23 साल पुराने मानहानि मामले में उमा भारती को राहत, दिग्विजय सिंह से जुड़े विवाद पर 1 जुलाई को अगली सुनवाई

23 साल पुराने मानहानि मामले में उमा भारती को राहत, दिग्विजय सिंह से जुड़े विवाद पर 1 जुलाई को अगली सुनवाई

प्रेषित समय :17:32:44 PM / Thu, Jun 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्य प्रदेश की राजनीति के दो प्रमुख और चर्चित नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के बीच लगभग 23 वर्षों से चल रहे मानहानि विवाद में गुरुवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सुनवाई हुई. अदालत ने उमा भारती की ओर से जवाब प्रस्तुत करने के लिए समय देने की मांग स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 1 जुलाई को निर्धारित कर दी. इसके साथ ही प्रदेश की राजनीति से जुड़े इस पुराने और बहुचर्चित मामले ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना दिया है.

यह मामला वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान दिए गए कथित बयानों से जुड़ा हुआ है. उस समय मध्य प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला था तथा चुनाव प्रचार अपने चरम पर था. चुनावी सभाओं और जनसभाओं में दोनों दलों के नेताओं के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे थे. इसी दौरान तत्कालीन भाजपा नेता और मुख्यमंत्री पद की प्रमुख दावेदार उमा भारती द्वारा दिए गए कुछ बयानों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था.

दिग्विजय सिंह का आरोप है कि चुनावी सभाओं के दौरान उमा भारती ने सार्वजनिक मंचों से उनके अंडरवर्ल्ड से संबंध होने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे. उनके अनुसार इन बयानों से उनकी व्यक्तिगत और राजनीतिक प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा. उन्होंने इसे निराधार, असत्य और उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताते हुए मानहानि का मामला दायर किया था. यही मामला पिछले दो दशकों से अधिक समय से विभिन्न न्यायिक प्रक्रियाओं से गुजरते हुए अब भी अदालत में विचाराधीन है.

गुरुवार को जब मामला हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए आया तो अदालत ने प्रकरण की वर्तमान स्थिति पर विचार किया. सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष की ओर से जवाब प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की गई. अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए जवाब दाखिल करने का अवसर प्रदान किया और मामले की सुनवाई को 1 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दिया.

हालांकि गुरुवार की सुनवाई में मामले के मूल विवाद पर कोई विस्तृत बहस नहीं हुई, लेकिन अदालत के समक्ष यह स्पष्ट किया गया कि प्रतिवादी पक्ष अपना जवाब रिकॉर्ड पर लाना चाहता है. इसके बाद ही मामले में आगे की कार्यवाही की दिशा तय की जा सकेगी. अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिले और न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से आगे बढ़े.

यह मामला केवल एक मानहानि विवाद नहीं माना जाता, बल्कि इसे मध्य प्रदेश की राजनीतिक इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण प्रकरणों में भी गिना जाता है. वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है. उस चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था और उमा भारती मुख्यमंत्री बनी थीं. चुनाव प्रचार के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीखी राजनीतिक बयानबाजी हुई थी और कई आरोप-प्रत्यारोप सार्वजनिक मंचों पर लगाए गए थे. उन्हीं घटनाओं में से एक यह विवाद भी है, जो आज तक न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बना हुआ है.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी भाषणों और राजनीतिक आरोपों से जुड़े मानहानि के मामलों में न्यायालयों को कई पहलुओं पर विचार करना पड़ता है. अदालत यह देखती है कि कथित बयान किस संदर्भ में दिया गया था, उसका उद्देश्य क्या था और उससे संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर क्या प्रभाव पड़ा. इसी कारण ऐसे मामलों का निपटारा अक्सर लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही संभव हो पाता है.

करीब ढाई दशक पुराने इस विवाद की सुनवाई आज भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है. दोनों नेता प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान रखते हैं. दिग्विजय सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं, जबकि उमा भारती भाजपा की प्रमुख नेताओं में रही हैं और मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं. ऐसे में उनके बीच का यह कानूनी विवाद समय-समय पर राजनीतिक चर्चा का विषय बनता रहा है.

हाई कोर्ट की वर्तमान कार्यवाही ने एक बार फिर उस दौर की याद ताजा कर दी है, जब चुनावी मंचों पर राजनीतिक हमले और आरोप-प्रत्यारोप बेहद तीखे हुआ करते थे. हालांकि मामला अब पूरी तरह न्यायालय के विचाराधीन है, लेकिन इसके राजनीतिक और सार्वजनिक महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यही कारण है कि इस मामले की हर सुनवाई पर राजनीतिक और कानूनी दोनों वर्गों की नजर बनी रहती है.

अब सभी की निगाहें 1 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं. उस दिन उमा भारती की ओर से जवाब रिकॉर्ड पर आने की संभावना है. इसके बाद अदालत मामले में आगे की कार्यवाही और सुनवाई की दिशा तय कर सकती है. यह भी संभव है कि दोनों पक्षों के तर्कों को विस्तार से सुना जाए और विवाद के विभिन्न पहलुओं पर न्यायालय अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करे.

फिलहाल अदालत ने किसी भी पक्ष के दावों या आरोपों पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है. मामला अभी विचाराधीन है और न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण का इंतजार किया जा रहा है. लेकिन इतना तय है कि 23 वर्ष पुराने इस मानहानि विवाद ने एक बार फिर मध्य प्रदेश की राजनीति के उस अध्याय को चर्चा में ला दिया है, जिसने कभी प्रदेश के चुनावी माहौल को पूरी तरह प्रभावित किया था.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-