जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की एकलपीठ ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा फैसला दिया है, जिसका प्रभाव भविष्य में पारिवारिक विवादों से जुड़े अनेक मामलों पर पड़ सकता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई वयस्क अविवाहित पुत्री अपनी आय या संपत्ति के अभाव में स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो उसे भी विधि के अनुसार भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि मामला फैमिली कोर्ट के समक्ष लंबित है, तो केवल गलत कानूनी प्रावधान का उल्लेख होने के आधार पर राहत से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने माना कि कानून का उद्देश्य तकनीकी आधारों पर न्याय से इनकार करना नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरतमंद आश्रितों को सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है।
यह महत्वपूर्ण निर्णय न्यायमूर्ति द्वारका धीश बंसल की एकलपीठ ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका क्रमांक 4968/2024 में पारित किया। याचिका में एक पिता ने फैमिली कोर्ट, सतना द्वारा पारित उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी वयस्क अविवाहित पुत्री को प्रतिमाह दो हजार रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पुत्री बालिग हो चुकी है, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत उसे भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया कि पुत्री का अपने पिता के साथ व्यवहार उचित नहीं रहा है, इसलिए वह इस राहत की पात्र नहीं है। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता प्रिया मिश्रा ने न्यायालय के समक्ष विस्तृत कानूनी तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि मामला फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में है, तो न्यायालय आवश्यक परिस्थितियों में हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20(3) के तहत भी राहत प्रदान कर सकता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि केवल आवेदन में गलत कानूनी धारा का उल्लेख होने से किसी पात्र व्यक्ति का वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। न्यायालय ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी न्यायालय के पास संबंधित विषय पर अधिकार क्षेत्र उपलब्ध है, तो मात्र गलत कानूनी प्रावधान का उल्लेख किए जाने के कारण आवेदन को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय का उद्देश्य तकनीकी त्रुटियों के आधार पर राहत रोकना नहीं, बल्कि वास्तविक अधिकारों की रक्षा करना है। इसलिए यदि फैमिली कोर्ट के समक्ष पत्नी और वयस्क अविवाहित पुत्री का संयुक्त आवेदन लंबित है, तो वह आवश्यक परिस्थितियों में हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम की धारा 20(3) के तहत राहत प्रदान कर सकता है हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी महत्वपूर्ण स्पष्टता दी कि हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम की धारा 20(3) के अंतर्गत वयस्क अविवाहित पुत्री को भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए किसी शारीरिक या मानसिक दिव्यांगता का होना आवश्यक नहीं है। यदि वह अपनी आय अथवा संपत्ति के माध्यम से स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो वह इस प्रावधान के अंतर्गत भरण-पोषण की हकदार होगी। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत मामले में यह शर्त पूरी होती है, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश उचित और विधिसम्मत है। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की सभी प्रमुख आपत्तियों को अस्वीकार करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में किसी प्रकार की वैधानिक त्रुटि या अवैधता दिखाई नहीं देती। इसके साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता अंतरिम भरण-पोषण की राशि का भुगतान नहीं करता है, तो फैमिली कोर्ट वसूली की कठोर कार्रवाई कर सकती है तथा आवश्यक होने पर उसकी प्रतिरक्षा भी समाप्त करने पर विचार कर सकती है। न्यायालय ने प्रतिवादी पक्ष को यह स्वतंत्रता भी दी कि तकनीकी आपत्तियों से बचने के लिए लंबित आवेदन में आवश्यक संशोधन कर उसे धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के साथ-साथ हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम की धारा 20(3) के अंतर्गत भी माना जा सके। अधिवक्ता प्रिया मिश्रा के अनुसार यह फैसला आर्थिक रूप से आश्रित वयस्क अविवाहित पुत्रियों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार यह आदेश स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य केवल तकनीकी प्रक्रियाओं का पालन कराना नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरतमंद व्यक्तियों को न्याय दिलाना है। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसे अनेक मामलों में यह निर्णय एक प्रभावी न्यायिक मार्गदर्शक के रूप में उपयोग किया जाएगा और फैमिली कोर्टों को भी इस विषय पर स्पष्ट दिशा मिलेगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उन परिवारों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित होगा, जहां वयस्क अविवाहित बेटियां शिक्षा प्राप्त कर रही हैं या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं। ऐसे मामलों में यदि वे अपनी जीविका चलाने में सक्षम नहीं हैं, तो वे विधि के अनुसार अपने भरण-पोषण का दावा कर सकती हैं। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला पारिवारिक कानूनों की मानवीय व्याख्या को आगे बढ़ाने वाला माना जा रहा है और इससे भविष्य में समान प्रकृति के मामलों के निस्तारण में महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत उपलब्ध होगा।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-




