क्लिनिक शब्द हटाकर खत्म हो गई कार्रवाई या अब होगी एफआईआर, स्वास्थ्य विभाग की मंशा पर उठे बड़े सवाल

क्लिनिक शब्द हटाकर खत्म हो गई कार्रवाई या अब होगी एफआईआर, स्वास्थ्य विभाग की मंशा पर उठे बड़े सवाल

प्रेषित समय :16:22:59 PM / Thu, Jun 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. नेपियर टाउन स्थित नेरोली सलून एंड क्लिनिक पर स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई ने शहर में संचालित ब्यूटी, स्किन और कॉस्मेटिक प्रतिष्ठानों की कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस छेड़ दी है. डर्मेटोलॉजी संगठन की शिकायत के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम ने प्रतिष्ठान का निरीक्षण किया था. जांच में पाया गया कि वहां केवल सैलून संबंधी गतिविधियां संचालित हो रही थीं, जबकि प्रतिष्ठान के नाम में "क्लिनिक" शब्द का उपयोग किया जा रहा था. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर लेजर और अन्य इन्वेंसिव तकनीकों से जुड़े वीडियो और प्रचार सामग्री प्रसारित होने की शिकायत भी सामने आई थी, जिससे आम लोगों में यह धारणा बन सकती थी कि वहां विशेषज्ञ चिकित्सकीय सेवाएं उपलब्ध हैं.

जांच के बाद स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल प्रतिष्ठान के नाम और साइन बोर्ड से "क्लिनिक" शब्द हटवा दिया. संचालक से लिखित स्पष्टीकरण लिया गया और भविष्य में ऐसी गतिविधियां नहीं करने का आश्वासन प्राप्त किया गया. संचालक ने यह भी दावा किया कि सोशल मीडिया पर प्रदर्शित वीडियो उनकी संस्था के नहीं थे, बल्कि अन्य संस्थानों के वीडियो थे जिन्हें अपलोड किया गया था. इसके बाद मामला प्रशासनिक स्तर पर शांत होता दिखाई दिया, लेकिन यहीं से कई नए सवाल खड़े होने लगे हैं.

डर्मेटोलॉजी संगठन से प्राप्त शिकायत के आधार पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा गठित निरीक्षण दल ने नेपियर टाउन चौथा पुल स्थित नेरोली सलून एंड क्लिनिक का निरीक्षण किया.शिकायत में आरोप लगाया गया था कि संस्था के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लेजर एवं अन्य इन्वेंसिव तकनीकों से त्वचा उपचार संबंधी वीडियो और प्रचार सामग्री प्रसारित की जा रही है, जिससे लोगों में यह धारणा बन रही थी कि वहां विशेषज्ञ चिकित्सकीय सेवाएं उपलब्ध हैं.

निरीक्षण के दौरान पाया गया कि प्रतिष्ठान में केवल सैलून संबंधी गतिविधियां संचालित की जा रही थीं, जबकि अनधिकृत रूप से "क्लिनिक" शब्द का उपयोग किया जा रहा था. जांच के समय वहां कोई त्वचा रोग विशेषज्ञ (डर्मेटोलॉजिस्ट) अथवा अन्य पंजीकृत चिकित्सा विशेषज्ञ कार्यरत नहीं मिला. निरीक्षण दल में जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. विनिता उप्पल तथा नर्सिंग होम शाखा के नोडल अधिकारी डॉ. आदर्श विश्नोई शामिल थे.

जांच के बाद स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल कार्रवाई करते हुए प्रतिष्ठान के नाम एवं बाहरी साइन बोर्ड से "क्लिनिक" शब्द हटवा दिया. साथ ही संचालक को बिना वैधानिक अनुमति एवं पंजीयन के "क्लिनिक", "हॉस्पिटल" अथवा अन्य चिकित्सा संस्थान सूचक शब्दों का उपयोग नहीं करने के निर्देश दिए गए.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जांच में यह माना गया कि सोशल मीडिया प्रचार और प्रतिष्ठान के नाम से लोगों में चिकित्सकीय सेवाओं का भ्रम उत्पन्न हो सकता था, तो क्या केवल बोर्ड हटवा देना पर्याप्त कार्रवाई है? यदि कोई संस्था बिना वैधानिक अनुमति के स्वयं को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से चिकित्सा सेवाओं से जोड़कर प्रस्तुत करती है, तो क्या यह केवल एक प्रशासनिक त्रुटि मानी जाएगी या इसके लिए कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई भी आवश्यक है?

स्वास्थ्य विभाग ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट कहा था कि बिना विधिवत पंजीयन और अनुमति के कोई भी संस्था स्वयं को क्लिनिक, अस्पताल या चिकित्सा संस्थान के रूप में प्रस्तुत नहीं कर सकती. विभाग ने यह भी चेतावनी दी थी कि ऐसे मामलों में मध्य प्रदेश उपचारगृह एवं रूजोपचार संबंधी स्थापनाएं (पंजीकरण एवं अनुज्ञापन) नियम, 1971 तथा अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है और जरूरत पड़ने पर प्रतिष्ठान को सील भी किया जा सकता है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब विभाग स्वयं संभावित कानूनी उल्लंघन की बात स्वीकार कर रहा है तो फिर एफआईआर, दंडात्मक प्रकरण या अन्य वैधानिक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

यह मामला केवल एक प्रतिष्ठान तक सीमित नहीं है. शहर में अनेक ब्यूटी सेंटर, स्किन स्टूडियो, हेयर ट्रांसप्लांट सेंटर, कॉस्मेटिक एस्थेटिक्स यूनिट और वेलनेस सेंटर ऐसे नामों से संचालित हो रहे हैं जो आम नागरिकों को चिकित्सा संस्थानों जैसे प्रतीत हो सकते हैं. कई प्रतिष्ठान सोशल मीडिया पर उपचार, स्किन करेक्शन, लेजर प्रक्रिया और मेडिकल परिणामों से जुड़े दावे भी करते दिखाई देते हैं. ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या स्वास्थ्य विभाग ने ऐसे अन्य प्रतिष्ठानों की सूची तैयार की है और क्या शहरव्यापी जांच अभियान चलाने की कोई योजना है?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कार्रवाई केवल शिकायत मिलने पर ही होगी तो कई ऐसे मामले कभी सामने ही नहीं आ पाएंगे. आवश्यकता इस बात की है कि स्वास्थ्य विभाग सक्रिय निगरानी तंत्र विकसित करे और उन सभी संस्थानों की जांच करें जो अपने नाम, प्रचार या डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से चिकित्सा सेवाओं का आभास कराते हैं.

नेरोली प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भ्रामक प्रचार और चिकित्सा सेवाओं के बीच की रेखा कितनी संवेदनशील है. अब लोगों की नजर इस बात पर है कि क्या यह मामला केवल बोर्ड बदलवाने तक सीमित रहेगा या फिर स्वास्थ्य विभाग शहरभर में ऐसे प्रतिष्ठानों के खिलाफ व्यापक जांच, कानूनी कार्रवाई और जवाबदेही तय करने की दिशा में ठोस कदम उठाएगा. फिलहाल सवाल यही है कि जिम्मेदारी सिर्फ "क्लिनिक" शब्द हटाने से खत्म हो गई या अभी असली कार्रवाई बाकी है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-