बीजिंग. कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों और अगली पीढ़ी के डाटा सेंटरों के लिए जरूरी माने जाने वाले धातु इंडियम को लेकर वैश्विक बाजार में चिंता बढ़ने लगी है. चीन ने इंडियम के निर्यात पर निगरानी और जांच प्रक्रिया को कड़ा कर दिया है, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और प्रौद्योगिकी उद्योग में संभावित आपूर्ति बाधाओं को लेकर आशंकाएं तेज हो गई हैं. उद्योग जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में इस धातु पर औपचारिक निर्यात नियंत्रण लागू किया गया तो इसका असर एआई चिप निर्माण, ऑप्टिकल संचार तकनीक और उन्नत कंप्यूटिंग क्षेत्र पर पड़ सकता है.
रिपोर्टों के अनुसार चीन ने हाल के महीनों में इंडियम के निर्यात से जुड़े दस्तावेजों और मंजूरी प्रक्रियाओं की अधिक गहन जांच शुरू कर दी है. कई विदेशी खरीदारों ने दावा किया है कि जिन निर्यात अनुमतियों को पहले एक दिन में मंजूरी मिल जाती थी, उनमें अब कई दिन लग रहे हैं. कुछ मामलों में अंतिम उपयोगकर्ता और उत्पाद के गंतव्य से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी भी मांगी जा रही है. इससे यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि चीन भविष्य में इंडियम को भी अपने रणनीतिक निर्यात नियंत्रण ढांचे में शामिल कर सकता है.
वैश्विक स्तर पर इंडियम उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत मानी जाती है. यह धातु मुख्य रूप से जिंक रिफाइनिंग प्रक्रिया के दौरान प्राप्त होती है और लंबे समय से डिस्प्ले पैनल, टच स्क्रीन, सोल्डरिंग तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उपयोग की जाती रही है. हालांकि हाल के वर्षों में इसकी रणनीतिक उपयोगिता और बढ़ गई है क्योंकि इंडियम फॉस्फाइड नामक यौगिक के निर्माण में इसका व्यापक उपयोग होता है. यह यौगिक उच्च गति वाले ऑप्टिकल चिप्स के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो एआई आधारित डाटा सेंटरों और उन्नत कंप्यूटिंग अवसंरचना की रीढ़ माने जाते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि एआई तकनीक के तेजी से विस्तार के साथ उच्च प्रदर्शन वाले डाटा सेंटरों की मांग लगातार बढ़ रही है. ऐसे में इंडियम आधारित घटकों की आवश्यकता भी बढ़ती जा रही है. यदि इस धातु की आपूर्ति प्रभावित होती है तो कई तकनीकी कंपनियों को उत्पादन और लागत संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
उल्लेखनीय है कि चीन पहले ही वर्ष 2025 में इंडियम फॉस्फाइड को अपने निर्यात नियंत्रण ढांचे में शामिल कर चुका है. इसके बाद से इस क्षेत्र में कार्यरत कई कंपनियों को अतिरिक्त अनुमतियों और नियमों का पालन करना पड़ रहा है. उद्योग जगत का मानना है कि वर्तमान में इंडियम धातु पर बढ़ी निगरानी उसी दिशा में अगला कदम साबित हो सकती है.
बताया जा रहा है कि कुछ यूरोपीय खरीदारों से पहली बार उत्पाद के अंतिम उपयोग और अंतिम गंतव्य देश की विस्तृत जानकारी मांगी गई है. वहीं उत्तर अमेरिका के कुछ खरीदारों ने प्रक्रिया को पहले की तुलना में अधिक जटिल और तनावपूर्ण बताया है. हालांकि अब तक किसी बड़े शिपमेंट को रोके जाने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, फिर भी बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है.
चीन के वाणिज्य मंत्रालय की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. इसके बावजूद उद्योग जगत में इस बात पर चर्चा तेज है कि क्या यह कदम केवल निगरानी बढ़ाने तक सीमित रहेगा या फिर भविष्य में औपचारिक निर्यात प्रतिबंधों का रूप ले सकता है.
इस बीच अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश भी महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ संसाधनों की आपूर्ति सुरक्षा को लेकर सक्रिय हो गए हैं. हाल ही में अमेरिकी रक्षा लॉजिस्टिक्स एजेंसी ने आने वाले वर्षों में बड़ी मात्रा में इंडियम भंडारण की योजना प्रस्तावित की है. इसे संभावित आपूर्ति जोखिमों से निपटने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.
वैश्विक व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि रणनीतिक खनिज और धातुएं अब केवल औद्योगिक संसाधन नहीं रह गई हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं. ऐसे में इंडियम को लेकर चीन की बढ़ती सख्ती आने वाले समय में वैश्विक तकनीकी उद्योग, एआई चिप निर्माण और आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है. फिलहाल दुनिया भर की तकनीकी कंपनियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और किसी भी संभावित व्यवधान से निपटने के लिए वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में जुटी हुई हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

