419 करोड़ के एलयूसीसी चिटफंड घोटाले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, तीन राज्यों में 23 संपत्तियां जब्त

419 करोड़ के एलयूसीसी चिटफंड घोटाले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, तीन राज्यों में 23 संपत्तियां जब्त

प्रेषित समय :20:04:23 PM / Thu, Jun 25th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

देहरादून. बहुचर्चित एलयूसीसी चिटफंड घोटाले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में फैली 23 संपत्तियों को कुर्क कर लिया है. एजेंसी के अनुसार यह कार्रवाई लूनी अर्बन मल्टी स्टेट क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट कोऑपरेटिव सोसायटी (एलयूसीसी) से जुड़े उस बहुचर्चित निवेश घोटाले में की गई है, जिसमें 1.60 लाख से अधिक निवेशकों के साथ लगभग 419 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी किए जाने का आरोप है. अब तक लगभग 25 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियां कुर्क की जा चुकी हैं और जांच एजेंसी का कहना है कि मामले से जुड़े अन्य परिसंपत्तियों की भी पहचान की जा रही है.

सीबीआई के अधिकारियों के अनुसार प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि आरोपितों ने निवेशकों से एकत्रित धनराशि का उपयोग विभिन्न राज्यों में अचल संपत्तियां खरीदने में किया. जांच के दौरान जिन संपत्तियों का पता चला, उन्हें गैर-विनियमित जमा योजनाएं प्रतिबंध अधिनियम (बड्स अधिनियम) के प्रावधानों के तहत जब्त करने की कार्रवाई शुरू की गई. एजेंसी का कहना है कि यह कार्रवाई निवेशकों के हितों की रक्षा और अवैध रूप से अर्जित संपत्तियों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से की गई है.

जांच एजेंसी के अनुसार उत्तराखंड में छह संपत्तियां सक्षम प्राधिकारी के आदेश पर कुर्क की गई हैं. उत्तर प्रदेश में नामित बड्स अदालत की अनुमति के बाद 16 संपत्तियों को जब्त किया गया है. वहीं महाराष्ट्र में मुंबई स्थित एक संपत्ति को भी नामित अदालत ने कुर्क करने की अनुमति दे दी है. सीबीआई ने बताया कि मुंबई स्थित संपत्ति के संबंध में उत्तराखंड के सक्षम प्राधिकारी से औपचारिक आदेश प्राप्त करने की प्रक्रिया जारी है.

एलयूसीसी प्रकरण पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में गिना जा रहा है. आरोप है कि सोसायटी ने निवेशकों को अधिक ब्याज और आकर्षक रिटर्न का लालच देकर बड़ी मात्रा में धनराशि जमा कराई. हजारों लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत इस योजना में निवेश की, लेकिन बाद में भुगतान बंद होने पर पूरे मामले का खुलासा हुआ. जांच में सामने आया कि बड़ी संख्या में जमाकर्ताओं को उनका पैसा वापस नहीं मिला, जिससे लाखों परिवार आर्थिक संकट में आ गए.

सीबीआई के अनुसार इस पूरे मामले में लगभग 800 करोड़ रुपये की जमा राशि एकत्र की गई थी. हालांकि इसका एक हिस्सा निवेशकों को लौटाया गया, लेकिन जांच में अब तक 419 करोड़ रुपये से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितताओं और गबन के प्रमाण मिले हैं. एजेंसी का मानना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ इस राशि में और वृद्धि हो सकती है.

मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट ने वर्ष 2025 में इस पूरे प्रकरण की जांच राज्य पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था. अदालत ने पाया था कि विभिन्न जिलों में दर्ज अनेक प्राथमिकी एक ही प्रकार की वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ी हैं, इसलिए निष्पक्ष और व्यापक जांच के लिए एक केंद्रीय एजेंसी द्वारा जांच आवश्यक है. इसके बाद 26 नवंबर 2025 को सीबीआई ने राज्य पुलिस से सभी संबंधित प्रकरण अपने हाथ में लेकर औपचारिक जांच शुरू की.

सीबीआई ने भारतीय दंड संहिता, भारतीय न्याय संहिता, उत्तराखंड जमाकर्ता हित संरक्षण अधिनियम तथा गैर-विनियमित जमा योजनाएं प्रतिबंध अधिनियम सहित विभिन्न कानूनी प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया. एजेंसी का कहना है कि जांच के दौरान वित्तीय लेनदेन, बैंक खातों, संपत्तियों और निवेशकों से जुड़े दस्तावेजों का व्यापक विश्लेषण किया गया है.

अब तक इस मामले में सात आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है. सभी वर्तमान में न्यायिक हिरासत में हैं. जांच एजेंसी का कहना है कि आरोपितों से पूछताछ और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर वित्तीय लेनदेन की पूरी श्रृंखला को खंगाला जा रहा है. इसके साथ ही उन व्यक्तियों और संस्थाओं की भी पहचान की जा रही है, जिनके माध्यम से कथित रूप से निवेशकों की धनराशि को इधर-उधर स्थानांतरित किया गया.

सीबीआई अधिकारियों के अनुसार संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई अभी अंतिम नहीं है. जांच के दौरान यदि अन्य अचल संपत्तियों, बैंक खातों, निवेश या आर्थिक परिसंपत्तियों का पता चलता है, तो उन्हें भी जब्त करने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी. एजेंसी का उद्देश्य धोखाधड़ी से अर्जित सभी संपत्तियों को कानूनी प्रक्रिया के तहत सुरक्षित करना है, ताकि भविष्य में न्यायालय के निर्देशानुसार निवेशकों के हितों की रक्षा की जा सके.

वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में अनियमित जमा योजनाओं के माध्यम से लोगों को ऊंचे मुनाफे का लालच देकर निवेश कराने के कई मामले सामने आए हैं. ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में ऐसे मामलों का प्रभाव अधिक देखा गया है, जहां लोग बिना पर्याप्त जानकारी के अपनी जमा पूंजी निजी संस्थाओं में निवेश कर देते हैं. विशेषज्ञ निवेश से पहले संबंधित संस्था के वैधानिक पंजीकरण और नियामकीय स्वीकृति की जांच करने की सलाह देते हैं.

एलयूसीसी प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि निवेश योजनाओं में पारदर्शिता और नियामकीय निगरानी कितनी आवश्यक है. हजारों परिवारों की गाढ़ी कमाई इस कथित घोटाले में फंस गई और अनेक लोगों की आर्थिक स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित हुई. ऐसे मामलों में समय पर कार्रवाई और अवैध संपत्तियों की कुर्की को निवेशकों का विश्वास बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

सीबीआई ने स्पष्ट किया है कि जांच अभी जारी है और आने वाले समय में इस घोटाले से जुड़े अन्य वित्तीय लेनदेन, संपत्तियों और संभावित आरोपितों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है. एजेंसी का कहना है कि मामले के प्रत्येक पहलू की गहन जांच की जा रही है ताकि निवेशकों के साथ हुई कथित धोखाधड़ी के पूरे नेटवर्क का खुलासा किया जा सके.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-