नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से शुक्रवार को जवाब मांगा है. यह मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए लोगों के दावों और आपत्तियों का विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ा सार्वजनिक करने की मांग की गई है.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की. यह याचिका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस समिति की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस ने वकील नेहा राठी के जरिये दाखिल की है.
याचिका में पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की गई है. इसमें फॉर्म-6 और फॉर्म-7 की कुल संख्या, कितने आवेदन स्वीकार हुए, कितने खारिज हुए और अपीलीय न्यायाधिकरणों में लंबित तथा निपटाए गए मामलों का ब्योरा मांगा गया है. प्रसेनजीत बोस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने कहा कि हटाए गए मतदाताओं के दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए बनाए गए 18 न्यायाधिकरणों का कामकाज सही ढंग से नहीं चल रहा है. इससे व्यावहारिक स्तर पर गड़बडिय़ां और देरी हो रही है. उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटने के कारण लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्नपूर्णा जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है. उन्हें जाति प्रमाण पत्र भी नहीं दिए जा रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा
पीठ ने बिहार के विशेष गहन पुनरीक्षण मामले में दिए गए अपने फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि जब कोई न्यायाधिकरण यह कहता है कि किसी व्यक्ति का नाम विशेष गहन पुनरीक्षण सूची में शामिल नहीं किया जा सकता, तब निर्वाचन आयोग का यह दायित्व है कि वह नागरिकता कानून के तहत नागरिकता तय करने के लिए मामला केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय को भेजे. शीर्ष कोर्ट ने कहा कि नागरिकता तय करना निर्वाचन आयोग का सांविधानिक अधिकार नहीं है. कानून में कोई भ्रम नहीं है. निर्वाचन आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची की निगरानी और नियंत्रण तक सीमित है.
अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी
सुप्रीम कोर्ट ने इस नई याचिका को विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ सुनने पर सहमति जताई है. इनमें पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका भी शामिल है. मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी. याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले अधिकारों को लागू करने की मांग की गई है.
अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज पर भी सवाल
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनाए गए 18 अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज पर भी चिंता जताई गई है. याचिकाकर्ता का कहना है कि तीन सदस्यीय न्यायिक समिति ने 7 अप्रैल को एक मानक कार्यप्रणाली तैयार की थी, लेकिन इसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

