जबलपुर. एमपी के जबलपुर में नालों के बीच से गुजर रही पेयजल पाइपलाइन और दूषित पानी की शिकायतों को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है. एनजीटी ने जिला प्रशासन और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई है. ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम के साथ संयुक्त स्थल निरीक्षण कर दो सप्ताह में रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं.
सुनवाई के दौरान आज को एनजीटी ने कहा कि पहले दिए गए आदेश के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने मौके पर जाकर जांच करने की जहमत तक नहीं उठाई. प्रशासन की निष्क्रियता के बाद गठित नोडल एजेंसी ने 16 जुलाई को एनजीटी को बताया कि जिला प्रशासन और नगर निगम के असहयोग के कारण स्थल निरीक्षण नहीं हो सका. नोडल एजेंसी अप्रैल में एनजीटी ने गठित की थी. जिसमें कलेक्टर राघवेंद्र सिंह, नगर निगम कमिश्रनर राम प्रकाश अहिरवार, प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड रीजिनल ऑफिसर केपी सोनी सदस्य हैं. याचिकाकर्ता ने कहा कि जबलपुर शहर की करीब 80 प्रतिशत पेयजल पाइपलाइन नालियों के बीच से गुजर रही है, जबकि 47 प्रतिशत पानी पीने योग्य नहीं है.
इसके बाद एनजीटी ने अधिकारियों की लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताई. नागरिक उपभोक्ता मंच के डॉ. पीजी नाजपांडे और रजत भार्गव की ओर से मार्च 2026 में दायर याचिका पर अप्रैल 2026 में एनजीटी ने नगर निगम और जिला प्रशासन से एक महीने में रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन निर्धारित समय में रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई. 10 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एनजीटी को बताया कि नगर निगम और जिला प्रशासन के सहयोग नहीं करने के कारण संयुक्त निरीक्षण नहीं हो पाया.
विभागों के बीच समन्वय की कमी भी सामने आई. एनजीटी के न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार ने इसे गंभीर और आपत्तिजनक बताते हुए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया कि संबंधित अधिकारियों के साथ संयुक्त निरीक्षण कर दो सप्ताह के भीतर अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए. जस्टिस दिनेश कुमार सिंह ने एनजीटी रजिस्ट्रार को निर्देश दिए कि जबलपुर कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त को तत्काल पत्र भेजकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ स्थल निरीक्षण में सहयोग सुनिश्चित कराया जाए.
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