सिर्फ तापमान नहीं अब उमस भी बन रही जानलेवा, भारत के लिए नई जलवायु चेतावनी

सिर्फ तापमान नहीं अब उमस भी बन रही जानलेवा, भारत के लिए नई जलवायु चेतावनी

प्रेषित समय :17:43:18 PM / Thu, Jun 25th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. देश में हर वर्ष गर्मियों के दौरान तापमान के नए रिकॉर्ड चर्चा का विषय बनते हैं. लोग यह जानने को उत्सुक रहते हैं कि पारा 40 डिग्री पार हुआ या 45 डिग्री तक पहुंच गया. लेकिन अब वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले समय में केवल तापमान ही नहीं, बल्कि हवा में बढ़ती नमी यानी उमस भी मानव स्वास्थ्य के लिए कहीं अधिक बड़ा खतरा बन सकती है. नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में खतरनाक उमस भरे दिनों की संख्या पिछले पांच दशकों में दोगुने से अधिक हो गई है और भारत उन देशों में शामिल है जहां इसका असर सबसे गंभीर रूप से महसूस किया जा सकता है.

जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट सेंट्रल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1970 के दशक में दुनिया भर में औसतन केवल 10 दिन ऐसे होते थे, जब गर्मी और नमी का संयुक्त प्रभाव मानव शरीर के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता था. अब यह संख्या बढ़कर 23 दिन प्रतिवर्ष हो गई है. यानी पिछले लगभग पांच दशकों में ऐसे दिनों की संख्या दोगुने से भी अधिक हो चुकी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे मानवजनित जलवायु परिवर्तन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1970 के बाद दर्ज हुए लगभग 64 प्रतिशत खतरनाक उमस भरे दिनों का संबंध सीधे जलवायु परिवर्तन से है. वर्ष 2025 के आंकड़े तो और अधिक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं. पिछले वर्ष दुनिया में औसतन 23 ऐसे दिन दर्ज किए गए, जिनमें गर्मी और नमी का स्तर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक था. इनमें से 19 दिन यानी लगभग 83 प्रतिशत दिनों के पीछे जलवायु परिवर्तन को प्रमुख कारण माना गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक तापमान में वृद्धि की वर्तमान गति जारी रही तो आने वाले वर्षों में ऐसी परिस्थितियां और सामान्य होती जाएंगी.

भारत के संदर्भ में यह रिपोर्ट विशेष महत्व रखती है. देश के अधिकांश हिस्सों में भीषण गर्मी के साथ उमस का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है. मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, कोच्चि, विशाखापट्टनम जैसे तटीय शहरों में रहने वाले लोग लंबे समय से यह अनुभव करते रहे हैं कि तापमान अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद उमस के कारण गर्मी कहीं अधिक असहनीय लगती है. यही स्थिति गंगा के मैदानी क्षेत्रों में भी मानसून से पहले और बाद के महीनों में देखने को मिलती है, जब वातावरण में नमी बढ़ जाती है और शरीर को राहत नहीं मिलती.

वैज्ञानिक बताते हैं कि मानव शरीर स्वयं को ठंडा रखने के लिए पसीना निकालता है. सामान्य परिस्थितियों में पसीना त्वचा से वाष्पित होकर शरीर की अतिरिक्त गर्मी बाहर निकाल देता है. लेकिन जब वातावरण में नमी बहुत अधिक होती है तो पसीने का वाष्पीकरण धीमा पड़ जाता है. परिणामस्वरूप शरीर के भीतर गर्मी लगातार जमा होने लगती है. यही स्थिति हीट एग्जॉशन, हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय संबंधी समस्याओं और श्वसन रोगों का खतरा कई गुना बढ़ा देती है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2000 के बाद से दुनिया भर में अत्यधिक गर्मी से जुड़ी घटनाओं के कारण ढाई लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बुजुर्ग, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं, पहले से बीमार लोग और वे परिवार जिनके पास शीतल वातावरण या एयर कूलिंग जैसी सुविधाओं की पहुंच सीमित है, सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं. तेजी से बढ़ते शहरीकरण और कंक्रीट के फैलाव ने भी गर्मी और उमस के प्रभाव को और गंभीर बना दिया है.

इस खतरे का आकलन करने के लिए वैज्ञानिक केवल सामान्य तापमान नहीं देखते, बल्कि "वेट बल्ब तापमान" का उपयोग करते हैं. इसमें तापमान के साथ हवा में मौजूद नमी को भी शामिल किया जाता है. क्लाइमेट सेंट्रल ने 25 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक वेट बल्ब तापमान को मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक श्रेणी माना है. इस स्तर पर शरीर के लिए स्वयं को ठंडा रखना कठिन हो जाता है और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा तेजी से बढ़ जाता है.

रिपोर्ट में दुनिया के 961 शहरों का विश्लेषण किया गया. इनमें से 69 प्रतिशत शहरों में जलवायु परिवर्तन के कारण खतरनाक उमस भरे दिनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई. पिछले दस वर्षों के दौरान इन शहरों में औसतन 46 अतिरिक्त खतरनाक दिन प्रति वर्ष दर्ज किए गए. यह संकेत देता है कि दुनिया के अधिकांश बड़े शहर अब पहले की तुलना में कहीं अधिक लंबे समय तक गर्म और उमस भरे मौसम का सामना कर रहे हैं.

क्लाइमेट सेंट्रल की अनुप्रयुक्त जलवायु वैज्ञानिक कैटलिन ट्रूडो का कहना है कि अत्यधिक उमस वाली गर्मी अब कुछ क्षेत्रों तक सीमित असामान्य घटना नहीं रही. यह कई देशों और शहरों में सामान्य जीवन का हिस्सा बनती जा रही है और मानव शरीर की सहनशक्ति की सीमा को लगातार चुनौती दे रही है. वहीं स्टैनफोर्ड चिल्ड्रेन हेल्थ की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. लिसा पटेल का कहना है कि 1970 के दशक की तुलना में आज खतरनाक उमस भरी गर्मी दोगुने से अधिक हो चुकी है और इसके प्रभाव अब अस्पतालों तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब हीट एक्शन प्लान तैयार करते समय केवल अधिकतम तापमान पर नहीं, बल्कि तापमान और आर्द्रता के संयुक्त प्रभाव पर भी ध्यान देना होगा. मौसम विभाग, स्वास्थ्य एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी होगी जहां उमस का प्रभाव अधिक रहता है, ताकि समय रहते लोगों को चेतावनी और आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें. साथ ही हरित क्षेत्र बढ़ाने, जल संरक्षण, शहरी ताप द्वीप प्रभाव को कम करने और जलवायु परिवर्तन की गति को नियंत्रित करने के लिए दीर्घकालिक कदम भी आवश्यक होंगे.

यह रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि भविष्य की गर्मी केवल बढ़ते तापमान की कहानी नहीं होगी. आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती उस उमस से होगी जो शरीर को भीतर से गर्म करती है और उसे प्राकृतिक रूप से ठंडा होने नहीं देती. ऐसे में जलवायु परिवर्तन के इस नए खतरे को समझना और उससे निपटने की तैयारी करना भारत जैसे विशाल और घनी आबादी वाले देश के लिए समय की सबसे बड़ी जरूरत बनता जा रहा है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-