गिरते तापमान और घुप अंधेरे में आगे बढ़ना पड़ता है. हर कुछ कदमों के बाद रुककर सांस लेना पड़ता है. दस्ताने या मास्क कुछ मिनट के लिए भी हट जाएं तो हाथ-पैरों में फ्रॉस्टबाइट का खतरा पैदा हो जाता है.
इस साल एवरेस्ट पर रिकॉर्ड संख्या में पर्वतारोहियों की मौजूदगी ने हालात और खतरनाक बना दिए. रिपोर्ट्स के मुताबिक नेपाल की ओर से एक ही दिन में 274 पर्वतारोही शिखर तक पहुंचे. इतनी अधिक भीड़ के कारण कई जगह लंबी कतारें लग गईं, जिससे लोगों को घंटों तक डेथ जोन में रुकना पड़ा. विशेषज्ञों का कहना है कि जितनी देर कोई पर्वतारोही इस क्षेत्र में रहता है, उसका शरीर उतनी तेजी से कमजोर होता जाता है और ऑक्सीजन भी तेजी से खत्म होती है.
विशेषज्ञों के मुताबिक एवरेस्ट पर सबसे ज्यादा मौतें चोटी से लौटते समय होती हैं. शिखर पर पहुंचने के बाद शरीर पूरी तरह थक चुका होता है, ऑक्सीजन कम बचती है और मानसिक क्षमता कमजोर पड़ जाती है. ऐसे में नीचे उतरते समय छोटी सी गलती भी जानलेवा साबित हो सकती है. कई पर्वतारोही रस्सी से जुड़ना भूल जाते हैं, रास्ता भटक जाते हैं या थकान के कारण गिर पड़ते हैं.
डेथ जोन का असर शरीर के लगभग हर अंग पर पड़ता है. दिमाग में सूजन आने की स्थिति को हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडेमा कहा जाता है, जिससे भ्रम, मतिभ्रम और कोमा तक हो सकता है. फेफड़ों में पानी भरने की स्थिति हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडेमा कहलाती है, जिसमें सांस लेना बेहद कठिन हो जाता है. शरीर ऊर्जा के लिए खुद की मांसपेशियों को तोड़ने लगता है, जिससे ताकत तेजी से घटती है. वहीं शरीर जरूरी अंगों को बचाने के लिए हाथ-पैरों में खून का प्रवाह कम कर देता है, जिससे फ्रॉस्टबाइट का खतरा बढ़ जाता है.
अनुभवी पर्वतारोहियों का कहना है कि एवरेस्ट पर जिंदा लौटने का सबसे बड़ा नियम है कि डेथ जोन में ज्यादा समय नहीं बिताना चाहिए. पर्वतारोहियों को तेजी से चढ़ाई कर जल्द नीचे उतरना होता है. मौसम खराब होने या शरीर कमजोर पड़ने पर तुरंत वापस लौटने का फैसला लेना जरूरी माना जाता है. पर्याप्त पानी पीना, सही तरीके से ऑक्सीजन का इस्तेमाल और कई सप्ताह तक ऊंचाई के अनुसार शरीर को ढालना भी बेहद आवश्यक होता है.
एवरेस्ट रिकॉर्डधारी पर्वतारोही Kenton Cool ने भी हाल ही में कहा कि अनुभवहीन लोगों को एवरेस्ट पर चढ़ने की अनुमति देने से मौतों का खतरा बढ़ रहा है और पर्वतारोहियों की बेहतर जांच जरूरी है. विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया और रिकॉर्ड बनाने की होड़ ने भी जोखिम को बढ़ाया है.
अपनी अद्भुत सुंदरता और रोमांच के बावजूद एवरेस्ट आज भी ऐसी जगह बना हुआ है जहां प्रकृति इंसान को उसकी सीमाओं का अहसास करा देती है. 8,000 मीटर से ऊपर पहुंचते ही हर सांस एक संघर्ष बन जाती है और जिंदा लौटना ही सबसे बड़ी जीत मानी जाती है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

