एआई की अंधी दौड़ पर जलवायु का खतरा, दुनिया भर में बन रहे डेटा सेंटर बढ़ती गर्मी और बाढ़ की जद में

एआई की अंधी दौड़ पर जलवायु का खतरा, दुनिया भर में बन रहे डेटा सेंटर बढ़ती गर्मी और बाढ़ की जद में

प्रेषित समय :14:28:39 PM / Fri, Jun 19th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली.दुनिया इस समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई की नई क्रांति के दौर से गुजर रही है। तकनीकी कंपनियां अरबों-खरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं, सरकारें डिजिटल अर्थव्यवस्था को विकास का नया आधार मान रही हैं और हर देश भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की होड़ में जुटा है। इस पूरी दौड़ के केंद्र में डेटा सेंटर हैं, जिन्हें आधुनिक डिजिटल दुनिया का हृदय कहा जाता है। लेकिन एआई और डिजिटल विस्तार के इस उत्साह के बीच एक गंभीर प्रश्न तेजी से उभर रहा है कि क्या भविष्य की इस तकनीकी व्यवस्था की बुनियाद स्वयं जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों का सामना कर पाएगी?

जलवायु जोखिम विश्लेषण संस्था एक्सडीआई की हालिया रिपोर्ट ने इसी चिंता को सामने रखा है। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में प्रस्तावित 2,595 डेटा सेंटरों का अध्ययन किया गया, जिसमें पाया गया कि बड़ी संख्या में ऐसे केंद्र उन क्षेत्रों में बनाए जा रहे हैं जहां आने वाले वर्षों में अत्यधिक गर्मी, बाढ़, जंगल की आग और अन्य चरम मौसमीय घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ने वाला है। रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि यदि वर्तमान जलवायु परिस्थितियां इसी दिशा में आगे बढ़ती रहीं तो डेटा सेंटर उद्योग के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

रिपोर्ट के अनुसार कम रेज़िलिएंस वाले परिदृश्य में वर्ष 2026 में ही लगभग छह प्रतिशत प्रस्तावित डेटा सेंटर उच्च जोखिम की श्रेणी में आते हैं। यह आंकड़ा पहली नजर में छोटा दिखाई दे सकता है, लेकिन जब इन केंद्रों में होने वाले खरबों डॉलर के निवेश और उन पर निर्भर वैश्विक डिजिटल सेवाओं को देखा जाता है तो इसकी गंभीरता स्पष्ट हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार मौजूदा स्तर पर बनी रहती है तो आने वाले दशकों में यह जोखिम और अधिक बढ़ सकता है।

आज का डिजिटल जीवन पूरी तरह डेटा सेंटरों पर निर्भर है। कोई व्यक्ति ऑनलाइन वीडियो देखता है, क्लाउड पर अपनी फाइलें सुरक्षित रखता है, डिजिटल भुगतान करता है या एआई आधारित चैटबॉट से बातचीत करता है, तो उसके पीछे विशाल डेटा सेंटरों का नेटवर्क काम कर रहा होता है। इंटरनेट की दुनिया भले ही आभासी दिखाई देती हो, लेकिन उसकी वास्तविक नींव विशाल इमारतों, सर्वरों, बिजली आपूर्ति प्रणालियों और शीतलन उपकरणों पर टिकी हुई है। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब सीधे डिजिटल अर्थव्यवस्था की स्थिरता से जुड़ता जा रहा है।

रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता अत्यधिक गर्मी को लेकर जताई गई है। डेटा सेंटरों के भीतर हजारों सर्वर चौबीसों घंटे चलते रहते हैं और उन्हें लगातार ठंडा रखना आवश्यक होता है। यदि तापमान बढ़ता है तो शीतलन प्रणाली पर दबाव बढ़ जाता है, ऊर्जा की खपत अधिक होती है और संचालन लागत भी तेजी से बढ़ती है। कई मामलों में अत्यधिक गर्मी उपकरणों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है और सेवाओं में व्यवधान की आशंका पैदा कर सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में हीट स्ट्रेस डेटा सेंटर उद्योग के सामने सबसे तेजी से बढ़ने वाले जोखिमों में शामिल होगा।

