साइबर ठगी की सुस्त जांच पर एमपी हाईकोर्ट सख्त, एसपी-टीआई और विवेचक को केस डायरी सहित किया तलब

साइबर ठगी की सुस्त जांच पर एमपी हाईकोर्ट सख्त, एसपी-टीआई और विवेचक को केस डायरी सहित किया तलब

प्रेषित समय :15:35:11 PM / Sat, Jul 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 6.24 लाख रुपये की साइबर ठगी के एक मामले की जांच में धीमी प्रगति पर कड़ी नाराजगी जताते हुए जबलपुर पुलिस प्रशासन को कड़े निर्देश जारी किए हैं. हाईकोर्ट ने जबलपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी), गोराबाजार थाना प्रभारी (टीआई) और मामले के विवेचना अधिकारी को अगली सुनवाई पर मूल केस डायरी सहित व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि साइबर अपराधों के मामलों में समयबद्ध, प्रभावी और पेशेवर जांच न्याय व्यवस्था में आम लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है.

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ में न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी. सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि घटना को एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आरोपी अब तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं. जबकि जांच एजेंसी के पास आरोपियों के संबंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध होने की बात भी रिकॉर्ड पर है. इस स्थिति पर अदालत ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसी जांच व्यवस्था स्वीकार्य नहीं कही जा सकती.

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वर्तमान समय में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और इन अपराधों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव आम नागरिकों, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों पर पड़ता है. कोर्ट ने टिप्पणी की कि साइबर ठग लोगों की जीवनभर की मेहनत की कमाई और जमा-पूंजी को कुछ ही मिनटों में उनके खातों से निकाल लेते हैं. ऐसे मामलों में यदि जांच एजेंसियां तत्परता और दक्षता के साथ कार्रवाई नहीं करतीं तो इससे पीड़ितों का न्याय व्यवस्था और कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर विश्वास कमजोर होता है.

हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई के दौरान विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए. इस रिपोर्ट में अब तक की गई प्रत्येक कार्रवाई का पूरा विवरण शामिल किया जाए. अदालत ने विशेष रूप से कहा है कि जांच एजेंसी यह बताए कि आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए अब तक कितने स्थानों पर छापेमारी की गई, किन-किन राज्यों की पुलिस से संपर्क किया गया, उनके साथ क्या पत्राचार हुआ, कौन-कौन से इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एकत्र किए गए तथा जांच पूरी करने की संभावित समय-सीमा क्या है.

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल औपचारिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं होगा. जांच की वास्तविक प्रगति और आरोपियों तक पहुंचने के लिए किए गए ठोस प्रयासों का विवरण भी रिकॉर्ड पर लाना होगा. इसी उद्देश्य से अदालत ने जबलपुर के एसपी, गोराबाजार थाना प्रभारी और विवेचना अधिकारी को मूल केस डायरी के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है, ताकि जांच की स्थिति पर सीधे उनसे जानकारी ली जा सके.

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने केवल मध्य प्रदेश पुलिस तक ही अपने निर्देश सीमित नहीं रखे. अदालत ने पश्चिम बंगाल और झारखंड के पुलिस महानिदेशकों को भी इस मामले में पक्षकार बनाए जाने के निर्देश दिए हैं. साथ ही मध्य प्रदेश शासन के प्रमुख सचिव (गृह) को भी पक्षकार बनाने का आदेश दिया गया है. इससे संकेत मिलता है कि अदालत मामले के विभिन्न राज्यों से जुड़े पहलुओं की भी निगरानी करना चाहती है और संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने के पक्ष में है.

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने साइबर अपराधों की बढ़ती घटनाओं पर भी चिंता व्यक्त की. अदालत ने प्रारंभिक तौर पर यह माना कि प्रदेश में लगातार बढ़ रहे साइबर अपराधों को देखते हुए ऐसे मामलों की जांच के लिए स्थायी विशेष जांच दल (एसआईटी) अथवा विशेष जांच तंत्र गठित किए जाने की आवश्यकता पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में साइबर अपराधों की जांच व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि साइबर अपराधों की प्रकृति पारंपरिक अपराधों से अलग होती है. इनमें तकनीकी साक्ष्य, बैंकिंग लेनदेन, मोबाइल और इंटरनेट डेटा के साथ-साथ कई राज्यों की पुलिस के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है. ऐसे में जांच एजेंसियों को आधुनिक तकनीक और पेशेवर तरीके अपनाकर तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि आरोपियों की शीघ्र गिरफ्तारी सुनिश्चित हो सके और पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके.

मामले में अगली सुनवाई 14 जुलाई को निर्धारित की गई है. उस दिन जबलपुर के पुलिस अधीक्षक, गोराबाजार थाना प्रभारी और विवेचना अधिकारी को मूल केस डायरी सहित हाईकोर्ट में उपस्थित होकर जांच की प्रगति का विस्तृत ब्यौरा देना होगा. अदालत की सख्त टिप्पणी और अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति के निर्देश को साइबर अपराधों की जांच में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-