सात साल की मासूम की जिद के आगे झुका हाई कोर्ट, मां को मिली कस्टडी, पिता को बातचीत का अधिकार

सात साल की मासूम की जिद के आगे झुका हाई कोर्ट, मां को मिली कस्टडी, पिता को बातचीत का अधिकार

प्रेषित समय :19:18:12 PM / Wed, Jun 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. सात वर्षीय एक अबोध बच्ची की इच्छा को सर्वोच्च महत्व देते हुए मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने उसकी कस्टडी मां को सौंपने का आदेश दिया है. न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा और न्यायमूर्ति जेके पिल्लई की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान बच्ची के स्पष्ट बयान को आधार बनाते हुए कहा कि उसकी भलाई और इच्छा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि पिता जब भी अपनी बेटी से बात करना चाहें, मां उन्हें फोन अथवा अन्य माध्यमों से बातचीत की सुविधा उपलब्ध कराएगी.

मामला जबलपुर निवासी प्रियंका द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है. याचिका में कहा गया था कि उसके पति नरेन्द्र 27 मई 2026 को उनकी बेटी निशि को दादी से मिलाने के बहाने अपने साथ नर्मदापुरम ले गए थे, लेकिन बाद में उसे वापस नहीं भेजा. याचिकाकर्ता का कहना था कि जन्म से ही बच्ची उसकी देखरेख में रह रही है और पिता द्वारा उसे अपने पास रखना गैरकानूनी है. इस आधार पर उसने अदालत से बच्ची को उसके सुपुर्द किए जाने की मांग की थी.

सुनवाई के दौरान नरेन्द्र ने अदालत को बताया कि बच्ची अपनी दादी से मिलने की इच्छा जता रही थी, इसलिए वह उसे अपने साथ लेकर गया था. पिता ने यह भी कहा कि उसका कोई गलत उद्देश्य नहीं था और वह केवल बेटी को परिवार के अन्य सदस्यों से मिलवाना चाहता था. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए बच्ची को अपने समक्ष पेश करने का निर्देश दिया.

कोर्ट में उपस्थित होने पर सात वर्षीय निशि ने बेहद स्पष्ट शब्दों में अपनी बात रखी. उसने न्यायाधीशों से कहा कि उसके पिता उसे दादी से मिलाने के लिए ले गए थे, लेकिन वह उनके साथ नहीं रहना चाहती. बच्ची ने कहा कि वह अपनी मां के पास वापस जाना चाहती है. मासूम बच्ची की इस स्पष्ट और निष्कपट अभिव्यक्ति को अदालत ने गंभीरता से लिया.

युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि भले ही पिता की मंशा गलत साबित नहीं होती हो, लेकिन बच्ची को उसकी मां से अलग रखकर अपने पास बनाए रखना कानूनी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता. अदालत ने माना कि वर्तमान परिस्थितियों में बच्ची की इच्छा और उसके हित को सर्वोपरि रखा जाना आवश्यक है.

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से बच्ची की कस्टडी उसकी मां प्रियंका को सौंपने के निर्देश दिए. साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि पिता और बेटी के संबंध बने रहें, इसके लिए मां को यह सुनिश्चित करना होगा कि पिता जब भी बेटी से संपर्क करना चाहें, उन्हें बातचीत का अवसर मिल सके. अदालत के इस फैसले को बाल हित और अभिभावकीय अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-