सरकारी स्कूलों में बच्चों को हिंदू प्रार्थना के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी

सरकारी स्कूलों में बच्चों को हिंदू प्रार्थना के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी

प्रेषित समय :19:24:46 PM / Fri, Jul 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूलों में धार्मिक प्रार्थनाओं को लेकर चल रहे विवाद के बीच महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी बच्चे को हिंदू प्रार्थना या धार्मिक मंत्रों का पाठ करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें राज्य सरकार के 12 जून को जारी उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र सहित विभिन्न धार्मिक प्रार्थनाओं का अनिवार्य पाठ कराने का निर्देश दिया गया था. हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि यदि कहीं किसी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध धार्मिक प्रार्थना पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है तो वे इस संबंध में दोबारा न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं.

यह मामला राज्य सरकार द्वारा जारी उस परिपत्र के बाद सामने आया, जिसमें सरकारी स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा से लेकर मध्याह्न भोजन और स्कूल की छुट्टी तक विभिन्न चरणों में सांस्कृतिक, नैतिक और धार्मिक गतिविधियों को शामिल करने के निर्देश दिए गए थे. आदेश के अनुसार सुबह की सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रीय गीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र तथा महापुरुषों के जीवन प्रसंगों का वाचन कराया जाना था. वहीं मध्याह्न भोजन से पहले भोजन मंत्र और दिन समाप्त होने पर राज्य गीत, गायत्री मंत्र तथा शांति मंत्र का पाठ भी प्रस्तावित किया गया था. इस आदेश के लागू होने के बाद राज्य में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक बहस शुरू हो गई थी.

याचिका पूर्व छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, पूर्व अल्पसंख्यक विभाग अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा तथा बिलासपुर के सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद की ओर से दायर की गई थी. याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष दलील दी कि सरकारी स्कूलों में किसी एक धर्म विशेष से जुड़े मंत्रों और प्रार्थनाओं को अनिवार्य करना भारतीय संविधान की मूल भावना और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के विपरीत है. उनका कहना था कि यह आदेश संविधान के तहत सभी नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है.

याचिका में यह भी कहा गया कि सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र जैसे धार्मिक अनुष्ठानों को सरकारी विद्यालयों में अनिवार्य रूप से शामिल करना किसी विशेष धर्म के प्रचार और धार्मिक शिक्षा को बढ़ावा देने जैसा है. याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की कि राज्य सरकार के इस आदेश को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किया जाए. उनका तर्क था कि सरकारी शिक्षण संस्थानों का उद्देश्य सभी वर्गों और सभी धर्मों के विद्यार्थियों को समान वातावरण में शिक्षा उपलब्ध कराना है, इसलिए किसी भी धार्मिक गतिविधि को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता.

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने की. सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध धार्मिक मंत्रों या प्रार्थनाओं का पाठ करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. न्यायालय ने कहा कि यदि भविष्य में किसी भी सरकारी स्कूल में इस प्रकार की कोई शिकायत सामने आती है, जिसमें किसी बच्चे को जबरन धार्मिक प्रार्थना पढ़ाई जा रही हो, तो प्रभावित पक्ष दोबारा अदालत का रुख कर सकता है. अदालत की इस टिप्पणी को सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों के मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

राज्य सरकार की ओर से पहले यह स्पष्ट किया गया था कि 12 जून का परिपत्र किसी धार्मिक एजेंडे को लागू करने के उद्देश्य से जारी नहीं किया गया है. अधिकारियों का कहना था कि इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों में देशभक्ति, अनुशासन, नैतिक मूल्यों, बौद्धिक विकास तथा भारतीय संस्कृति और परंपराओं के प्रति जागरूकता विकसित करना है. सरकार का दावा था कि विद्यालयों में प्रस्तावित गतिविधियां छात्रों के समग्र व्यक्तित्व विकास को ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं और इन्हें व्यापक सांस्कृतिक शिक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए.

हालांकि सरकार के इस फैसले का विपक्षी दल कांग्रेस ने तीखा विरोध किया था. कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार सरकारी स्कूलों के माध्यम से एक विशेष वैचारिक और धार्मिक एजेंडा लागू करने का प्रयास कर रही है. कांग्रेस का कहना था कि सरकारी विद्यालय किसी विशेष धर्म की शिक्षाओं का मंच नहीं बन सकते और शिक्षा व्यवस्था को संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के अनुरूप ही संचालित किया जाना चाहिए. विपक्ष ने यह भी सवाल उठाया था कि यदि सरकारी विद्यालयों में किसी धर्म विशेष की प्रार्थनाओं को अनिवार्य किया जाएगा तो अन्य समुदायों के विद्यार्थियों की धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.

हाईकोर्ट की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब शिक्षा संस्थानों में धार्मिक गतिविधियों की भूमिका को लेकर देशभर में समय-समय पर बहस होती रही है. संविधान सभी नागरिकों को अपनी धार्मिक आस्था का पालन करने और किसी भी धर्म को मानने या न मानने की स्वतंत्रता प्रदान करता है. इसी आधार पर सरकारी संस्थानों में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को बनाए रखने पर लगातार जोर दिया जाता रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि राज्य संचालित शिक्षण संस्थानों में किसी भी छात्र पर धार्मिक आचरण थोपना स्वीकार्य नहीं होगा.

फिलहाल अदालत ने राज्य सरकार के आदेश को निरस्त करने संबंधी कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी बच्चे को उसकी इच्छा के विरुद्ध धार्मिक प्रार्थना करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. इसके साथ ही न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को यह स्वतंत्रता भी दी है कि यदि भविष्य में आदेश के क्रियान्वयन के दौरान किसी छात्र के साथ जबरदस्ती किए जाने की घटना सामने आती है तो वे आवश्यक तथ्यों और साक्ष्यों के साथ पुनः न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं. हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को शिक्षा व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-