चार साल की देरी भी नहीं रोक सकी बीमा का हक, उपभोक्ता आयोग ने कंपनी को दिया बड़ा झटका

चार साल की देरी भी नहीं रोक सकी बीमा का हक, उपभोक्ता आयोग ने कंपनी को दिया बड़ा झटका

प्रेषित समय :17:06:19 PM / Sun, Jul 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जबलपुर ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि दुर्घटना वास्तविक है तो केवल सूचना देने में हुई देरी के आधार पर बीमा दावा खारिज नहीं किया जा सकता. आयोग ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए बीमाधारक के पक्ष में राहत प्रदान की है. इस फैसले को उपभोक्ताओं के अधिकारों की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है.

मामला बैतूल निवासी मोहन चक्र अग्रवाल की बोलेरो वाहन से जुड़ा है. वर्ष 2020 में उनका वाहन दुर्घटनाग्रस्त होकर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. हालांकि दुर्घटना की सूचना बीमा कंपनी को लगभग चार वर्ष चार माह बाद दी गई. इस देरी को आधार बनाते हुए बीमा कंपनी ने दावा अस्वीकार कर दिया. कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि वाहन का कथित रूप से व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था और उसमें निर्धारित क्षमता से अधिक सवारियां थीं, इसलिए बीमा राशि का भुगतान नहीं किया जा सकता.

मामला जिला उपभोक्ता आयोग पहुंचा, जहां आयोग के अध्यक्ष पंकज यादव एवं सदस्य सोनल पंडित की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बीमाधारक के पक्ष में फैसला सुनाया. परिवादी की ओर से अधिवक्ता अरुण जैन ने सर्वोच्च न्यायालय के ओम प्रकाश बनाम रिलायंस जनरल इंश्योरेंस मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि दुर्घटना वास्तविक है और उसमें किसी प्रकार की धोखाधड़ी नहीं है, तो केवल सूचना देने में देरी के आधार पर बीमा दावा निरस्त करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता.

आयोग ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि बीमा कंपनी के स्वयं के सर्वेयर ने भी दुर्घटना और वाहन को हुई क्षति को वास्तविक माना था. ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर दावा अस्वीकार करना उपभोक्ता के अधिकारों का उल्लंघन है. आयोग ने माना कि उपभोक्ता संरक्षण कानून का उद्देश्य वास्तविक पीड़ित को राहत देना है, न कि प्रक्रिया संबंधी कमियों का सहारा लेकर उसके वैध अधिकारों से वंचित करना.

अपने आदेश में आयोग ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को निर्देश दिया कि वह नियमानुसार बीमा दावे का निपटारा कर परिवादी को राहत प्रदान करे. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि दुर्घटना और नुकसान वास्तविक हों तथा किसी प्रकार की धोखाधड़ी सिद्ध न हो, तो केवल सूचना देने में हुई देरी को दावा खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन हजारों बीमाधारकों के लिए राहतभरा संदेश है, जिनके दावे अक्सर तकनीकी कारणों का हवाला देकर अस्वीकार कर दिए जाते हैं. यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में उपभोक्ताओं के अधिकारों को और मजबूत करेगा तथा बीमा कंपनियों को भी वास्तविक तथ्यों के आधार पर दावों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए बाध्य करेगा. आयोग ने अपने आदेश में यह स्पष्ट संकेत दिया है कि बीमा अनुबंध का मूल उद्देश्य संकट की घड़ी में उपभोक्ता को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है, इसलिए केवल प्रक्रियागत देरी के आधार पर उसके वैध अधिकारों से उसे वंचित नहीं किया जा सकता.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-