प्रधानमंत्री मोदी के कार पूल संदेश की हाई कोर्ट में गूंज, वकीलों को साथ सफर करने की सलाह

प्रधानमंत्री मोदी के कार पूल संदेश की हाई कोर्ट में गूंज, वकीलों को साथ सफर करने की सलाह

प्रेषित समय :17:12:19 PM / Thu, Jun 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने न्यायालय परिसर के आसपास बढ़ती यातायात समस्या और पार्किंग संकट को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए वकीलों और न्यायालय से जुड़े लोगों से कार पूलिंग अपनाने की अपेक्षा जताई है. हाई कोर्ट ने 117 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित अधिवक्ता चैंबर और मल्टीलेवल पार्किंग परियोजना से जुड़ी याचिका का निराकरण करते हुए स्पष्ट किया कि केवल नई पार्किंग सुविधाएं विकसित कर देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा. इसके लिए वाहन साझा करने की संस्कृति, पिक एंड ड्रॉप व्यवस्था तथा यातायात अनुशासन को भी समान रूप से बढ़ावा देना आवश्यक है.

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने गुरुवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं. अदालत की टिप्पणियों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा समय-समय पर दिए गए कार पूलिंग और यातायात प्रबंधन संबंधी संदेशों की झलक भी दिखाई दी. अदालत ने कहा कि न्यायालय परिसर में आने वाले अधिवक्ता, पक्षकार और अन्य लोग यदि वाहन साझा करने की व्यवस्था अपनाएं तो यातायात और पार्किंग की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

मामला हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष धन्य कुमार जैन द्वारा दायर याचिका से संबंधित था. याचिका में हाई कोर्ट परिसर के निकट प्रस्तावित अधिवक्ता चैंबर और बहुस्तरीय पार्किंग निर्माण कार्य में हो रही देरी को लेकर चिंता व्यक्त की गई थी. याचिकाकर्ता का कहना था कि परियोजना की घोषणा और भूमिपूजन के बावजूद निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं होने से अधिवक्ताओं और न्यायालय आने वाले लोगों को लगातार परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि परियोजना को लेकर आवश्यक प्रक्रियाएं आगे बढ़ चुकी हैं और निर्माण कार्य के लिए टेंडर भी जारी कर दिया गया है. सरकार ने न्यायालय को आश्वस्त किया कि अधिवक्ता चैंबर और मल्टीलेवल पार्किंग परियोजना पर जल्द ही कार्य शुरू किया जाएगा. इसके बाद युगलपीठ ने परियोजना की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया और माना कि अब निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ रही है.

अदालत ने कहा कि जब परियोजना के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और प्रशासन आवश्यक कदम उठा रहा है, तब याचिका को लंबित बनाए रखने का कोई विशेष औचित्य नहीं रह जाता. हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में परियोजना को लेकर अनावश्यक विलंब होता है या निर्माण कार्य में कोई गंभीर बाधा उत्पन्न होती है तो याचिकाकर्ता पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है.

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय का मुख्य फोकस केवल पार्किंग निर्माण तक सीमित नहीं रहा. अदालत ने न्यायालय परिसर और उसके आसपास लगातार बढ़ रहे यातायात दबाव पर गंभीर चिंता व्यक्त की. न्यायालय ने कहा कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में अधिवक्ता, पक्षकार और अन्य लोग निजी वाहनों से हाई कोर्ट पहुंचते हैं, जिसके कारण पार्किंग स्थलों पर अत्यधिक दबाव बनता है और आसपास के क्षेत्रों में यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है.

युगलपीठ ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि न्यायालय परिसर के आसपास अनावश्यक रूप से वाहन खड़े करने की प्रवृत्ति को नियंत्रित किया जाए. अदालत ने पिक एंड ड्रॉप व्यवस्था को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया. न्यायालय का मानना है कि यदि लोगों को केवल उतारने और लेने की बेहतर व्यवस्था विकसित की जाए तो पार्किंग की मांग में भी कमी आ सकती है.

अदालत ने अधिवक्ताओं से भी विशेष अपेक्षा जताई कि वे कार पूलिंग की व्यवस्था को अपनाएं. न्यायालय ने कहा कि यदि एक ही दिशा या क्षेत्र से आने वाले अधिवक्ता एक ही वाहन का उपयोग करें तो इससे न केवल पार्किंग का दबाव कम होगा बल्कि यातायात व्यवस्था भी बेहतर होगी. साथ ही इससे ईंधन की बचत और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान मिलेगा.

यातायात पुलिस को भी अदालत ने महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं. न्यायालय ने कहा कि हाई कोर्ट परिसर और उसके आसपास के क्षेत्रों में पार्किंग अनुशासन बनाए रखने के लिए नियमित निगरानी आवश्यक है. यातायात पुलिस को निर्देशित किया गया कि वह क्षेत्र में सतत निगरानी रखे और यह सुनिश्चित करे कि सड़क किनारे अवैध पार्किंग या यातायात बाधित करने वाली गतिविधियां न हों.

गौरतलब है कि इस परियोजना का भूमिपूजन चार मई 2025 को एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में किया गया था. उस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी, न्यायमूर्ति एससी शर्मा, न्यायमूर्ति सूर्यकांत तथा तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे थे. परियोजना को न्यायिक अधोसंरचना के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया था. हालांकि भूमिपूजन के बाद निर्माण कार्य शुरू नहीं होने से अधिवक्ताओं में असंतोष बढ़ने लगा था, जिसके बाद यह मामला न्यायालय तक पहुंचा.

117 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित इस परियोजना में आधुनिक सुविधाओं से युक्त अधिवक्ता चैंबर और बहुस्तरीय पार्किंग का निर्माण किया जाना है. इससे न केवल अधिवक्ताओं को बेहतर कार्यस्थल मिलेगा बल्कि न्यायालय परिसर में पार्किंग की लंबे समय से चली आ रही समस्या के समाधान की दिशा में भी मदद मिलेगी.

हाई कोर्ट के ताजा आदेश को केवल एक परियोजना से जुड़े विवाद के निपटारे के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे न्यायालय परिसर में भविष्य की यातायात व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक के रूप में भी माना जा रहा है. अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अधोसंरचना विकास के साथ-साथ व्यवहारगत बदलाव भी आवश्यक हैं. यदि लोग निजी वाहनों के अत्यधिक उपयोग को कम करें, कार पूलिंग को बढ़ावा दें और यातायात नियमों का पालन करें तो किसी भी शहर या संस्थान की यातायात संबंधी समस्याओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.

हाई कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश के अधिकांश बड़े शहरों में पार्किंग और यातायात प्रबंधन बड़ी चुनौती बन चुके हैं. न्यायालय का यह संदेश केवल अधिवक्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत है कि बढ़ती शहरी भीड़ और सीमित संसाधनों के बीच साझा परिवहन और यातायात अनुशासन ही भविष्य का प्रभावी समाधान बन सकते हैं.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-