अजमेर. अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के लिए संचालित केंद्र सरकार की छात्रवृत्ति योजनाओं में बड़े पैमाने पर कथित फर्जीवाड़े का मामला सामने आने के बाद राजस्थान पुलिस ने महत्वपूर्ण कार्रवाई करते हुए पश्चिम बंगाल के दो आरोपितों को गिरफ्तार किया है. जांच में सामने आया है कि आरोपितों ने फर्जी दस्तावेज, नकली डिजिटल पहचान और ऑनलाइन प्रणाली की खामियों का लाभ उठाकर छात्रवृत्ति की राशि हड़पने का संगठित नेटवर्क खड़ा कर लिया था. मामले के खुलासे के बाद जांच एजेंसियां अब इस पूरे गिरोह के देशव्यापी नेटवर्क और वित्तीय लेन-देन की पड़ताल कर रही हैं.
पुलिस अधीक्षक हर्षवर्धन अग्रवाला के अनुसार मामले की शुरुआत अजमेर के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से हुई थी. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2021-22 और 2022-23 के दौरान राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल पर फर्जी जानकारी दर्ज कर अल्पसंख्यक छात्रों के नाम पर छात्रवृत्ति राशि का गबन किया गया. शिकायत के बाद गठित विशेष जांच दल ने तकनीकी साक्ष्यों, साइबर ट्रैकिंग और डिजिटल विश्लेषण के आधार पर पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले तक पहुंच बनाई.
जांच के दौरान पुलिस ने 35 वर्षीय तवाबर रहमान और 25 वर्षीय सहजामन को गिरफ्तार किया. दोनों को राजस्थान लाकर पूछताछ की जा रही है. प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि आरोपित ऑनलाइन माध्यम से लोगों की जानकारी एकत्र करते थे और नकली मोबाइल सिम, आधार संबंधी विवरण तथा जाली दस्तावेजों का उपयोग कर छात्रवृत्ति के फर्जी आवेदन तैयार करते थे. इसके बाद छात्रवृत्ति की राशि विभिन्न बैंक खातों में स्थानांतरित कर दी जाती थी.
पुलिस ने आरोपितों के कब्जे से 85 मोबाइल सिम कार्ड, दो लैपटॉप, दो प्रिंटर, सात फिंगरप्रिंट स्कैनर, कई एटीएम कार्ड, तीन मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरण बरामद किए हैं. जब्त उपकरणों की जांच में बड़ी मात्रा में संदिग्ध डिजिटल डेटा मिला है. अधिकारियों के अनुसार इनमें लगभग 2100 बैंक खातों का विवरण, करीब 1000 फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड, 2000 आधार कार्डों की प्रतियां तथा लगभग 1500 मुहरों की डिजिटल छवियां संग्रहीत थीं.
विशेष जांच दल के प्रभारी शिवम जोशी ने बताया कि शुरुआती जांच में अजमेर जिले सहित विभिन्न क्षेत्रों में छात्रवृत्ति योजना के तहत बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के संकेत मिले हैं. प्रारंभिक स्तर पर पांच लाख रुपये से अधिक की राशि फर्जी तरीके से निकाले जाने की पुष्टि हुई है, हालांकि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक होने की आशंका जताई जा रही है.
पुलिस का मानना है कि कोविड-19 महामारी के दौरान जब अधिकांश प्रक्रियाएं ऑनलाइन माध्यम से संचालित की जा रही थीं और भौतिक सत्यापन सीमित था, तब आरोपितों ने इसी स्थिति का लाभ उठाकर फर्जी पहचान और दस्तावेजों का नेटवर्क तैयार किया. जांच एजेंसियों को संदेह है कि यह केवल दो व्यक्तियों का काम नहीं बल्कि एक संगठित गिरोह की सुनियोजित गतिविधि थी.
फिलहाल गिरफ्तार आरोपितों को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है. वहीं पुलिस की टीमें गिरोह के चार से पांच अन्य फरार सदस्यों की तलाश में लगातार छापेमारी कर रही हैं. राज्य के वरिष्ठ अधिकारी भी मामले की निगरानी कर रहे हैं. जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क के तार किन-किन राज्यों और जिलों तक फैले हुए हैं तथा छात्रवृत्ति की राशि का अंतिम लाभार्थी कौन था. इस बहुचर्चित प्रकरण ने छात्रवृत्ति वितरण प्रणाली की सुरक्षा और डिजिटल सत्यापन व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