रिपोर्ट केवल प्रत्यक्ष खतरों तक सीमित नहीं है। इसमें अप्रत्यक्ष जोखिमों को भी उतना ही महत्वपूर्ण बताया गया है। कई बार डेटा सेंटरों को सीधा नुकसान बाढ़ या तूफान से नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ी व्यवस्थाओं के प्रभावित होने से संकट पैदा होता है। यदि बिजली आपूर्ति बाधित हो जाए, दूरसंचार नेटवर्क ठप पड़ जाए, पानी की उपलब्धता कम हो जाए या आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट आ जाए तो डेटा सेंटरों का संचालन प्रभावित हो सकता है। रिपोर्ट का आकलन है कि भविष्य में ऐसे अप्रत्यक्ष जोखिम कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष भौतिक क्षति से भी अधिक गंभीर साबित हो सकते हैं।

दुनिया के कई हिस्सों में यह चुनौती पहले से दिखाई देने लगी है। रिपोर्ट में अमेरिका, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और कुछ अन्य क्षेत्रों को ऐसे स्थानों के रूप में चिन्हित किया गया है जहां प्रस्तावित डेटा सेंटरों को अपेक्षाकृत अधिक जलवायु जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। इन क्षेत्रों में बढ़ती गर्मी, चरम मौसमीय घटनाएं और बुनियादी ढांचे पर बढ़ता दबाव आने वाले वर्षों में निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चिंता बन सकता है।

भारत का नाम रिपोर्ट में प्रमुख जोखिम हॉटस्पॉट के रूप में नहीं आया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि देश पूरी तरह सुरक्षित है। भारत वर्तमान में दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर बाजारों में शामिल है। मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और नोएडा जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर नए डेटा सेंटर विकसित किए जा रहे हैं। दूसरी ओर देश लगातार अधिक तीव्र और लंबी गर्मी की लहरों का सामना कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड तोड़ तापमान दर्ज किए गए हैं और कई क्षेत्रों में गर्मी का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा है। ऐसे में डेटा सेंटर उद्योग के लिए ऊर्जा दक्षता, प्रभावी शीतलन व्यवस्था और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।

एक्सडीआई के संस्थापक तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रमुख डॉ. कार्ल मैलन का कहना है कि एआई अवसंरचना निर्माण की वैश्विक दौड़ अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रही है। उनके अनुसार भविष्य के जलवायु जोखिम पूरी तरह तय नहीं हैं और सही योजना के माध्यम से इन्हें काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि डेटा सेंटरों के लिए उपयुक्त स्थानों का चयन किया जाए, बेहतर इंजीनियरिंग डिजाइन अपनाए जाएं और मजबूत रेज़िलिएंस उपाय लागू किए जाएं तो संभावित नुकसान को काफी कम किया जा सकता है।

रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि एआई का भविष्य केवल अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर, शक्तिशाली प्रोसेसर और उन्नत एल्गोरिदम से निर्धारित नहीं होगा। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि डेटा सेंटर कहां बनाए जाते हैं, वे बढ़ती गर्मी और चरम मौसम का सामना कितनी क्षमता से कर सकते हैं, उन्हें बिजली और पानी जैसी आवश्यक संसाधन कितनी विश्वसनीयता से उपलब्ध होते हैं और संकट की परिस्थितियों में वे कितनी देर तक बिना बाधा काम कर सकते हैं।

दुनिया आज एआई क्रांति का उत्सव मना रही है और तकनीकी क्षेत्र में नए अवसरों की चर्चा हो रही है। लेकिन एक्सडीआई की रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी देती है। डिजिटल भविष्य की पूरी संरचना कंक्रीट, स्टील, बिजली और पानी जैसी वास्तविक जरूरतों पर आधारित है। यदि जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को अनदेखा किया गया तो आने वाले समय में डिजिटल अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ी चुनौती किसी प्रतिस्पर्धी तकनीक से नहीं, बल्कि बदलते मौसम और उसके बढ़ते प्रभावों से मिल सकती है। यही कारण है कि एआई के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए अब तकनीकी नवाचार के साथ-साथ जलवायु अनुकूल योजना और टिकाऊ अवसंरचना निर्माण पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-